अयोध्या: सबसे पुराने मुक़दमे में फ़ैसला आने पर क्या-क्या हो सकता है?

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दो फुटबॉल मैदानों के बराबर ज़मीन पर झगड़ा भारत के इतिहास का सबसे लंबा विवाद है लेकिन ये साधारण ज़मीन नहीं है.

अयोध्या में पौने तीन एकड़ की इस ज़मीन से हिन्दू और मुस्लिम समाज की आस्था जुड़ी है. मामला सालों से अदालत में है लेकिन ऐसा लगता है कि अब फै़सले की घड़ी नज़दीक है.

अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट में लगभग डेढ़ महीने लगातार चली सुनवाई बुधवार को ख़त्म हुई. देश भर में माहौल गर्म है.

अयोध्या में धारा 144 लागू कर दी गई है. देश के इतिहास में सबसे लंबे समय तक चलने वाले मुक़दमे का फ़ैसला आने वाला है.

मुक़दमे में शामिल पार्टियों के दिलों की धड़कने तेज़ हुई हैं. तीनों पक्षों को उम्मीद है कि अदालत का फ़ैसला उनके पक्ष में आएगा.

अयोध्या फैसला
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पांच जजों की पीठ सुनाएगी फ़ैसला

इन तीनों पार्टियों की दलीलों का फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ के हाथों में है.

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई 17 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं और माना जा रहा है कि फ़ैसला उससे एक-दो दिन पहले सुनाया जा सकता है. इस तरह साल 1949 से चला आ रहा राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद समाप्त हो सकता है.

राजनीतिक तौर पर बेहद संवेदनशील माने जाने वाले इस मामले में तीन मुख्य पार्टियां हैं, दो हिन्दू पक्ष और एक मुस्लिम पक्ष.

हिन्दू पक्ष में से एक यानी निर्मोही अखाड़े ने 1959 में अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था. सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने 1961 में और रामलला विराजमान ने 1989 में अदालत का रुख किया था. तीनों मुख्य पक्ष 2.77 एकड़ ज़मीन की मिलकियत का दावा करते हैं.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने 2010 के ऐतिहासिक फ़ैसले में विवादास्पद भूमि को तीनों पक्षों के बीच बाँट दिया था. इस फ़ैसले के अंतर्गत राम लला विराजमान को वो जगह मिली जहाँ पर भगवन राम के जन्म स्थान होने का दावा किया जाता है यानी वो जगह जहाँ बाबरी मस्जिद हुआ करती थी.

ये अंदर का हिस्सा है. इसके बाहर वाली भूमि को निर्मोही अखाड़ा के हवाले किया गया था और उसके बाहर की ज़मीन सुन्नी वक़्फ बोर्ड की मिलकियत में दी गई थी.

नाकाम रही मध्यस्थता

लेकिन इस फ़ैसले को तीनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. इस पर सुनवाई 2011 में शुरू होनी थी. सालों के विलंब के बाद आख़िर सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई कुछ हफ़्ते पहले शुरू की और 40 दिनों तक लगातार चली सुनवाई 16 अक्टूबर को समाप्त हुई.

लेकिन इससे पहले यानी 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट की नियुक्त की गई तीन सदस्यों वाली मध्यस्थता समिति ने एक अगस्त को अपनी रिपोर्ट अदालत को पेश की थी.

तीनों पक्षों के अनुसार वो मध्यस्थता नाकाम रही थी. अब मध्यस्थता समिति ने दूसरे राउंड की रिपोर्ट भी अदालत को पेश की है. अभी ये साफ़ नहीं है कि इस रिपोर्ट में क्या है. सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता की रिपोर्टिंग पर रोक लगा रखी है.

अब फ़ैसले का समय क़रीब है तो तीनों पक्ष ये उम्मीद लगाए बैठे हैं कि फ़ैसला उनके पक्ष में होगा. कुछ लोग ये भी कहते हैं कि थोड़े बदलाव के साथ इलाहबाद हाई कोर्ट का फै़सला क़ायम रखा जाए हालांकि न्यायिक प्रक्रिया को लेकर इस तरह की अटकलों का कोई मतलब नहीं है.

सभी पक्ष अलग-अलग संभावित नतीजों पर ग़ौर कर रहे हैं, वे संभावित नतीजे कुछ इस तरह हैं.

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अगर इलाहबाद हाई कोर्ट का फ़ैसला बरक़रार रहा तो?

अगर ऐसा हुआ तो राम लला और निर्मोही अखाड़े में से मंदिर कौन बनाएगा? हिन्दू पक्षों के बीच सहमति इस बात पर ज़रूर है कि राम मंदिर का निर्माण हो लेकिन निर्माण कौन करे इसमें आपसी मतभेद है.

निर्मोही अखाड़े के कार्तिक चोपड़ा कहते हैं कि जीत उनकी हुई तो मंदिर वो बनाएंगे, "अगर पुराना फै़सला बरक़रार रहा तो हम हिन्दू समाज और साधु-संतों के साथ मिलकर एक भव्य राम मंदिर का निर्माण करेंगे."

विश्व हिन्दू परिषद, हिंदुओं के दूसरे पक्ष रामलला विराजमान के साथ है. इसके एक वरिष्ठ अधिकारी चंपत राय कहते हैं कि मंदिर रामजन्म भूमि न्यास बनाएगा.

राम जन्मभूमि न्यास अयोध्या में मंदिर के निर्माण को बढ़ावा देने और उसकी देखरेख करने के लिए एक ट्रस्ट के रूप में गठित एक संगठन है.

चंपत राय का कहना था कि न्यास ने छह करोड़ हिंदू जनता से पैसे जुटाए हैं और मंदिर बनाने की पूरी तैयारी कर ली गयी है, "लगभग 60 प्रतिशत बिल्डिंग मटीरियल तैयार है. हम मंदिर बनाने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं."

अयोध्या फैसला
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लेकिन मंदिर की देखरेख कौन करेगा? चंपत राय कहते हैं पहले मंदिर बन जाए तो ये फै़सला भी हो जाएगा कि पैसे कौन खर्च करेगा और इसकी देख-रेख कौन करेगा. वैसे उनके अनुसार न्यास का गठन इन्हीं कामों के लिए हुआ है. मूर्ति श्रीराम के बाल रूप रामलला की बैठाई जाएगी या धनुष वाले राम की?

निर्मोही अखाड़ा राम लला के बजाए धनुष वाले भगवान राम की प्रतिमा लगाने पर ज़ोर देता है जबकि राम लला विराजमान के पक्ष में बोलने वाले कहते हैं कि मूर्ति तो रामलला की 1949 से लगी है उन्हीं की मूर्ति स्थापित की जाएगी.

चंपत राय कहते हैं, "मूर्ति रामलला की होगी, इसमें कोई संदेह नहीं है."

अगर फ़ैसला सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के पक्ष में आया तो?

हाल में कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने एक बयान में कहा था कि अगर अदालत का फै़सला मुस्लिम पक्ष में जाए भी तो उन्हें इस स्थान को हिन्दुओं के हवाले कर देना चाहिए.

क्या मुस्लिम पक्ष की ओर से पक्षकार इक़बाल अंसारी इस सुझाव से सहमत हैं? इसका जवाब वो सीधे तौर पर 'नहीं' देते हैं.

वो कहते हैं, "देखिए, अभी फै़सला आया नहीं है. बुद्धिजीवी और दूसरे लोग इस मसले पर लगे हुए हैं. अगर वो इस मसले पर लगे हैं तो हम उनका स्वागत करते हैं. हम चाहते हैं कि इस मसले को कोर्ट के माध्यम से ही तय कराया जाए. अब फै़सले का समय आ गया है, हो सकता है ये तय हो जाए."

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निर्मोही अखाड़ा ये सोचना ही नहीं चाहता कि फै़सला इसके पक्ष नहीं आएगा. वो मुस्लिम पक्ष को एक दावेदार की हैसियत से मान्यता ज़रूर देता है लेकिन इसे उम्मीद है कि अदालत का फै़सला उसके पक्ष में आएगा.

राम लला विराजमान के मुख्य पुजारी सत्येंद्र दास कहते हैं कि ऐसा नहीं होगा. आख़िर क्यों?

वो इशारे में कहते हैं कि ज़रूरत पड़ी तो सरकार मंदिर बनाने के लिए एक अध्यादेश ला सकती है, "इस पर हमारे प्रधानमंत्री कह चुके हैं कि पहले आप कोर्ट पर विश्वास कीजिए, उन्होंने कहा है कि कोर्ट का निर्णय जब तक नहीं आ जाता तब तक कोई अध्यादेश नहीं लाएंगे."

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अगर फै़सला रामलला के हक़ में जाता है तो क्या होगा?

निर्मोही अखाड़े से जुड़े 94 वर्षीय राजाराम चंद्रा आचार्य कहते हैं, "रामलला भी हमारे हैं. हमने अदालत से इसका चार्ज (मैनेजमेंट) माँगा है. भगवान की सेवा और पूजा करने के लिए अधिकार मांगा है."

तरुणजीत वर्मा अखाड़े की तरफ़ से मध्यस्थता समिति की बैठकों में भाग ले चुके हैं. उनका कहना है कि निर्मोही अखाड़ा ने 1866 से 1982 तक रामलला की सेवा की है. वो केवल अपना खोया हुआ अधिकार वापस मांग रहे हैं.

निर्मोही अखाड़े से ही जुड़े कार्तिक चोपड़ा के अनुसार रामलला की असल देखभाल करने वाला केवल निर्मोही अखाड़ा ही है, "रामलला की तरफ़ से जो मुक़दमा फ़ाइल किया गया है वो उसकी तरफ़ से अपने आपको रामलला का दोस्त मानता है (राम लला की तरफ़ केस फाइल करने वाले थे रिटायर्ड जस्टिस देवकी नंदन अग्रवाल जिन्होंने 1989 में ये केस फाइल किया था). परम मित्र और परम सेवक (रामलला का) तो निर्मोही अखाड़ा ही है. रामलला की असली लड़ाई कोर्ट में है वो निर्मोही अखाड़ा की तरफ से है."

रामलला विराजमान के मुख्य पुजारी सत्येंद्र दास कहते हैं कि फ़ैसला चाहे जिस हिन्दू दावेदार के पक्ष में हो राम मंदिर के निर्माण में सबकी सहमति है. वो कहते हैं, "अगर फ़ैसला राम लला के पक्ष में आता है तो सभी हिंदुओं की विजय होगी."

विश्व हिंदू परिषद के एक उच्च अधिकारी चंपत राय कहते हैं कि ये सही है कि शुरू में केवल निर्मोही अखाड़ा और मुस्लिम पक्ष ही मुक़दमे में शामिल थे.

वो निर्मोही अखाड़े से पूछते हैं, ''उन्होंने 1949 से 1989 तक क्या किया? हमें 1989 में इसलिए अदालत जाना पड़ा क्योंकि निर्मोही अखाड़े के केस में क़ानूनी कमज़ोरियाँ थीं."

मुस्लिम पक्ष की प्रतिक्रिया साफ़ है. सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के इक़बाल अंसारी के अनुसार अदालत जिसके पक्ष में फ़ैसला करेगी उन्हें स्वीकार होगा.

इक़बाल अंसारी कहते हैं, "हम भी चाहते हैं कि ये मामला ख़त्म होना चाहिए. ये मामला लोअर कोर्ट, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में रहा है. ये मसला बहुत दिनों से राजनीति में रहा है और अब इसको ख़त्म होना चाहिए."

मुस्लिम समाज से समझौते के ताज़ा सुझाव पर विश्व हिन्दू परिषद् के चंपत राय कहते हैं कि मुसलमानों ने इसमें देर कर दी है.

वो कहते हैं, "बहुत देर हो गई है. हम इसे हार और जीत की तरह नहीं देखते. हमारे पक्ष में फै़सला हुआ तो हम देखेंगे कि मुस्लिम दावेदार के साथ क्या करें लेकिन अब उन्हें कुछ माँगना नहीं चाहिए. उन्हें समझौते का ऑफ़र शुरू में करना चाहिए था. अब कुछ बुद्धिजीवियों ने ये ऑफ़र किया है, हमें नहीं मालूम मुस्लिम समाज में उनका कितना असर है. अगर 40-50 मुस्लिम इमाम सामूहिक तौर ये ऑफ़र करते तो अच्छा होता. लेकिन ठीक है, ऑफ़र आया है, हम उन्हें प्रणाम करते हैं."

सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के इक़बाल अंसारी

अगर अदालत का फ़ैसला निर्मोही अखाड़े के पक्ष में गया तो?

इस पर विश्व हिन्दू परिषद के चंपत राय कहते हैं कि अगर उन्हें जीतना ही होता तो हाई कोर्ट में जीत जाते.

वो आगे कहते हैं, "मुझे तो ये देखना है कि हाई कोर्ट (इलाहबाद हाई कोर्ट) के तीन न्यायधीशों के न्यायिक निर्णय को कैसे बदला जाएगा. वहां 15 साल मुक़दमा चला था और साढ़े नौ महीने सुनवाई चली थी. यहाँ (सुप्रीम कोर्ट) तो 40 दिनों तक सुनवाई हुई. तो 15 साल के मुक़दमे और साढ़े नौ महीने की बहस के ख़िलाफ़ कैसे फै़सला दिया जाएगा. ये हमारे लिए भी उत्सुकता की बात होगी."

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सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के इक़बाल अंसारी के अनुसार अदालत की भूमिका सबसे अहम होगी.

वो कहते हैं, "दोनों (हिन्दू) पक्ष उम्मीद लगाए बैठे हैं. इसमें सरकार और अदालत का अहम रोल होगा क्योंकि ये पूरे देश का मामला है. इसमें तमाम लोग राजनीति करते आए हैं. हमें जो फै़सला अदालत देगी मंज़ूर होगा."

निर्मोही अखाड़े को उम्मीद है कि अदालत का फै़सला उनके पक्ष में ही होगा. अखाड़े के बुज़ुर्ग महंत राजाराम चंद्रा आचार्य कहते हैं कि आम हिंदू जनता राम मंदिर को लेकर गुमराह की गई है.

वो कहते हैं, ''देश में दंगे-फ़साद भी हुए हैं. अब इन लोगों ने मंदिर तोड़ा या मस्जिद तोड़ी या ढांचा तोड़ा ये तो राजनितिक लोग जवाब देंगे. चार्ज तो हमारे ही पास था. बाहर भी और अंदर भी. इसे वापस हमें ही मिलना चाहिए."

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