Assam NRC:नागरिकों की लिस्ट में अनियमितता, री-वेरिफिकेशन के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे प्रदेश कोऑर्डिनेटर
नई दिल्ली, 13 मई: असम नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन अथॉरिटी ने नागरिकों की लिस्ट बनाने में 'भारी अनियमितता' का मुद्दा उठाते हुए इसकी व्यापक और एक तय समय अंदर री-वेरिफिकेशन के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सुप्रीम कोर्ट में यह आवेदन प्रदेश के एनआरसी कोऑर्डिनेटर हितेश देव शर्मा की ओर से दायर की गई है, जिसमें असम की वोटर लिस्ट से अवैध वोटरों का नाम हटाने के साथ ही एनआरसी में संशोधन की भी मांग की गई है। गौरतलब है कि भाजपा के दोबारा सत्ता संभालते ही नए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने साफ किया था कि उनकी सरकार एनआरसी पर वादे के मुताबिक आगे बढ़ेगी, जिसके तहत वह प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में 20 फीसदी और दूसरे इलाकों में 10 फीसदी नामों का फिर से सत्यापन कराना चाहती है। लेकिन,अब पता चला है कि उनके कहने से पहले ही यह आवेदन सुप्रीम कोर्ट में दिया जा चुका है।

नागरिकों की लिस्ट की री-वेरिफिकेशन हो- स्टेट कोऑर्डिनेटर
असम एनआरसी में विसंगतियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर आवेदन में इस बात का जिक्र किया गया है कि फाइनल एनआरसी अभी भी भारत के नागरिकता पंजीकरण के रजिस्ट्रार जनरल (रजिस्ट्रार जनरल ऑफ सिटीजन रजिस्ट्रेशन ऑफ इंडिया) की ओर से प्रकाशित होना बाकी है। इसमें कहा गया है कि जिन नामों की छंटनी की गई है, उसे संबंधित व्यक्तियों को देने के लिए जो रिजेक्शन स्लिप तैयार की जा रही थी, उस दौरान 'कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे' सामने आए हैं, जिसके चलते इस पूरी प्रक्रिया में देरी हुई। बता दें कि 2019 के अगस्त में जो असम एनआरसी की फाइनल लिस्ट प्रकाशित की गई थी, उसमें 3.3 करोड़ आवेदनों में से 19.6 लाख लोगों को अलग कर दिया गया था। इस छंटनी की वजह नागरिकता साबित करने को लेकर उनके पास पुख्ता दस्तावेज नहीं होना बताया गया था।

कुछ बेहद गंभीर अनियमितताओं का जिक्र
खास बात ये है कि असम के एनआरसी कोऑर्डिनेटर ने यह आवेदन 8 मई को ही सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर दिया था। जबकि, नए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने उसके दो दिन बाद कहा कि उनकी सरकार नागरिकों की अंतिम लिस्ट के 10 से 20 फीसदी के पुन: सत्यापान के पक्ष में है। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मई को वह आवेदन विचार करने के लिए स्वीकार कर लिया है। जिन 19.6 लाख लोगों को एनआरसी से अलग किया गया है, उन्हें उनकी नागरिकता खारिज किए जाने की वजह बताने वाली रिजेक्शन स्लिप मिलने के 120 दिनों के भीतर नजदीकी फॉरन ट्रिब्यूनल से संपर्क करना है। अब, आवेदन में इस लिस्ट में 'कुछ बेहद गंभीर अनियमितताओं' का जिक्र करते हुए कहा गया कि इससे राष्ट्र की सुरक्षा और अखंडता पर असर पड़ सकता है, लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार किया गया है कि 'एनआरसी प्रक्रिया से 1951 की एनआरसी और 1971 तक की मतदाता सूची का विशाल डिजिटल डेटाबेस तैयार हुआ है और एनआरसी के आवेदकों का भी विस्तृत ब्योरा जुट पाया है।'

'दोषरहित और पूर्ण एनआरसी के लिए पुन: सत्यापन जरूरी'
आवेदन में 'हेरफेर या गढ़े गए संबंधित दस्तावेजों' की छानबीन करने और मतदाता सूची में फर्जी तरीके से नाम जोड़ने के मामलों की छानबीन में हुई परेशानी का भी जिक्र किया गया है। इस संबंध में कहा गया है कि ड्राफ्ट एनआरसी (दावे और आपत्ति प्रक्रिया से पहले जुलाई 2018 में प्रकाशित,जिससे 21.01 लाख लोगों को एक साल बाद अंतिम मसौदे में जगह बनाने में मदद मिली ) में जो 40,07,719 लोगों में से 3,93,975 को अलग किया गया था, उनमें से किसी ने दावा पेश नहीं किया था और उन लोगों को अंतिम छंटनी लिस्ट में डाल दिया गया था। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट में दिए गए आवेदन में कहा गया है कि 'कुछ सैंपल की जांच करके उसका विश्लेषण किया गया तो पता चला कि जिन लोगों ने सिर्फ सरनेम की वजह से दावा नहीं किया था, उनमें से 50,695 लोग एनआरसी में शामिल किए जाने के योग्य थे।' इनमें से 7,770 लोग 'मूल निवासी' के श्रेणी में पाए गए और 42,925 'दूसरे राज्यों से आए व्यक्ति' थे। सबसे बड़ी बात ये है कि अगर विस्तार से री-वेरिफिकेशन किया जाए तो यह संख्या बढ़ भी सकती है। इसलिए दोषरहित और पूर्ण एनआरसी के लिए इन लोगों को फाइनल एनआरसी में शामिल करना था,अगर यह नहीं हुआ तो इसे स्वीकार करना मुश्किल होगा।

'कुछ अयोग्य लोगों को भी मिली एनआरसी में एंट्री'
यही नहीं एक बड़ी बात यह भी कही गई है कि कुछ 'अयोग्य लोगों की भी मूल निवासी होने के गलत मार्किंग की वजह से एनआरसी में एंट्री मिल गई है।' इसके मुताबिक 'इस बात की पूरी संभावना है कि कुछ लोग बिना वैद्य दस्तावेजों के मूल निवासियों के नाम पर एनआरसी में शामिल कर लिए गए हों।' एनआरसी अथॉरिटी ने यह भी कहा है कि आवेदकों की फैमिली ट्री को मैच करने के लिए जो सॉफ्टवेयर तैयार किया गया था, उसमें भी क्वालिटी चेक करने की कोई व्यवस्था नहीं थी। नागरिकों की लिस्ट के पुन: सत्यापन के लिए इसपर पर भी काफी जोर दिया गया है।

क्या है असम एनआरसी का पूरा मामला ?
बता दें कि पहले पूर्वी बंगाल फिर पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश की वजह से असम में दशकों तक प्रवासियों के आने की समस्या रही है। इसलिए असम में पहले से ही एक एनआरसी है, जो कि आजादी के चार साल बाद 1951 में ही उस साल की जनगणना के आधार पर प्रकाशित की गई थी। यह अकेला ऐसा राज्य है, जिसके पास पहले से यह व्यवस्था है। 2019 में जो फाइनल एनआरसी का मसौदा प्रकाशित किया गया था, वह वहां रह रहे भारतीय नागरिकों की पहचान बताने वाली अपडेटेड एनआरसी है। एनआरसी को अपडेट करने की यह प्रक्रिया 1985 के असम समझौते के तहत सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में की गई थी। इस समझौते के तहत नागरिकता के लिए कटऑफ तारीख 24 मार्च, 1971 निर्धारित की गई है। जो लोग उससे पहले असम आ चुके हैं, उन्हें ही नागरिक के तौर पर मान्यता मिलनी है।(तस्वीरें-फाइल)
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