जब एक ईमानदार और निडर अफसर ने झुका दिया था बिहार के राज्यपाल को

जब एक ईमानदार अफसर ने झुका दिया था बिहार के राज्यपाल को

नई दिल्ली। ईमानदारी में बहुत ताकत होती होती है। यह तख्त और ताज को भी झुका देती है। बिहार के एक सख्त और ईमानदार आइएएस अफसर ने राज्यपाल को झुकने पर मजबूर कर दिया था। राज्यपाल प्रोटकॉल तोड़ कर अफसर के घर मनाने पहुंचे। अफसर सच के साथ था इस लिए उसने राज्यपाल की बात नहीं मानी। उसने अपने साहस के केन्द्र सरकार और राज्यपाल के राजनीतिक पक्षपात को उजागर कर दिया था।

घटनाक्रम की पृष्ठभूमि

घटनाक्रम की पृष्ठभूमि

फऱवरी 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में किसी दल या गठबंधन को बहुमत नहीं मिला था। नीतीश कुमार या राबड़ी देवी में से कोई बहुमत का आंकड़ा नहीं जुटा पा रहा था। रामविलास पासवान दोनों में से किसी को समर्थन नहीं दे रहे थे। 6 मार्च तक सरकार का गठन हो जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा था। उस समय लालू यादव केन्द्र में रेल मंत्री थे। उनके इशारे पर बिहार में आनन-फानन में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने केन्द्र सरकार की इच्छा के मुताबिक काम किया। राष्ट्रपति शासन लगते ही रोजमर्रा के शासन में राज्यपाल की स्थिति महत्वपूर्ण हो गयी। इस बीच मई महीने में मुख्य सचिव का पद रिक्त हो गया। तब राज्यपाल बूटा सिंह ने जीएस कंग को बिहार का मुख्य सचिव बना दिया। पंजाब के रहने वाले कंग बिहार कैडर के कड़क और ईमानदार आइएएस अफसर थे। लेकिन बूटा सिंह कुछ और सोच रहे थे। उनको लग रहा था कि पंजाब के रहने वाले कंग उनके तरीके से चलेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

 क्या किया था राज्यपाल बूटा सिंह ने ?

क्या किया था राज्यपाल बूटा सिंह ने ?

बिहार में जब राष्ट्रपति शासन लगा तब भाजपा और जदयू ने आरोप लगाया था कि लालू यादव ने परोक्ष रूप से सत्ता हासिल करने के लिए ऐसा कराया है। इस बीच सीवान के तत्कालीन एसपी रत्न संजय और तत्कालीन डीएम सी के अनिल ने अप्रैल 2005 में पहली बार राजद के बाहुबली सांसद शहाबुद्दीन को कानून के शिकंजे में कसा दिया। शहाबुद्दीन उस समय सीवान से राजद के सांसद थे। इस कार्रवाई से आम जनता का पुलिस पर भरोसा बढ़ा। लालू के राज में पुलिस शहाबुद्दीन पर कोई सख्ती नहीं कर पाती थी। लेकिन लालू यादव को ये कार्रवाई रास न आयी।

 राज्यपाल से रुष्ट हुए मुख्य सचिव

राज्यपाल से रुष्ट हुए मुख्य सचिव

राष्ट्रपति शासन में शासन का शक्तियां राज्यपाल के अधीन थीं लेकिन कोई बड़ा फैसला लेने के लिए मुख्य सचिव की सलाह जरूरी थी। 29 जुलाई 2005 को राज्यपाल बूटा सिंह ने बिहार के 17 आइपीएस अफसरों का तबादला कर दिया। इस सूची में सीवान के एसपी रत्न संजय का भी नाम था जिन्होंने शहाबुद्दीन पर कार्रवाई का साहस दिखाया था। राज्यपाल ने तबादला का फैसला लेते समय मुख्य सचिव जीएस कंग से कोईे सलाह नहीं ली थी। कंग नियमों की अनदेखी किये जाने से रुष्ट हो गये। विरोधस्वरूप उन्होंने आफिस जाना बंद तक दिया। रत्न संजय के तबादले के बाद यह आरोप लगने लगा कि लालू यादव परोक्ष रूप से सत्ता चला रहे हैं। लालू अपने करीबी सांसद शहाबुद्दीन पर कार्रवाई से उखड़े हुए थे। आरोप लगा कि लालू ने ही एसपी रत्न संजय की बदली करायी है। मामला तूल पकड़ने लगा। कंग की नाराजगी से राज्यपाल बूटा सिंह की स्थिति खराब होने लगी। सबको पक्षपात दिखने लगा।

 मुख्य सचिव को मनाने घर पहुंचे राज्यपाल

मुख्य सचिव को मनाने घर पहुंचे राज्यपाल

तबादले के मुद्दे पर मुख्य सचिव की नाराजगी से केन्द्र सरकार और राज्यपाल की किरकिरी होने लगी। एक दिन परेशान राज्यपाल बूटा सिंह प्रोटोकॉल तोड़ कर मुख्यसचिव जीएस कंग के घर पहुंच गये। उन्हें काम पर आने के लिए मनाया। दोनों के पंजाबी होने का हवाला भी दिया। लेकिन कंग बिल्कुल नहीं पसीजे। वे लंबी छुट्टी पर चले गये। इस मुद्दे पर केन्द्र सरकार दबाव में आ गयी। तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने बूटा सिंह को दिल्ली तलब किया। फिर जीएस कंग को धमकी दी गयी कि अगर ऑफिस ज्वाइन नहीं करते हैं तो नया मुख्य सचिव नियुक्त कर लिया जाएगा। इसके बाद भी कांग नहीं डरे। कुछ ही दिनों के बाद बिहार में फिर से चुनाव कराने का घोषणा हो गयी। जीएस कंग मुख्य सचिव के पद पर लौट आये। चुनाव के बाद नीतीश कुमार की सरकार बनी। नीतीश और कंग में जमने लगी। कंग ने अपनी ईमानदारी और साहस से नौकरशाही में एक बड़ी मिसाल कायम की।

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