बिहार चुनाव 2020: अतिपिछड़ा वोटर पर टिकी नीतीश की उम्मीद, महिलाओं का मिला साथ तो होगी जीत

पटना। बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में तीसरे चरण के लिए कल वोट डाले जाने हैं। तीसरे चरण में 78 सीटों पर मतदान होना है जिनमें सीमांचल की सीटें भी शामिल हैं। इस चुनाव में नीतीश कुमार (Nitish Kumar) लगातार चौथी बार बिहार में सत्ता पर दावा करने के लिए मैदान में हैं लेकिन इस बार राह आसान नजर नहीं दिखाई दे रही है। शायद यही वजह है कि तीसरे चरण का प्रचार खत्म होने पर कहना पड़ गया कि ये उनका आखिरी चुनाव है।

Nitish Kumar

एक तरफ आरजेडी नेता और महागठबंधन के सीएम प्रत्याशी तेजस्वी यादव की सभाओं में भीड़ उमड़ रही थी वहीं नीतीश कुमार को अपनी रैलियों में विरोध का सामना करना पड़ा था। हालांकि रैलियों में विरोध को लेकर नीतीश को कमजोर समझ लेना सही नहीं होगा। नीतीश कुमार 2005 के बाद से लगातार बिहार की सत्ता पर काबिज हैं। इस समय में नीतीश ने बिहार पर शासन के साथ ही अपने वोट बैंक को बढ़ाने के लिए भी खूब काम किया है। इसी में नीतीश कुमार द्वारा बिहार में महादलित और अतिपिछड़ों पर अपनी पकड़ बनाना भी रहा है।

नीतीश को अतिपिछड़ा वोटर का सहारा
इस बार नीतीश कुमार को जीत के लिए इसी अति पिछड़ा वोटर का सहारा है। अति पिछड़ा वोटर राजनीतिक रूप से उतना मुखर नहीं रहा है लेकिन इसे नीतीश कुमार का समर्थक माना जाता रहा है। इसके साथ ही महिला वोटरों से भी जेडीयू को काफी उम्मीद हैं। 2015 के विधानसभा चुनाव में महिला वोटरों ने नीतीश के पक्ष में जमकर वोट दिया था।

बिहार में अति पिछड़ा समुदाय की आबादी लगभग 25 प्रतिशत है। इनमें धानुक, तेली, सहानी (मल्लाह), नोनिया, लोहार, नाई, बिंद, चंद्रवंशी और केवट समेत लगभग 100 जातियां शामिल हैं। पूरे प्रदेश में इनकी आबादी है लेकिन मधुबनी, दरभंगा और कोशी क्षेत्र के सहरसा, सुपौल और मधेपुरा में इनकी काफी संख्या है। एनडीए के घटक दल विकासशील इंसान पार्टी के मुकेश सहनी इसी मल्लाह जाति से आते हैं। खुद को सन ऑफ मल्लाह कहने वाले सहनी का कोशी क्षेत्र के मल्लाह वोटर में उनका काफी असर है।

अतिपिछड़ी जातियों (EBC) में ज्यादातर एनडीए के समर्थन में हैं। बीजेपी का मानना है कि अतिपिछड़ा वोटर उनके साथ ही रहने वाला है क्योंकि वे राजनीति में यादवों के प्रभुत्व से खुश नहीं है। बीजेपी का मानना है कि अगर अतिपिछड़ा वोटर में अगर 25 प्रतिशत महागठबंधन की तरफ शिफ्ट होता है तो वह मैनेज कर लेंगे। अगर इससे ज्यादा शिफ्ट होता है तो बीजेपी भी एनडीए के लिए मुश्किल मान रही है।

महिलाओं से फिर सपोर्ट की उम्मीद
यही वजह है कि इस बार सभी रैलियों में जेडीयू नेता बालिकाओं के बारे में चलाई जा रही योजनाओं जैसे साइकिल, 55 हजार रुपये और दूसरी स्कीम की जानकारी देते नजर आ रहे थे। इसके साथ ही पंचायत में 50 प्रतिशत हिस्सेदारी और नौकरियों में महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत कोटा दिए जाने की बात करते नजर आए। यही नहीं नीतीश कुमार ने महिलाओं के बारे में अपनी उपलब्धियों का जिक्र करते हुए कहा था कि पिछले कुछ वर्षों में पढ़ी लिखी महिलाओं की प्रजनन दर में काफी कमी देखी गई है।

नीतीश कुमार के 15 साल के शासन काल में महिलाओं के 10 लाख स्वयं सहायता समूह बने हैं जिनसे एक करोड़ महिलाएं जुड़ी हैं। नीतीश सरकार द्वारा किए गए कामों के अलावा नरेंद्र मोदी सरकार की उज्ज्वला योजना जैसी स्कीम भी बिहार में महिलाओं की सहानुभूति एनडीए के पक्ष में लाने में सफल रही है।

महिलाओं में नाराजगी भी
लेकिन हर तरफ खुशी ही नहीं है कुछ महिलाओं में नाराजगी भी है। इन्हीं में आंगनबाड़ी कार्यकत्री भी हैं। नीतीश कुमार ने इनकी वेतन में 50 प्रतिशत बढ़ोतरी का वादा किया था लेकिन ये 25 प्रतिशत ही बढ़ा है जिसके चलते आंगनबाड़ी कार्यकत्री खुश नहीं है। वहीं तेजस्वी यादव के मानदेय में वृद्धि करने के वादे के चलते महागठबंधन के प्रति भी आकर्षण देखने को मिला है।

इस बार माना जा रहा है कि महिला मतदाताओं की संख्या में गिरावट आई है जो कि नीतीश कुमार के लिए चिंता की बात होगी। नीतीश कुमार को महिला मतदाताओं को बूथ तक लाने का भी श्रेय दिया जाता है। 2005 में महिला मतदाताओं की भागीदारी 42 प्रतिशत थी जो 2015 में बढ़कर 60 प्रतिशत हो गई थी। 2015 के चुनाव में शराबबंदी के दावे के चलते बड़ी संख्या में महिलाएं नीतीश के समर्थन में वोट देने निकली थीं।

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