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Shaheed Divas 2023: भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को एक दिन पहले ही क्यों दे दी गई थी फांसी?

Martyrs day 23 march: देश के तीन वीर सपूतों और क्रांतिकारियों भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को तय समय और तारीख से पहले ही फांसी की सजा दे दी गई। इसके पीछे का कारण ब्रिटिश सरकार का खौफ था।

Bhagat Singh Martyrdom

Shaheed Diwas 2023: 23 मार्च का दिन समस्त देशवासियों के लिए बेहद अहम है, क्योंकि इस दिन को शहीदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। आज ही का वो दिन था, जब देश के तीन वीर सपूतों को अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी। भारत माता की आजादी के खातिर ये तीन सपूत फांसी के तख्त पर चढ़ गए थे। लेकिन जब फांसी की तारीख 24 मार्च तय थी, तो 22 मार्च को ही क्यों अंग्रेज सरकार ने सारी तैयारियां शुरू कर दी थीं? और 23 मार्च को यानी मुकर्रर तारीख से 11 घंटे पहले ही क्यों तीनों को फांसी दे दी गई? आइये हमारे वीर सपूतों की शहादत से जुड़े इन अहम सवालों के जवाब खोजते हैं।

आखिर क्यों दी गई फांसी की सजा?
बात है साल 1928 के उस दिन की, जब अंग्रेज पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस हत्या के मुकदमे के लिए लॉर्ड इरविन ने एक स्पेशल ट्रिब्यूनल का गठन किया था। मामले में देश के तीन क्रांतिकारियों भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी देने के लिए 24 मार्च का दिन तय किया गया। लेकिन फांसी तीनों सपूतों को 23 मार्च को दी गई। इसका कारण भी बेहद अहम है।

आनन-फानन मेंबदला गया फैसला
लेकिन दो दिन पहले ही यानी 22 मार्च को अंग्रेज सरकार ने देश के तीन वीर सपूतों भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी देने की सारी तैयारियां पूरी कर लीं। इसके बाद 23 मार्च यानी फांसी के लिए मुकर्रर तारीख और दिन से पूरे 11 घंटे पहले तीनों सपूतों को लाहौर के सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई। इसका सबसे अहम कारण फांसी के तय दिन पर होने वाले किसी भी हंगामे से बचना था। तीनों क्रांतिकारियों के समर्थन में उतरे देश के लोगों से अंग्रेजी हुकूमत को डर था। अंग्रेजों को डर था कि फांसी के तय दिन किसी तरह का हंगामा ना खड़ा हो जाए।

क्यों सुनाई गई थी सजा?
साल 1928 की बात है, जब अंग्रेस पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने लाहौर में गोली मार दी थी। इसके बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को सेंट्रल असेंबली में बम फेंके और देश की आजादी के नारे लगाए। बम फेंके जाने के बाद ही दोनों को ब्रिटिशर्स ने गिरफ्तार कर लिया था। इसके बाद उन्हें करीब दो साल की सजा सुनाई गई।

जेल से भी गूंजती रही दमदार आवाज
जेल में रहते हुए भी भगत सिंह ने देश की आजादी के लिए अपनी आवाज को बुलंद रखना जारी रखा। जेल के अंदर से भी वे क्रांतिकारी लेख लिखा करते थे और अपने विचारों को व्यक्त करते थे। अपने लेख में वे अंग्रेजों के साथ-साथ वे उन लोगों और पूंजीपतियों का जिक्र भी किया करते थे, जिन्हें वे अपना दुश्मन मानते थे। भगत सिंह के लेखों का असर लोगों पर खूब पड़ा और उनकी गिरफ्तारी और फांसी को लेकर देश के कोने-कोने से विरोध के स्वर गूंजने लगे। विरोध के ये स्वर अंग्रेज सरकार को डराने लगे।

23 मार्च को हंसते-हंसते फांसी चढ़े फांसी
दो साल की कैद के बाद तय समय के मुताबिक, भगत सिंह, सुखदेव और गुरुदेव को 24 मार्च 1931 को फांसी दी जानी थी। पूरे देश के लोग वीर सपूतों की फांसी को लेकर बुरी तरह से भड़के हुए थे। जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। भारतीयों के आक्रोश से अंग्रेज सरकार भी बुरी तरह से डर गई थी। ऐसे में फांसी की मुकर्रर तारीख के दिन कोई हंगामा ना हो, अंग्रेज सरकार ने अचानक फांसी का दिन और समय बदल दिया। भगत सिंह को तय समय से 11 घंटे पहले ही 23 मार्च को शाम 7:30 बजे फांसी पर चढ़ा दिया गया। फांसी के फंदे पर चढ़ते हुए भी भगत सिंह के चेहरे पर मुस्कान कायम थी।

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