कोरोना के बीच अंतरिक्ष से धरती पर आ रही ये बड़ी आफत, 24 घंटे बाकी
नई दिल्ली। इस वक्त पूरी दुनिया कोरोना वायरस (कोविड-19) संकट का सामना कर रही है। इस बीच खबर आ रही है कि धरती के पास से एक बड़ी आफत गुजरने वाली है। जिसमें महज 24 घंटे ही बचे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, 1998 OR2 नाम का उल्कापिंड बुधवार को धरती के पास से गुजरेगा। अगर इसकी दिशा में थोड़ा सा भी परिवर्तन आता है तो खतरा बहुत ज्यादा बढ़ सकता है। इस नजारे पर दुनियाभर के वैज्ञानिकों की नजर बनी हुई है।
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आकार में किसी पर्वत के समान है उल्कापिंड
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने इस बात का खुलासा करीब डेढ़ महीने पहले किया था। एजेंसी ने कहा था कि धरती की ओर एक बड़ा एस्टेरॉयड यानी उल्कापिंड तेजी से आ रहा है। बताया जा रहा है कि ये उल्कापिंड आकार में किसी पर्वत के समान है।

31,319 किलोमीटर प्रति घंटा है गति
उल्कापिंड की गति की बात करें तो यह 31,319 किलोमीटर प्रति घंटा है। इसका मतलब 8.72 किलोमीटर प्रति सेकेंड। माना जा रहा है कि अगर इतनी तेज गति से ये धरती के किसी हिस्से से टकरा गया तो बड़ी सुनामी तक ला सकता है। इससे जुड़ी कई तस्वीरें भी इस वक्त सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं।

नासा का क्या कहना है?
इस घटना से दुनियाभर के लोग चिंता में पड़ गए हैं। इस बीच नासा का कहना है कि इस उल्कापिंड से घबराने की कोई जरूरत नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह धरती से करीब 62.90 लाख किलोमीटर दूर से गुजरेगा। वैसे अंतरिक्ष विज्ञान में इस दूरी को बहुत ज्यादा नहीं माना जाता है, लेकिन कम भी नहीं मानी जाती।

पहली बार कब देखा गया था ये उल्कापिंड?
इस उल्कापिंड को 52768 (1998 OR 2) नाम दिया गया है। इसे सबसे पहले नासा ने साल 1998 में देखा था। इसका व्यास करीब 4 किलोमीटर है। नासा के वैज्ञानिकों के मुताबिक, नासा के सेंटर फॉर नियर-अर्थ स्टडीज के अनुसार, बुधवार 29 अप्रैल को सुबह 5:56 बजे ईस्टर्न टाइम में उल्कापिंड पृथ्वी के पास से होकर गुजरेगा।

अंतरिक्ष विज्ञानी क्या कहते हैं?
इस बारे में एक अंतरिक्ष विज्ञानी का कहना है कि उल्कापिंड 52768 सूरज का एक चक्कर लगाने में 1340 दिन या 3.7 वर्ष लगाता है। इसके बाद उल्कापिंड 52768 (1998 OR 2) का धरती की ओर अगला चक्कर 18 मई, 2031 के आसपास हो सकता है। उस समय यह 1.90 करोड़ किलोमीटर की दूरी से निकल सकता है।

इस मामले में खगोलविद क्या कहते हैं?
खगोलविद के मुताबिक ऐसे उल्कापिंड की हर सौ साल में धरती से टकराने की 50 हजार संभावनाएं होती हैं। लेकिन ये किसी न किसी तरीके से धरती के पास से होकर गुजर जाता है। इस मामले में खगोलविदों का ये भी कहना है कि छोटे उल्कापिंड कुछ मीटर के होते हैं। ये आमौतर पर वायुमंडल में आते ही जल जाते हैं। इससे किसी बड़े नुकसान का कोई खतरा नहीं रहता है।
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