BBC SPECIAL: आसाराम को सज़ा के दिन अदालत में ये सब हुआ

आसाराम
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नाबालिग बच्ची से बलात्कार के मामले में जब आसाराम को जोधपुर जेल में सजा सुनाई गई तब सुरक्षा कारणों से जोधपुर पुलिस ने शहर की केन्द्रीय जेल को किले में तब्दील कर दिया था.

जज मधुसूदन शर्मा, अभियुक्त आसाराम, दोनों पक्षों के कुल 14 वकीलों और जोधपुर पुलिस के चुनिंदा आला अधिकारियों के अलावा किसी को भी इस विशेष 'जेल न्यायालय' में कदम रखने की इजाज़त नहीं थी.

आख़िर जोधपुर जेल में क्या हुआ था 25 अप्रैल को फ़ैसले के वक़्त? पीड़िता के वकील पीसी सोलंकी शुरू से लेकर अंत तक इस विशेष अदालत में मौजूद थे. बीबीसी से विशेष बातचीत में उन्होंने इस निर्णय के साथ-साथ कड़ी चौकसी के बीच हुई इस विशेष सुनवाई का भी पूरा ब्यौरा दिया.

25 अप्रैल को सुबह 8 बजे सोलंकी सबसे पहले जोधपुर के उस विशेष सत्र न्यायलय पहुंचे जहां बीते 5 सालों से इस मामले की सुनवाई चल रही थी. अन्दर बैठे जज मधुसूदन शर्मा एक 'परमिशन लिस्ट' पर अंतिम फ़ैसला कर रहे थे.

इस 'परमिशन लिस्ट' पर उन सभी लोगों के नाम लिखे जा रहे थे जिन्हें आज की सुनवाई के दौरान जोधपुर की केन्द्रीय जेल में मौजूद रहने की अनुमति थी.

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जोधपुर सेंट्रल जेल
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जोधपुर सेंट्रल जेल

पहले आया शिवा और प्रकाश पर फ़ैसला

आसाराम के वकील सज्जन राज सुराना अपनी टीम में शामिल असिस्टंट वकीलों की संख्या बढ़वाने की अनुमति मांग रहे थे. तक़रीबन आधे घंटे बाद अंतिम 'परमिशन लिस्ट' तैयार हो गई.

इस लिस्ट में आसाराम की तरफ से मौजूद रहने वाले 12 वकीलों के जत्थे को सुनवाई में रहने की अनुमति मिली. पीड़िता की तरफ से सिर्फ़ 2 वकीलों- पीसी सोलंकी और सरकारी वकील पोकर राम अभियोजन पक्ष की पूरी ज़िम्मेदारी संभाल रहे थे.

सोलंकी बताते हैं, "इसी बीच नीचे उतरकर मैंने एक बार पीड़िता के पिता से फ़ोन पर बात की तो वह फूट-फूट कर रोने लगे. मैंने उनको समझाया और हिम्मत बंधाते हुए कहा कि बस थोडा सब्र और करें. इसके बाद उनके चेहरे पर हंसी होगी."

लगभग सुबह साढ़े नौ बजे जज मधुसूदन शर्मा की विशेष अदालत पूरे साजो-सामान और सरकारी अमले के साथ केन्द्रीय जेल के लिए रवाना हुई. जेल की तरफ रवाना हुए गाड़ियों के इस लंबे काफिले में पुलिस जीपों के बीच सबसे पहले जज मधुसूदन शर्मा की गाड़ी, उनके पीछे आसाराम के वकीलों की गाड़ियाँ और अंत में पीड़िता के वकीलों की गाड़ियां थीं.

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आसाराम के वकील सज्जन राज सुराना
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आसाराम के वकील सज्जन राज सुराना

ठीक सवा 10 बजे जोधपुर की केन्द्रीय जेल में जज मधुसूदन शर्मा ने इस मामले से जुड़ी अदालत की अंतिम कार्यवाही शुरू की. सोलंकी बताते हैं, "जज साहब ने अगले 15 मिनट में ही फ़ैसला सुना दिया. फ़ैसला सुनाते हुए उन्होंने सबसे पहले कहा की आरोपी शिवा और प्रकाश को दोषमुक्त करार दिया जाता है."

"जैसे ही उन्होंने यह कहा तो हमें एक पल को झटका-सा लगा. पर मुझे तुरंत ही समझ में आ गया कि यदि यह दो दोषमुक्त हैं तो बाकियों को सज़ा होगी."

इस बीच सफ़ेद लुंगी और सफ़ेद अंगोछे में आसाराम अपने वकीलों के बीच आश्वस्त बैठे थे. सोलंकी बताते हैं, "शुरू में शायद उन्हें उम्मीद थी की कोई चमत्कार हो जाएगा और उन्हें सज़ा नहीं होगी. इसलिए जब शुरुआत में वह आए तो मुझसे बोले, 'बाहर हरिद्वार में मिलना. आना हरिद्वार'.पर इसके तुरंत बाद जज ने अपना फ़ैसला सुनाकर उनके हरिद्वार जा पाने के सपनों पर हमेशा के लिए ताला लगा दिया."

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सज़ा सुन कर हमें राहत मिली

सोलंकी कहते हैं, "जज ने आईपीसी की धारा 342 से शुरुआत की और कहा की इस धारा के तहत पीड़िता को ग़लत तरीके से कैद में रखने के लिए अभियुक्त आसाराम को एक साल का सश्रम कारावास दिया जाता है और 1000 रुपये का जुर्माना लगाया जाता है."

"इसके बाद उन्हें धारा 370(4) के तहत दस साल का सश्रम कारावास सुनाया और उन पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया. हमारा मतलब सिर्फ आसाराम को अधिकतम सजा दिलवाने का था. इसके बाद जज साहब ने आईपीसी की धारा 376(2)(एफ़) के आरोप में सज़ा सुनाते हुए कहा कि अभियुक्त आसाराम को अपने बचे हुए जीवनकाल के लिए सश्रम कारावास दिया जाता है. यह सज़ा आजीवन कारावास से भी ज़्यादा है इसलिए इसे सुनकर हमें कुछ राहत मिली."

अभियुक्त शिल्पी और शरत को भी आपराधिक षड्यंत्र में शामिल रहने के लिए और अपराध को प्रोत्साहित करने के लिए 20-20 साल की सज़ा सुनाई गई. इसके साथ ही अदालत ने जुर्माने की कुल रकम-लगभग 5 लाख रुपये -पीड़िता को बतौर मुआवज़ा दिलवाने का आदेश दिया.

सोलंकी बताते हैं, "सज़ा के वक़्त तक आसाराम के वकीलों के चेहरे बुझ गए थे. उन्हें समझ आ गया था कि मामला कहां जा रहा है. आसाराम शुरू में सामान्य थे. जैसे ही आजीवन कारावास का फ़ैसला सुनाया गया मैंने देखा, उनके चेहरे पर डर और सदमे के भाव थे. शिल्पी और शरत रो रहे थे लेकिन असाराम की आँखों में एक आंसू नहीं आया."

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सोलंकी बताते हैं, "सज़ा की लंबाई पर जिरह रहते हुए आसाराम के वकीलों ने उनके 'बुज़ुर्ग' होने की दलील दी. कहा कि आसाराम को देश के कई प्रधानमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों ने प्रशस्ति पत्र दिए हैं, उन्होंने कई सामाजिक कार्य किये हैं. ग़रीब बच्चों को कपड़े दिए हैं. इसलिए उनके सामाजिक व्यवहार को देखते हुए उन्हें कम सज़ा दी जाए."

सोलंकी बताते हैं, "मैंने कहा कि कुछ बच्चों को कपड़े देने से आसाराम को इस बात का लाइसेंस तो नहीं मिल जाता कि वो कहीं भी अपने कपड़े उतारकर खड़े हो जाएं और एक बच्ची के साथ दुराचार करें. और वैसे भी फरवरी 2013 में बलात्कार के कानून में हुए संशोधनों के बाद अपराध सिद्ध होने पर 'कम सज़ा' देने का प्रावधान समाप्त कर दिया गया है."

"यह तर्क हमने जज साहब के सामने रखा और इसके बाद उन्होंने आसाराम को आजीवन क़ैद में रखने का आदेश दिया."

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सोलंकी का हुआ स्वागत

फ़ैसले के बाद पीड़िता के पुनर्वास और बेहतर जीवन के लिए उनके वकीलों ने मुआवज़े की अर्जी अदालत में पेश की जिसे स्वीकार कर लिया गया. जिला विधि विभाग को इस मामले में आगे कार्यवाही करने का आदेश दिया गया है.

5 साल तक देश के सबसे नामी-गिरामी वकीलों से लोहा लेने के बाद आसाराम जैसे प्रभावशाली व्यक्ति को जेल की सलाखों तक पहुँचाने वाले पीसी सोलंकी के लिए कई जगहों से बधाई सन्देश आए.

पुराने जोधपुर में मौजूद उनके निवास पर ख़ुशी का माहौल था. कड़ी पुलिस सुरक्षा के बीच जब सोलंकी घर पहुंचे तो उनकी माँ ने फूल माला से उनका स्वागत किया.

पूछने पर सोलंकी ने कहा कि इतनी लंबी लड़ाई के बाद इस ऐतिहासिक फ़ैसले में पीड़िता को न्याय मिला हो और इससे न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा बढ़ेगा.

फ़ैसले के बाद अब आसाराम के वकीलों ने कहा कि वो इसके ख़िलाफ़ अब हाईकोर्ट का रुख़ करेंगे.

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