बिहार विधानसभा चुनाव: चुनाव आयोग को 20 साल बाद Covid के बावजूद क्यों है भारी मतदान का अनुमान

नई दिल्ली- बिहार विधानसभा चुनाव में 60 फीसदी से ज्यादा मतदान हुए 20 साल गुजर गए। साल 2000 के विधानसभा चुनाव में वहां 60 फीसदी से ज्यादा वोटिंग हुई थी। यह वो दौर था, जब बड़े पैमाने पर चुनावी धांधली और बूथ लूटने की खबरें भी सामने आती थीं। तब लालू यादव ताल ठोककर मतगणना के दिन 'जिन्न' निकलने के दावे भी किया करते थे। इसके बाद राज्य में जितने भी विधानसभा चुनाव हुए हैं, मतदान का प्रतिशत 56-58 फीसदी से ज्यादा नहीं हुआ है। लेकिन, इस बार चुनाव आयोग को भरोसा है कि मतदान का प्रतिशत फिर से 60 फीसदी के आंकड़े को पार कर लेगा। इसकी वजह हैं प्रवासी कामगार और महिला वोटर। क्योंकि, लॉकडाउन के बाद बड़े पैमाने पर प्रवासी कामगार भारत के विभिन्न हिस्सों से बिहार घर लौट आए हैं और मतदाताओं के बीच जेंडर गैप भी काफी कम हुआ है। तथ्य ये भी है कि 2005 के चुनाव के बाद से बिहार में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा मतदान कर रही हैं।

Bihar Elections: Election Commission is expecting heavy turnout after 20 years despite Covid,Why

बिहार के 38 जिलों में हाल के महीनों में करीब 3,00,000 प्रवासी कामगारों ने नए वोटर के तौर पर अपने नाम दर्ज करवाए हैं। वैसे 7 करोड़ मतदाताओं वाले राज्य के लिए यह संख्या कम लगती है। लेकिन, यह उन करीब 17 लाख प्रवासी कामगारों में शामिल हैं, जो लॉकडाउन के बाद बिहार लौटे हैं और जिनकी उम्र 18 से साल ऊपर है। प्रदेश आपदा प्रबंधन विभाग ने चुनाव आयोग के साथ जो आंकड़े साझा किए हैं, उसके मुताबिक लॉकडाउन के दौरान करीब 18.8 लाख प्रवासी कामगार बिहार लौट आए हैं।

चुनाव आयोग का फोकस उन प्रवासी महिला वोटरों पर और भी ज्यादा है, जो बाहर से आई हैं और अभी बिहार में ही हैं। चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इकोनॉमिक्स टाइम्स से कहा है कि, 'लॉकडाउन के दौरान पूरा परिवार राज्य लौट आया है। प्रवासी कामगारों को वोटर के तौर पर दर्ज करने के साथ-साथ इसके लिए विशेष प्रयास किए गए हैं कि जो महिला कामगार लौटी हैं, उनका भी वोटर के तौर पर नाम जरूर दर्ज हो जाए। इसके बीएलओ उन वापस लौटे कामगारों के घरों पर रजिस्ट्रेशन फॉर्म के साथ खासतौर पर भेजे गए, ताकि यह काम सुनिश्चित हो जाए।'

आंकड़े बताते हैं कि बिहार उन चंद राज्यों में शामिल है, जहां 2005 के विधानसभा चुनावों से महिलाएं, पुरुषों के मुकाबले ज्यादा संख्या में वोट डालने पहुंच रही हैं। 2005 में यहां 50.70% पुरुषों के मुकाबले 54.85% महिलाओं ने वोट डाले। 2015 में तो यह अंतर और भी बढ़ गया और 54.07% पुरुषों के मुकाबले 59.92% महिलाओं ने वोटिंग की। इसके साथ ही राज्य में 2015 के चुनाव के मुकाबले जेंडर गैप भी अब 875 से कम होकर सिर्फ 898 रह गया है। यानि महिला वोटरों की जनसंख्या भी लगातार बढ़ रही है, जो मतदान के लिए ज्याा प्रतिबद्ध नजर आती हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी जेंडर गैप 892 था, जिसमें 6 की और कमी आ चुकी है। ऐसे में उम्मीद है कि इस बार महिलाओं के मतदान का प्रतिशत और बढ़ेगा।

चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि बिहार में चुनाव क्षेत्रों के हिसाब से भी मतदान प्रतिशत में काफी अंतर नजर आता है। मसलन, 2014 के लोकसभा चुनावों में इन 243 विधानसभा सीटों में से करीब 170 पर यह 50 से 60 फीसदी के बीच दर्ज किया गया था। जबकि, किशनगंज जिले की ठाकुरगंज विधानसभा सीट ऐसी है, जहां लगातार 70% वोटिंग हुई है। पास के ही कसबा और बरारी में भी मतदान का प्रतिशत ज्यादा रहा है। लेकिन, इनके मुकाबले 2015 के विधानसभा चुनाव में राजधानी पटना की कुछ सीटें ऐसी भी रही हैं, जहां 45% से भी कम वोटिंग दर्ज की गई थी। ये हैं- दीघा, बांकीपुर और कुम्हरार।

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