अयोध्या राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के बाद टेंशन में CPM, काशी-मथुरा में क्या होगा?
अयोध्या में भगवान राम लला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में केंद्र और राज्य सरकार की सक्रिय भूमिका को सीपीएम ने धर्मनिरपेक्षता की 'समाप्ति' की तरह बताया है।
मंगलवार को पार्टी की ओर से दिए गए बयान के मुताबिक ऐसा इसलिए क्योंकि 'राज्य, प्रशासन और राजनीति को धर्म से अलग रखने को ही धर्मनिरपेक्षता के रूप में परिभाषित किया गया है।'

सीपीएम सेंट्रल कमेटी की बैठक के बाद बयान
सीपीएम की ओर से केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में पार्टी की तीन दिवसयीय बैठक के बाद मंगलवार को जारी बयान में ये आरोप लगाए गए हैं।
पार्टी का कहना है कि वह धार्मिक आस्थाओं का सम्मान करती है, जो कि प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद हैं, जबकि 22 जनवरी का कार्यक्रम सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए किया गया है।
'धर्मनिरपेक्षता के लिए मौत की घंटी'
सीपीएम सेंट्रल कमेटी की ओर से जारी बयान में कहा गया है, 'अयोध्या में 22 जनवरी, 2024 को मंदिर के उद्घाटन ने वास्तव में धर्मनिरपेक्षता के लिए मौत की घंटी बजा दी है, जिसे राज्य, प्रशासन और राजनीति से धर्म से अलग रखने के रूप में परिभाषित किया गया है। पूरा कार्यक्रम सरकार की ओर से था, जिसमें प्रधानमंत्री, यूपी के मुख्यमंत्री, यूपी के राज्यपाल और प्रदेश की पूरी मशीनरी सीधे शामिल थी।'
सीपीएम ने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पर भी उठाई उंगली
यहां तक कि सीपीएम ने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति तक पर भी उंगली उठा दी है। पार्टी ने कहा है, 'भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों ने ही प्रधानमंत्री को बधाई संदेश भेजे और उनके 'संकल्प पूरे होने', 'सभ्यता के पथ पर भारत की नियति के साथ कोशिश' आदि को सराहा।'
शासन के मूल सिद्धांत का सीधा उल्लंघन-सीपीएम
पार्टी के मुताबिक, 'पूरा कार्यक्रम भारत के शासन के मूल सिद्धांत का सीधा उल्लंघन था, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया था, जो ये है कि संविधान के अनुसार राज्य की कोई धार्मिक संबद्धता या प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए।'
पार्टी का आरोप है कि 'इस कार्यक्रम का सीधा लक्ष्य राजनीतिक और चुनावी फायदा उठाना था।' वामपंथी पार्टी ने बड़े स्क्रीन पर प्राण प्रतिष्ठा समारोह के लाइव टेलीकास्ट की भी आलोचना की है। साथ ही शिक्षण संस्थानों और केंद्र सरकार के कार्यालयों में आधे दिन के अवकाश पर भी आपत्ति जताई है।
पार्टी ने बीजेपी और आरएसएस पर निशाना साधते हुए कहा है कि इसने सभी राज्यों और लोकसभा चुनाव क्षेत्रों से लोगों को अयोध्या ले जाने की योजना तैयार की है, जो कि लोक चुनावों की शुरुआत तक चलना है।
पूजा स्थल अधिनियम, 1991 को लेकर जताई चिंता
सीपीएम ने सबसे गंभीर आरोप ये लगाया है कि इस कार्यक्रम से ऐसा संकेत मिलता है कि पूजा स्थल अधिनियम, 1991 (Places of Worship Act, 1991) को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।
इस कानून को इसलिए बनाया गया है ताकि अयोध्या मामले को छोड़कर अन्य सभी धार्मिक स्थलों को उसी यथास्थिति में रखा जाए, जो कि 15 अगस्त, 1947 को देश की आजादी के समय था।
काशी और मथुरा को लेकर अदालतों पर भी जताया संदेह
सीपीएम के बयान में यहां तक कि न्यायपालिका को भी संदेह के घेरे में डालने की कोशिश की गई है। पार्टी ने कहा है 'काशी और मथुरा के विवाद एक बार फिर कुछ हद तक न्यायिक मिलीभगत से सामने आए हैं.....(पीएम) मोदी ने अयोध्या पर फैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया था......'
सीपीएम का दावा है कि 'पार्टी ने हर व्यक्ति के अपने धर्म पर चलने के अधिकार को दृढ़ता से बरकरार रखा है। लेकिन, इसके साथ ही राजनीतिक लाभ के साधन के तौर पर लोगों की धार्मिक आस्था के दुरुपयोग और धर्म परिवर्तन करने और धर्म को राज्य से जोड़ने के प्रयासों का लगातार विरोध किया है।' (इनपुट-पीटीआई)












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