Assembly Election Result 2023: कांग्रेस के सामने क्यों खड़ी हुई अबतक की सबसे बड़ी चुनौती?

Assembly Election Results 2023 for Congress: चार राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम ने कांग्रेस के हाथ में एक नए राज्य (तेलंगाना) की सत्ता जरूर पकड़ाई है, लेकिन हिंदी हार्टलैंड में उसका डिब्बा जिस तरह से गोल हुआ है, वह पार्टी के नजरिए से अप्रत्याशित है।

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ तीनों राज्यों में पिछली बार कांग्रेस ने सरकार बनाई थी। हालांकि, पार्टी को पूर्ण बहुमत तब भी सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही मिला था। एमपी, राजस्थान में उसने चुनाव के बाद अन्य दलों और निर्दलीयों का समर्थन लेकर सरकार बनाई थी।

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भाजपा की हिंदी हार्टलैंड में जीत की हैट्रिक!
आज की स्थिति ये है कि मध्य प्रदेश में बीजेपी ने जीत का धमाका कर दिया है। राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने एंटी-इंकंबेंसी जैसे शब्दों को पलीता लगा दिया है। राजस्थान में अगर हर बार सत्ता परिवर्तन वाली दलील दी जाए तो छत्तीसगढ़ में पांच साल में ही बड़ी बहुमत से बाजी पलटकर भाजपा ने कांग्रेस के आत्मविश्वास का बैलून फोड़ दिया है।

इंडिया ब्लॉक में कांग्रेस की उम्मीदों को झटका
कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जो शानदार जीत मिली थी, उसने जल्द ही 28 विपक्षी दलों के इंडिया ब्लॉक में पार्टी को एक तरह से ड्राइविंग सीट पर बिठाना शुरू कर दिया था। शिवसेना का उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाला गुट, आरजेडी, जेडीयू, डीएमके, आम आदमी पार्टी और वामपंथी पार्टियों ने एक तरह से कांग्रेस को गठबंधन का नेता मानना शुरू कर दिया था।

कांग्रेस के नेता और खासकर राहुल गांधी ने तो कर्नाटक की जीत के बाद इंडिया ब्लॉक के अन्य सहयोगी दलों को एक तरह से गंभीरता से लेना छोड़ ही दिया था। सहयोगी दलों में भी कांग्रेस का ऐसा दबदबा बन गया था कि इंडिया ब्लॉक की भोपाल में आयोजित होने वाली रैली कथित तौर पर सिर्फ कमलनाथ के कहने पर रद्द करनी पड़ गई थी।

जेडीयू ने सबसे पहले हार के बाद कांग्रेस को दिखाया आईना
लेकिन, विधानसभा चुनावों में उत्तर भारत की जमीन गंवाते ही कांग्रेस को धरातल का झटका लगना शुरू हो चुका है। सबसे पहले पिछले करीब डेढ़ साल से पार्टी के भरोसेमंद बने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने ही कहना शुरू कर दिया है कि इंडिया ब्लॉक के दलों को नजरअंदाज करने का ही खामियाजा कांग्रेस भुगत रही है।

दरअसल, विधानसभा चुनावों के दौरान नीतीश कुमार ने कहा भी था कि कांग्रेस तो एक तरह से इंडिया ब्लॉक को भुला ही चुकी है। लेकिन, तब उन्होंने कांग्रेस पर सीधे आरोप लगाने की हिम्मत नहीं दिखाई थी।

विधानसभा चुनावों से ही इंडिया ब्लॉक में शुरू हो चुकी है खटपट
इससे पहले एमपी चुनाव के दौरान ही इंडिया ब्लॉक की एक प्रमुख सहयोगी समाजवादी पार्टी से कांग्रेस की खटपट शुरू हो चुकी थी। दोनों दलों के शीर्ष नेताओं के बीच तू-तू-मैं-मैं तक की नौबत आ गई थी। तभी से सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने कांग्रेस को भाव देना ही छोड़ दिया है। दूसरी तरफ कांग्रेस के नेता लोकसभा चुनावों में यूपी में अकेले चुनाव लड़ने का दम भरते रह गए।

यूपी में किसके साथ मोलभाव करने की स्थिति में रह गई कांग्रेस?
कांग्रेस के बारे में यह भी चर्चा थी कि वह उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी से तालमेल की योजना पर काम कर रही है। लेकिन, तीन राज्यों में करारी हार के बाद अब न कांग्रेस के पास यूपी के लायक मोलभाव करने की क्षमता बच गई है और ना ही कार्यकर्ताओं और नेताओं में कोई वह बनाया गया मनोबल बचे रहने की उम्मीद है।

तेलंगाना की जीत पर कर्नाटक फैक्टर का प्रभाव!
इस बात में दो राय नहीं कि दक्षिण भारत में कांग्रेस को बड़ी सफलता मिली है। लेकिन, यह भी हकीकत है कि इसमें कर्नाटक में पार्टी की शानदार जीत का बहुत बड़ा प्रभाव है। तथ्य यह है कि सिर्फ 6 महीने में ही कांग्रेस की सिद्दारमैया सरकार के सामने एक से बढ़कर एक चुनौतियां आनी शुरू हो चुकी हैं।

कर्नाटक में भी खड़ी हो चुकी है चुनौती
कर्नाटक में पहले तो पांच गारंटियों की भरपाई की वजह से विकास कार्य रुकने की आशंका खुद प्रदेश के मंत्रियों तक की ओर से ही जताई जाने लगी हैं। ऊपर से राहुल गांधी के सबसे बड़े जातीय जनगणना कार्ड वाली रिपोर्ट तैयार होने के बावजूद कांग्रेस सरकार जारी करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। ऊपर से राज्य में लोकसभा चुनावों के लिए बीजेपी और जेडीएस के बीच गठबंधन भी हो चुका है।

महाराष्ट्र में बढ़ सकती है मुश्किल
यूपी के बाद लोकसभा की सबसे ज्यादा सीटें महाराष्ट्र में हैं। जहां कांग्रेस की सहयोगी के रूप में शरद पवार की अगुवाई वाली एनसीपी और शिवसेना का उद्धव ठाकरे गुट है। बदले हालात में राज्य में भी विपक्षी दलों के गठबंधन के समीकरण में परिवर्तन की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। यहां पवार और ठाकरे जैसे धुरंधरों का सामना करना पार्टी के लिए अब आसान नहीं रहेगा।

बिहार में कांग्रेस मजबूत सत्ताधारी महागठबंधन का हिस्सा जरूर है, लेकिन उसमें उसकी हैसियत पहले से ही नहीं के बराबर है। पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी है और राज्य में कांग्रेस और उसका सहयोगी वामपंथी गठबंधन मुख्य विपक्ष की भी भूमिका में नहीं है।

दक्षिण में कांग्रेस तमिलनाडु में जरूर सत्ताधारी डीएमके की सहयोगी है, लेकिन यहां पर भी उसका रोल पिछलग्गू से अधिक नहीं है। केरल में 2019 के चुनाव में कांग्रेस का पलड़ा जरूर भारी रहा था, लेकिन हकीकत ये है कि विधानसभा चुनावों में वह सफलता भी उसके हाथ से निकल चुकी है।

अब कांग्रेस के सामने अचानक इतनी सारी चुनौतियां पैदा हो गई हैं, जिसमें से सिर्फ दक्षिण भारत के कुछ प्रमुख राज्यों में ही उसके लिए उम्मीद बची है, लेकिन वहां भी वह पूरी तरह से निश्चिंत नहीं रह सकती।

2014 के चुनाव में कांग्रेस यूपीए की अगुवा थी। 2019 में भी उसने काफी हद तक उन्हीं सहयोगियों की अगुवाई की। लेकिन, 2024 में वह अब इंडिया ब्लॉक की अगुवाई कर पाएगी, यह बहुत बड़ी सवाल बन गया है।

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