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नज़रिया: क्या सरकार बचा सकती थी 'गंगापुत्र' स्वामी सानंद की जान?

By Bbc Hindi

डॉ. जीडी अग्रवाल, जिन्हें स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद भी कहा जाता था, ने कहा था कि जन्म मरण से मुक्ति मानव का लक्ष्य होना चाहिए किन्तु वो गंगा के लिए अगले जन्मों में भी काम करते रहेंगे.

अनशन से पहले 13 जून फिर अनशन के दिन 22 जून और फिर मृत्यु के पूर्व पांच अक्तूबर को डॉ. अग्रवाल के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे तीन पत्रों का मर्म देश के इतिहास की धारा को बदल सकता है.

प्रधानमंत्री मोदी को लिखे पत्र में गंगापुत्र के नाम से विख्यात स्वामी सानंद ने केंद्रीय मंत्री उमा भारती से मुलाक़ात और नितिन गडकरी से टेलीफ़ोन पर हुई बातचीत का ब्यौरा दिया है.

शिव की नगरी काशी में नरेंद्र मोदी भी मां गंगे की शरण में पहुंचे और प्रधानमंत्री बन गए तो डॉ. अग्रवाल समेत सभी के मन में आस्था का नया संचार हुआ.

लेकिन अब डॉ. अग्रवाल की मौत से गंगा के क़ानून और योजनाओं पर गडकरी के दावों के साथ प्रधानमंत्री मोदी की गवर्नेन्स पर भी सवालिया निशान लग गये हैं.

प्रधानमंत्री मोदी
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प्रधानमंत्री मोदी

गंगा के लिए सेवा भाव नहीं?

जयप्रकाश नारायण की जयंती के दिन डॉ. अग्रवाल के देहावसान का राष्ट्रीय राजनीति में प्रतीकात्मक और ठोस महत्व है. प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का गंगा से लगाव सर्वविदित है, जिनके पोते राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए गंगा सफ़ाई की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की शुरुआत की थी.

राजीव गांधी ने ईमानदारी से स्वीकार किया था कि सरकारी बजट के हर रुपये में सिर्फ़ 15 पैसे विकास में खर्च होते हैं और बाक़ी 85 पैसे भ्रष्टाचारियों की जेब में चले जाते हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने चुनावी भाषणों में कहा कि बतौर प्रधानमंत्री उनके कार्यकाल में तस्वीर बदल गई और अब 100 फ़ीसदी पैसा विकास में ख़र्च होता है.

उनके दावों के उलट भाजपा शासित राज्यों में भ्रष्टाचार के अनेक मामले हैं और सीएजी की रिपोर्ट से केंद्र सरकार की नमामि गंगे योजना की विफलता जग ज़ाहिर हो गई है.

डॉ. अग्रवाल के निधन के अगले दिन मुंबई में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आरएसएस के सर कार्यवाह भैय्या जी जोशी ने कहा कि नेताओं में सत्ता प्राप्ति के बाद सेवा भाव क्यों लुप्त हो गया?

कांग्रेस और भाजपा की कार्य संस्कृति में यदि कोई फ़र्क़ नहीं तो फिर कांग्रेस मुक्त भारत के एजेंडे का अब क्या वैशिष्टय है?



नदी जोड़ो परियोजना

आज़ादी के बाद से देश की नदियों को जोड़ने (आईएलआर) के लिए कई सरकारों ने प्लान बनाया. पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की ओर से फरवरी 2012 में जारी आदेश के बावजूद इस बारे में ज़रूरी कार्यवाही नहीं की.

काले धन और नदी जोड़ने के प्रोजेक्ट के लिए गठित उच्चाधिकार समिति को मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धि बताया जाता है. दोनों समितियों के गठन से प्रशासनिक खाना पूर्ति भले ही हो गई हो लेकिन जनहित में कोई उल्लेखनीय काम नहीं हुआ.

बारिश के मौसम के अलावा राज्यों के पास नदियों में अधिक पानी नहीं होता तो फिर दूसरे राज्य में पानी का ट्रांसफ़र कैसे होगा? सरकारी एजेंसियों के पास नदियों में पानी के नवीनतम आंकड़े भी नहीं है. आईएलआर परियोजना की लागत और लाभ का भी वैज्ञानिक अध्ययन नहीं हुआ.

5.6 लाख करोड़ की आईएलआर परियोजना पर टुकड़ों में अमल से देश का नहीं बल्कि इंजीनियरों का ही भला होगा. आईआईटी और बर्क्ले यूनिवर्सिटी से जुड़ाव के साथ डॉ. अग्रवाल सतही और भूगर्भ जल विज्ञान के क्षेत्र में सर्वोच्च वैज्ञानिकों में से एक थे.

मोदी सरकार की ओर से वैज्ञानिक से संत बने व्यक्तित्व की चेतावनी को अनसुना करके नौकरशाही को तवज्जो देना क्या डॉ. अग्रवाल के देहावसान का प्रमुख कारण बना?



निर्मल और अविरल गंगा के खोखले दावे

डॉ. अग्रवाल के अनेक अनशनों के बाद तत्कालीन कांग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने उत्तरकाशी में तीन बांध परियोजनाओं को रद्द करने के साथ भगीरथी उद्गम क्षेत्र को पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील घोषित कर दिया था.

मोदी सरकार ने गंगा के लिए विशेष मंत्रालय बना दिया. इसके बावजूद पर्यावरण, पेयजल, नदी परिवहन जैसे मामले अन्य मंत्रालयों के अधीन बने रहे. नदियों पर राज्यों का अधिकार है तो फिर केंद्र की क्या भूमिका हो, इस पर भी सरकार में स्पष्ट राय नहीं बन पाई. अनेक मंत्रालय, नीति आयोग और पीएमओ के घनचक्कर में डॉ. अग्रवाल की तरह नदियों के हालात बिगड़ते गये.

उमा भारती ने गंगा के काम में विफल होने पर जल समाधि की घोषणा कर डाली, तो नितिन गडकरी ने इलाहाबाद से हल्दिया तक स्टीमर चलाने का दावा कर दिया. हर घर में संजोकर रखे जाने वाले गंगा जल में स्नान करने से अब बीमारियाँ हो सकती हैं.

ज़मीनी हक़ीक़त से परे सरकार के तमाम दावों पर जब डॉ. अग्रवाल ने सवाल खड़े किये तो पीएम मोदी और सभी मंत्रियों के ट्विटर अकाउंट चहकना बंद हो गये.

गाय
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गाय

गाय और गंगा पर विफल सरकार

राम मंदिर का मुद्दा अब सियासत की भेंट चढ़ने के बावजूद गाय और गंगा के सवाल जनमानस को अभी भी उद्वेलित करते हैं. गौ सेवा करने की बजाय गौरक्षा पर राजनीति होने से इतनी अराजकता बढ़ गई कि सुप्रीम कोर्ट को दख़ल देना पड़ा.

संघ परिवार नानाजी देशमुख का शताब्दी समारोह मना रहा है जिनके चित्रकूट स्थित ग्रामोदय विश्वविद्यालय में डॉ. अग्रवाल ने अनेक वर्ष बिताये. संघ परिवार के अलावा श्री श्री रविशंकर, स्वामी रामदेव, मुरारी बापू और डॉ. प्रणव पांड्या के संगठनों का व्यापक जनाधार है. मुरारी बापू तो गंगाजल में सने आटे की रोटी खाने के साथ गंगा जल ही पीते हैं.

डॉ. अग्रवाल वैज्ञानिक से संत बन गये लेकिन उनमें गांधी की तरह सांगठनिक क्षमता का अभाव था. डॉ. अग्रवाल के भगीरथ प्रयासों में यदि इन सभी का सहयोग मिल जाता तो भी क्या पीएम मोदी उनके पत्रों को ठण्डे बस्ते में डाल पाते?

नदियों में माफ़ियाओं की राजनीति

देश के अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों को विदेश में पढ़ाना चाहते हैं लेकिन डॉ. अग्रवाल इन सबसे परे होकर नदियों के हमसफ़र बनकर एक नयी मिसाल बन गए. उन्होंने गुलबर्गा में डॉ. कलाम को गंगाजल से अभिसिंचित किया था. वह लाभ-हानि और राजनीति से परे अलबेले मन्मतंग थे.

डॉ. अग्रवाल ने कहा था कि उनके अभियान से राजनैतिक दलों को वोट नहीं मिलता, इसलिए उनकी मांगों पर सरकार गंभीर नहीं होती. केंद्र के अलावा गंगा किनारे के तीनों प्रमुख राज्यों उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश और बिहार में भाजपा की सरकारे हैं, जहां गंगा से जुड़े अनेक प्रोजेक्ट भ्रष्टाचार की वजह से सफल नहीं हो रहे.



रेत माफ़िया
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रेत माफ़िया

बड़े बांधों के निर्माण में भी पूंजीपतियों के साथ नेताओं का खेल है. नदियों की अविरल धारा में सबसे बड़ी बाधा रेत माफ़िया है, जिन्हें राजनेताओं का संरक्षण प्राप्त है. मध्य प्रदेश में तो रेत माफ़िया द्वारा अनेक अफ़सरों की बलि ली जा चुकी है. नदियों की भूमि और सम्पदा पर कब्ज़ा करने वाले माफ़िया को चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल करने वाले दलों से डॉ. अग्रवाल का मोहभंग अब पूरे देश की कहानी बन गई है.

नदियों के बग़ैर स्मार्ट सिटी कैसे बनेगी

मोदी सरकार ने जनता को बुलेट ट्रेन और स्मार्ट सिटी के मेगा प्रोजेक्ट्स के सपने दिखाये दूसरी तरफ़ नदियों का धरातल सूखता गया.

शिव की नगरी काशी अगर क्योटो बन भी जाये तो गंगा के बग़ैर इसकी सूरत कैसी होगी? देश में 99 हज़ार करोड़ रुपयों से 100 स्मार्ट सिटी बनाने की बात हो रही है.

स्मार्ट सिटी के नाम पर नदियों की रेत और खनिज संसाधनों का अंधाधुंध दोहन और बढ़ेगा. देश में छोटी-बड़ी सभी नदियों को गंगा समान माना जाता है. अगर नदियां सूख गईं तो फिर शहर कैसे बचेंगे? क्या स्मार्ट सिटी पानी के बग़ैर चल सकेंगे? गंगा के बग़ैर मोदी के सपनों का न्यू इंडिया कैसे बनेगा?



गंगा क़ानून का सच

डॉ. अग्रवाल ने गंगा को बचाने के लिए विशेष कानून की मांग की थी. उनके देहावसान के बाद गडकरी ने कहा कि कैबिनेट से मंज़ूरी के बाद गंगा क़ानून को संसद में पारित कर दिया जायेगा. पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने गंगा को राष्ट्रीय दर्जा दिया था.

गंगा क़ानून पर चर्चा के दौरान वरिष्ठ अधिकारी से जब पुराने क़ानून के बारे में पूछा गया तो उनके पास कोई जानकारी नहीं थी. गंगा नदी की अनेक सहायक नदियां हैं और नया क़ानून सिर्फ गंगा नदी पर लागू होगा या फिर पूरे गंगा बेसिन में, इस पर भी अनेक सवाल हैं.

गंगा बेसिन पर लागू होने वाला कानून देश की अन्य नदियों पर क्यों लागू नहीं होगा, इस पर भी ख़ामोशी है. नौकरशाही की नासमझी के बाद देरी से बने क़ानूनों से माँ गंगा का दर्द कैसे कम होगा? इन्हीं सवालों से जूझते डॉ. अग्रवाल शायद भगीरथ तो नहीं बन पाये पर अलौकिक देहदान से आधुनिक भारत के दधीचि ज़रूर बन गये हैं.

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेता है.)


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English summary
Attitude could the government save Gangaputra the soul of Swamand

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