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बीबीसी 100 वीमेन: क्या औरतों का गुस्सा बढ़ रहा है?

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गैलप नाम की संस्था हर साल दुनिया भर में एक सर्वे करती है. इस सर्वे के नतीजे बताते हैं पिछले 10 साल में महिलाएं ज़्यादा गुस्सैल हुई हैं. आख़िर इसकी वजह क्या है..?

दो बरस पहले तहाशा रीनी अपने किचन में खड़ी थीं. तभी अचानक वो किसी बात पर ज़ोर से चीख पड़ीं. ये सुनकर तहाशा खुद भी हैरान रह गईं.

तहाशा बताती हैं "गुस्सा एक सहज भाव है जो मुझे भी अक्सर आता है. लेकिन उस दिन जो गुस्सा मैंने महसूस किया, वैसा पहले कभी नहीं किया था."

वो कोरोना महामारी के भयावह दिन थे. तहाशा इसकी वजह से बुरी तरह परेशान थीं. उस दिन पिछले 20 मिनट से वो अपने घर के बाहर चहलकदमी कर रही थीं, ये सोचते हुए कि आख़िर उनका गुस्सा किन-किन चीज़ों की वजह से बढ़ रहा है.

इसी दौरान जब वो अचानक चीख़ पड़ीं तो लगा उनके अंदर का पूरा ग़ुबार निकल गया है. उन्हें राहत महसूस हुई.

तहाशा एक हिप्नोथेरेपिस्ट (सम्मोहन चिकित्सक) और 'लाइफ़ कोच' हैं. वो लोगों को बेहतर जीवन जीने के सलीक़े सिखाती हैं. उस घटना के बाद वो दुनिया भर की महिलाओं से संपर्क करती हैं. ज़ूम मीटिंग के ज़रिए वो उन्हें बताती हैं कि किस तरह ज़ोर से बोलकर, चीख़ कर अपने रोष को बाहर निकालना है.

'गैलप वर्ल्ड पोल' में ऐसी ही महिलाओं को शामिल किया गया था. बीबीसी ने इसी सर्वे के 10 साल के डेटा का विश्लेषण किया. इसके मुताबिक़ महिलाएं पहले से ज़्यादा गुस्सैल हो रही हैं.

इस सर्वे में हर साल 150 देशों में एक लाख 20 हज़ार लोगों से बात की जाती है. उनसे दूसरी चीज़ों के साथ ये भी पूछा जाता है कि 'पिछले दिन वो कौन-सा इमोशन था जिसे आपने सबसे ज़्यादा महसूस किया.'

इस दौरान ये पता चला कि गुस्सा, उदासी, अवसाद और घबराहट जैसे नकारात्मक एहसासों को पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं ने ज़्यादा महसूस किया.

सर्वे के विश्लेषण में बीबीसी ने पाया कि 2012 के बाद हालांकि उदासी और घबराहट जैसे भाव पुरुष भी ज़्यादा महसूस कर रहे हैं, लेकिन महिलाओं के मामले में इसका ग्राफ़ ज़्यादा ऊपर चढ़ा है.

जहां तक गुस्से और अवसाद का सवाल है, इस मामले में महिलाओं ओर पुरुषों के एहसास के बीच का अंतर ज़्यादा बढ़ रहा है. 2012 में पुरुष और महिलाएं गुस्से और अवसाद का शिकार होने के मामले में बराबर थे. अब नौ साल बाद इस सर्वे से पता चलता है कि पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं को गुस्सा 6 फ़ीसदी ज़्यादा आ रहा है.

अवसाद के मामले में भी महिलाओं की स्थिति कुछ ऐसी ही है. ये वृद्धि महामारी के 2 सालों में ज़्यादा तेज़ी से हुई है.

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ये आंकड़ा सारा हरमन को क़तई नहीं चौंकाता. अमेरिका की रहने वाली सारा हरमन एक चिकित्सक हैं. 2021 की शुरुआत में इन्होंने अपनी महिला मरीज़ों का एक ग्रुप बनाया जिनके साथ फ़ील्ड में खड़ी होकर वो ज़ोर से चीख़ती हैं.

सारा कहती हैं, "मैं दो छोटे बच्चों की मां हूं. 'वर्क फ़्रॉम होम' करते हुए मैंने महसूस किया कि मेरे अंदर गहरी निराशा और रोष लगातार बढ़ रहा है."

इसके एक साल बाद वो अपने ग्रुप के साथ फ़ील्ड में थीं. इसी दौरान उनकी चीख़ का एक वीडियो वायरल हो गया. सारा बताती हैं "वो वीडियो एक जर्नलिस्ट ने अपनी मां के ऑनलाइन ग्रुप से उठाया था. उस वीडियो के वायरल होने के बाद मेरे फ़ोन पर दुनिया भर से लोगों के फ़ोन आने लगे."

उस घटना के बाद सारा को ये एहसास हुआ कि महामारी और महिला होने के नाते इसका जो दबाव उन पर पड़ रहा था, और जिसकी वजह से वो निराश और बेचैन महसूस कर रही थीं, उसकी पीड़ित सिर्फ़ वो नहीं हैं, बल्कि दुनिया भर की महिलाएं इससे गुज़र रही हैं.

ये बात 2020 में 'इंग्लैंड के 'इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़िस्कल स्टडीज़' के एक सर्वे में भी साफ़ हुई. 5000 दंपतियों पर कराए गए इस सर्वे में ये सामने आया कि लॉकडाउन के दौरान घरेलू कामकाज का ज़िम्मा पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं ने ज़्यादा उठाया. इसकी वजह से उनके दफ़्तर के काम के घंटे भी कम हुए. ऐसा उन महिलाओं के साथ भी हुआ जो अपने पतियों समेत पूरे परिवार में सबसे ज़्यादा सैलरी पाती थीं.

सर्वे के मुताबिक़ ऐसे कई देश हैं जहां की महिलाओं का गुस्सा पुरुषों के मुक़ाबले ग्लोबल ऐवरेज़ से ज़्यादा है. सबसे ज़्यादा ये कंबोडिया में पाया गया. ग्लोबल ऐवरेज से 17 फ़ीसदी ज़्यादा. जबकि पाकिस्तान और भारत में ये 12 फ़ीसदी ज़्यादा था.

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भारतीय महिलाएं हो रही हैं ज़्यादा गुस्सैल

महिलाओं में बढ़ते गुस्से की एक बड़ी वजह मनोचिकिस्क डॉक्टर लक्ष्मी विजय कुमार बताती हैं. उनके मुताबिक़ तनाव और गुस्से की बड़ी वजह है इन देशों में महिलाओं की शिक्षा, रोज़गार और आर्थिक आत्मनिर्भरता के स्तर का बढ़ना.

डॉक्टर लक्ष्मी आगे बताती हैं "बढ़ती आत्मनिर्भरता के साथ महिलाएं पुरातन और पितृसत्तात्मक संस्कृति होने की वजह से तमाम पाबंदियों का भी सामना करती हैं. घर के अंदर पितृसत्तात्मक व्यवस्था और घर के बाहर का मुक्त माहौल, इन दोनों के बीच अंतर बड़ा होने की वजह से महिलाओं में गुस्सा ज़्यादा बढ़ता है."

चेन्नई में हर शुक्रवार की शाम जब दफ़्तरों से घर पहुंचने की जल्दी होती है, डॉक्टर लक्ष्मी इस आपाधापी को प्रत्यक्ष महसूस करती हैं. वो बताती हैं "आप पुरुषों को देख सकते हैं. वो बड़े आराम से वो चाय-सिगरेट की दुकानों पर जाते हैं, जबकि महिलाएं जल्दी से जल्दी बस या ट्रेन पकड़ने की कोशिश में होती हैं.

वो सोचती हैं कि आज खाना क्या बनाएंगे. कई महिलाएं तो घर लौटने के रास्ते में ही सब्ज़ी काटती हुई दिख जाती हैं."

डॉक्टर लक्ष्मी बताती हैं, "कुछ बरस पहले ये बड़ा अटपटा माना जाता था जब कोई महिला कहती थी कि वो गुस्से में हैं. लेकिन अब चीज़ें काफी बदल रही हैं. अब महिलाएं अपनी भावनाएं ज़्यादा खुलकर जाहिर करती हैं, यही बात गुस्से के साथ भी है."

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10 साल में महिलाओं का विकास कितना?

'बीबीसी 100 वीमेन' हर साल दुनिया भर से 100 प्रभावशाली महिलाओं की सूची जारी करता है. इस साल बीबीसी ने पिछले 10 साल में महिलाओं के स्तर में हुई बेहतरी को पैमाना बनाया है. इस पर 2012 के बाद से 15 देशों की महिलाओं की स्थिति में क्या बदलाव आया है, ये जानने के लिए बीबीसी ने 'सावंता कॉमरेज' को अधिकृत किया है. इसके मुताबिक़:-


  • सर्वे वाले देशों में कम से कम आधी महिलाओं ने ये बताया कि 10 साल पहले के मुक़ाबले अपने आर्थिक फ़ैसले ज़्यादा मज़बूती से ले पाती हैं.
  • अमेरिका और पाकिस्तान को छोड़कर सर्वे वाले सभी देशों की क़रीब आधी महिलाओं ने बताया कि अपने रोमांटिक पार्टनर से सहमति को लेकर ज़्यादा आसानी से बात कर पाती हैं.
  • सर्वे वाले सभी देशों में 66% से ज़्यादा महिलाओं ने कहा कि सोशल मीडिया ने उनकी ज़िंदगी में सकरात्मक बदलाव किया है. सिर्फ़ अमेरिका और ब्रिटेन में ऐसी महिलाओं की तादाद 50% सामने आई.
  • 15 में से 12 देशों की 40% से ज़्यादा महिलाओं ने माना कि पिछले 10 साल में उन्हें अपनी ज़िंदगी और भविष्य के विकास को लेकर अपनी राय जाहिर करने की आज़ादी ज़्यादा मिली है.
  • अमेरिका की 46% महिलाओं ने माना 10 साल पहले जितने सुरक्षित तरीके से वो गर्भपात करा पाती थीं, वैसी मेडिकल सुविधाओं तक पहुंच अब नहीं है.

महिलाओं के गुस्से के मामले में महामारी का प्रभाव भी बड़ा कारक हो सकता है. संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका की डेटा साइंटिस्ट जेनेट एज़कोना के मुताबिक़, 2020 से पहले वर्क फ़ोर्स में महिलाओं की भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ रही थी. लेकिन 2020 में ये भी रुक गई.

इस साल तो हालत ये है कि 169 देशों में कामकाजी लोगों में महिलाओं की भागीदारी 2019 के स्तर से भी नीचे पहुंच गई है. महिलाओं के गुस्से पर 2019 में एक किताब 'रेज बिकम्स हर' लिखने वाली अमेरिका की नारीवादी लेखिका सोराया केमाले बताती हैं, "हमारा श्रम बाज़ार (लेबर मार्केट) लैंगिक भेदभाव के आधार पर काम करता है."

सोराया के मुताबिक़, ''महामारी की वजह से जिन इंडस्ट्रीज़ पर ख़राब असर पड़ा है उसमें ज़्यादातर महिलाओं की बहुलता वाले हैं, जैसे केयर इंडस्ट्री.

महिलाएं यहां जो काम करती हैं उसके बदले बहुत ही कम पगार दी जाती है. इसके साथ ये उम्मीद भी की जाती है कि वे बिना थके लगातार काम करती रहें. इसकी कोई सीमा निर्धारित नहीं इसलिए इन लोगों में गुस्सा, रोष और आक्रोश ज़्यादा बढ़ता है."

सोराया बताती हैं कि यही हाल शादीशुदा महिलाओं का भी है. इसे लेकर अमेरिका में काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है कि किस तरह महामारी ने महिलाओं के गुस्से को प्रभावित किया. लेकिन गैलप वर्ल्ड पोल के नतीजों से ये साफ़ नहीं होता कि यहां की महिलाओं को पुरुषों के मुक़ाबले ज़्यादा गुस्सा आता है.

सोराया बताती हैं, "अमेरिका में महिलाएं गुस्से को शर्म की बात समझती हैं. इसलिए संभव है, उनका गुस्सा अवसाद या गहरी निराशा के रूप में बाहर आता हो."

ये एक तथ्य भी है कि अमेरिका में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं निराशा और अवसाद की शिकार ज़्यादा होती हैं.

ये दूसरे देशों के लिए भी उतना ही सच है. जैसे सर्वे में शामिल किए गए ब्राज़ील, उरुग्वे, पेरू, साइप्रस और ग्रीस जैसे देश. ब्राज़ील में हर 10 महिलाओं में से 6 ने ये माना कि पिछले दिन उन्होंने स्ट्रेस ज़्यादा महसूस किया. जबकि ये बात 10 पुरुषों में से चार ने ही मानी.

लेकिन तहाशा रीनी कहती हैं अमेरिका समेत क़रीब हर देश में महिलाएं उस स्तर तक पहुंच चुकी हैं, जहां वो आसानी से कह पाती हैं- बस अब और नहीं.

तहाशा कहती हैं, "एक तरह से ये स्वागत योग्य बदलाव है. इस बदलाव के लिए महिलाएं अपने गुस्से का इस्तेमाल कर रही हैं."

जेनेट एज़कोना भी कहती हैं "कई बार आपको अपना गुस्सा और रोष जाहिर करने की ज़रूरत होती है, ताकि चीज़ें बदल सकें और लोग आपको सुनें, आपकी तरफ़ ध्यान दें"

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सर्वेक्षण का तरीका

गैलप हर साल 150 देशों में एक लाख 20 हज़ार लोगों से बातचीत करता है. जो दुनिया की 98% से ज़्यादा वयस्क आबादी का प्रतिनिध्व करते हैं.

हर देश से इनका चुनाव रैंडम तरीके से किया जाता है. सर्वे के दौरान इनसे सीधे फ़ोन पर बातचीत की गई. इसमें गंलतियों की संभावना देश और सवालों पर निर्भर करती है.

मिसाल के तौर पर जब छोटे सैंपल साइज़ में जवाबों का बंटवारा जेंडर के आधार पर किया जाता है तो ग़लती की संभावना ज़्यादा होती है. 2021 के लिए गैलप पोल का पूरा डेटा यहां से डाउनलोड किया जा सकता है.

सावंता कॉमरेज ने 18 साल से ज़्यादा उम्र की 15,723 महिलाओं को ऑनलाइन सर्वे में शामिल किया. इसमें से 1067 मिस्र से, 1022 केन्या से, 1018 नाइजीरिया से, 1109 मेक्सिको से, 1042 अमेरिका से, 1008 ब्राज़ील से, 1025 चीन से, 1107 भारत से, 1061 इंडोनेशिया से, 1006 पाकिस्तान से, 1010 रूस से, 1160 टर्की से, 1067 ब्रिटेन से और 1009 यूक्रेन से थीं.

ये सर्वे इस साल 17 अक्टूबर से लेकर 16 नवंबर के बीच किया गया. हर देश के सर्वे नतीजों में ग़लती की संभावना +/-3 तक हो सकती है. पूरा डेटा यहां से डाउनलोड किया जा सकता है.


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क्या है 100 वीमेन?

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ये भी पढ़ें:- क्या भारत में महिलाओं का वेतन मर्दों के बराबर है- - BBC News हिंदी

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