Bihar Election 2020: JDU-BJP जब-जब साथ लड़ी, दलितों की रिजर्व सीटों पर कैसे आए नतीजे
नई दिल्ली- एक अनुमान के मुताबिक बिहार में अभी अनुसूचित जाति की जनसंख्या करीब 16 फीसदी है। इस वोट बैंक से जुड़े कई नेता अलग-अलग पार्टी बनाकर मैदान में हैं। 1980 के दशक के आखिर तक इस वोट बैंक पर कांग्रेस और वामपंथी दलों का लगभग एकाधिकार था। लेकिन, 1990 के बाद से कांग्रेस का एकाधिकार तो खत्म हुआ ही, आमतौर पर हर चुनाव में इनके बीच वामपंथी दल भी हाशिए पर जाते गए। 90 के दशक के बाद से इस वोट बैंक पर मुख्यतौर पर 77 के आंदोलन से पैदा हुए समाजवादी दलों (जदयू-राजद) और भारतीय जनता पार्टी का ही ज्यादा प्रभाव देखा जाता रहा है। अलबत्ता, हर चुनाव में तत्कालीन सियासी और जातीय समीकरणों की वजह से आंकड़े इधर से उधर होते रहे हैं। मसलन, 2015 में भाजपा समाजवादी दल (जदयू) से अलग चुनाव लड़ी तो उसे उसका बहुत नुकसान झेलना पड़ा। लेकिन, जब 2010 में दोनों पार्टियां मिलकर लड़ीं तो 38 सीटों के नतीजे पूरी तरह से एकतरफा हो गए।

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साल 2005 से पहले के विधानसभा चुनावों (अविभाजित बिहार) में अनुसूचित जातियों के लिए कुल 324 में से 48 सीटें आरक्षित होती थीं। तब इन सीटों पर कांग्रेस का इतना प्रभाव था कि 1985 के चुनाव में पार्टी के पास 33 सीटें चली गईं। 1990 के चुनाव से कांग्रेस के दलित वोट बैंक पर पलीता लगना शुरू हो गया। इस चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 6 और लेफ्ट को 5 सीटें मिलीं। जबकि, 24 सीटें जनता दल के पास चली गईं। बीजेपी ने भी अकेले 8 सीटों पर कब्जा किया। पांच साल बाद यानि 1995 में हालात और बदले और जनता दल ने अनुसूचित जातियों की 30 सीटों पर कब्जा कर लिया और कांग्रेस सिर्फ 2 पर पहुंच गई। यह चुनाव लालू-राबड़ी के शासनकाल का सबसे एकतरफा चुनाव था। बीजेपी भी खिसकर 4 पर पहुंच गई। तब तक वामपंथी दल भी धीरे-धीरे राजद के करीब आ चुके थे और उन्हें भी 7 सीटें मिलीं।
साल 2000 का चुनाव पहला ऐसा बिहार विधानसभा चुनाव था, जब जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी साथ मिलकर मैदान में उतरे। इससे पहले तीन लोकसभा चुनावों (1996-98-99) में दोनों पार्टियां साथ मिलकर लड़ चुकी थीं। (बिहार-झारखंड) विभाजन के बावजूद भी यह चुनाव एक साथ ही हुआ था। भाजपा-जदयू साथ में लड़े फिर भी इसमें सुरक्षित सीटों पर लालू की पार्टी का ही बोलवाला रहा और आरजेडी 48 में से 25 सीटों पर चुनाव जीत गई। कांग्रेस को फिर भी सिर्फ 1 सीट मिली थी। जबकि, बीजेपी को 8 और जेडीयू को सिर्फ 2 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा।
साल 2005 के फरवरी में पहली बार दोनों राज्यों (बिहार-झारखं) के विधानसभा चुनाव अलग-अलग हुए और बिहार में अनसूचित जातियों के लिए सुरक्षित सीटों की संख्या घटकर महज 38 रह गईं। इस चुनाव से पहली बार विधानसभा चुनाव में भाजपा और जदयू के बीच तालमेल ने असर दिखाना शुरू किया। बीजेपी 6 और जेडीयू 9 सीटों पर जीती। हालांकि, आरजेडी का दबदबा तब भी बना रहा और वह 12 सीटें जीत गई। कांग्रेस को भी 3 सीटें मिलीं। एलजेपी ने भी 4 सीटें हासिल किए।
त्रिशंकु विधानसभा के चलते 9 महीने बाद यानि अक्टूबर 2005 में फिर से बिहार चुनाव करवाने पड़े और यहां से एनडीए गठबंधन को जबर्दस्त फायदा मिलना शुरू हो गया। सुरक्षित सीटों में जदयू 15 और भाजपा ने 11 सीटें जीतीं। यह मुकाबला एक तरह से एनडीए-यूपीए गठबंधन के बीच था। आरजेडी 7 सीट लाई और कांग्रेस को 2 मिलीं। एलजेपी को भी 2 सीटें मिलीं। 1 सीट भाकमा (माले) के खाते में भी गई। लेकिन, जैसा कि पहले बताया गया है कि साल 2010 के चुनाव में सुरक्षित सीटों पर बीजेपी और जेडीयू गठबंधन ने सब की छुट्टी कर दी थी। बीजेपी ने सुरक्षित सीटों में से 18 और जेडीयू ने 19 सीटें (कुल 37) जीत ली। आरजेडी को सिर्फ 1 सीट मिली और किसी को एक सीट भी नहीं मिल पाई।
लेकिन, पांच साल बाद ही साल 2015 में भाजपा-जदयू में छत्तीस का आंकड़ा हो चुका था। जदयू महागठबंधन का हिस्सा बन चुका था। उसने राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर मुकाबला किया। फिर क्या था बीजेपी को रिजर्व सीटों पर भारी नुकसान हुआ। उसे सिर्फ 5 सीटें मिलीं और उसकी सहयोगी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा को 1 सीट। जबकि, जेडीयू को 11, आरजेडी को 13 और कांग्रेस को 5 सीटें प्राप्त हुईं। यानि, जब-जब भाजपा और जदयू साथ आए हैं, उन्हें सुरक्षित सीटों पर ज्यादा फायदा मिला है।












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