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जन नायक कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न, नीतीश कुमार के लिए एक और 'लॉलीपॉप' क्यों है?

Karpoori Thakur Jayanti 2024: जन नायक कर्पूरी ठाकुर को उनकी जन्म शताब्दी से ठीक एक दिन पहले देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न देने की घोषणा की गई है। इसके माध्यम से केंद्र सरकार ने वैसे तो कई निशाने साधे हैं, लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए यह हफ्ते भर में ही दूसरा राजनीतिक लॉलीपॉप जैसा है।

कर्पूरी ठाकुर को अगर बिहार में आरक्षण की राजनीति का मसीहा कहें तो अनुचित नहीं है। उन्होंने मंडल कमीशन के जन्म लेने से भी पहले बिहार में पिछड़ी जातियों के लिए 26% आरक्षण का कार्ड चल दिया था।

karpoori thakur nitish kumar

करीब साढ़े तीन दशकों से सामाजिक न्याय की राजनीति हावी
बिहार की सत्ता पिछले 34-35 वर्षों से लालू और नीतीश के हाथों में रही है और दोनों का आधार पिछड़ा वोट बैंक और आरक्षण की सियासत रहा है। दूसरे शब्दों में इसे सामाजिक न्याय की राजनीति कहते हैं।

बिहार में अब अति-पिछड़ों में भी गोलबंदी शुरू है
दोनों नेता प्रभावशाली ओबीसी जातियों यादव और कुर्मी से ताल्लुक रखते हैं। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में इन दबंग ओबीसी जातियों को अति-पिछड़ी जातियों (एमबीसी/ईबीसी) की गोलबंदी से चुनौती मिलनी शुरू हुई है।

बीजेपी की अति-पिछड़ों में अपना जनाधार और मजबूत बनाने की कोशिश
अलबत्ता नीतीश की राजनीति में कुर्मी-कोयरी के अलावा अति-पिछड़ी जातियों को भी समेटने का प्रयास रहा है। मोदी सरकार की ओर से कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देना उन्हीं अति-पिछड़ी जातियों में बीजेपी का जनाधार बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

'सामाजिक न्याय के पथ प्रदर्शक के साथ न्याय'
जन नायक कर्पूरी ठाकुर नाई जाति के थे, जो अति-पिछड़ी जाति में आती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें भारत रत्न से नवाजे जाने की घोषणा के बाद पहले एक्स पर और फिर एक लेख के जरिए उनके प्रति अपनी जो भावनाएं जाहिर की हैं, उससे भी उनका इशारा साफ हो जाता है।

बिहार में पिछले कुछ चुनावों से बीजेपी ने अति-पिछड़ों में अपनी पहुंच बेहतर तरीके से मुक्कमल की है। लेकिन, राजद और जदयू के एक बार फिर हाथ मिला लेने और नीतीश के कमजोर होते जनाधार को देखते हुए भाजपा सरकार का यह फैसला इस वोट बैंक को और मजबूत करने के इरादे से जुड़ा हुआ लगता है।

टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी के राज्यसभा सांसद विवेक ठाकुर कहते हैं, 'बहुत से नेता उनके साथ रहकर और उनके उत्तराधिकारी होने का दावा करके फले-फूले हैं। लेकिन, ये सिर्फ प्रधानमंत्री ही हैं, जिन्होंने सामाजिक न्याय के पथ प्रदर्शक के साथ न्याय किया है।'

मोदी की राजनीति में कांग्रेस खा गई झटका
मंगलवार को जब मोदी सरकार की ओर से यह घोषणा हुई तो जेडीयू ने तो फौरन ही इसकी सराहना की और आरजेडी की ओर से भी यही कहा गया कि वह तो लंबे समय से इसकी मांग कर रहा है। लेकिन, कांग्रेस तो ऐसे हक्का-बक्का रह गई कि शुरुआती तौर पर कोई सामान्य शिष्टाचार वाली प्रतिक्रिया भी नहीं दे पाई।

दरअसल, बिहार की राजनीति में अगर कर्पूरी ठाकुर पिछड़ों की राजनीति के मसीहा थे, तो वह कांग्रेस की राजनीति के खिलाफ मुखर चेहरे के तौर पर भी स्थापित थे। पीएम मोदी ने अपने लेख में भी इसका हवाला दिया है। मोदी सरकार की इस घोषणा को राहुल गांधी के जाति जनगणना वाले कार्ड की हवा निकालने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

बीजेपी ने खुद को अति-पिछड़े वोट बैंक के दावेदार के तौर पर किया पेश
पीएम मोदी ने कर्पूरी ठाकुर पर लिखे लेख में अपनी सरकार के कार्यकाल में पिछले 10 वर्षों में ओबीसी, दलित, आदिवासियों और गरीबों के लिए उठाए गए कदमो को सीधे जन नायक के विचारों को समर्पित करने की कोशिश की है।

उन्होंने इसके उनका आभार जताते हुए खुद के भी पिछड़ी जाति से होने का जिक्र करके साफ कर दिया है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में ओबीसी-एमबीसी वोट बैंक के दावेदारों से बीजेपी को अलग रखने की सोच बेमानी है।

नीतीश की राजनीति के लिए सुकून देने वाला फैसला
लेकिन, मोदी सरकार के इस फैसले का जेडीयू अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी खास रिश्ता है। नीतीश ने जब तक लालूवादी राजनीति के खिलाफ लड़ाई की अगुवाई की तो उन्होंने अति-पिछड़ों को भी अपना कोर वोट बैंक के रूप में तैयार किया था। इस तरह से यह उनके लिए एक बड़ी जीत है।

नीतीश कुमार को लॉलीपॉप?
जहां तक इसके जरिए उन्हें बीजेपी से एक बार फिर से ऑफर मिलने का सवाल है तो इसका संकेत मंगलवार को एक्स पर उनकी दो प्रतिक्रियाओं में देखा जा सकता है। पहले पोस्ट में उन्होंने कहा कि यह 'बहुत पुरानी मांग' थी और 'जन नायक को सम्मान मिलने से दलितों, वंचितों और उपेक्षित वर्गों में सकारात्मक भावना पैदा करेगा।'

इसे भी पढ़ें- कौन थे कर्पूरी ठाकुर, जिन्हें मरणोपरांत भारत रत्न देने का मोदी सरकार ने किया एलान

कुछ ही देर बाद उन्होंने यह ट्वीट डिलीट कर दिया और उसमें खास तौर पर इसके लिए 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद' दिया। हफ्ते भर भी नहीं हुए हैं, जब एक समाचार पत्र के सवाल पर गृहमंत्री अमित शाह ने किसी के लिए भी दरवाजा बंद नहीं होने का संकेत देकर, नीतीश को एक और चांस देने का संदेश दिया था।

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