Ram Mandir: असम के 441 साल पुराने इस पत्थरों वाले मंदिर से रामलला का है कनेक्शन! जानें पूरी कहानी

Ram Mandir : अयोध्या में राम मंदिर को लेकर 500 सालों का इंतजार खत्म हुआ। अब राम भक्तों उनके प्रभु राम के अलौकिक रूप के दर्शन मिल सकेंगे। 22 जनवरी को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन किया जा रहा है। जिसको लेकर पूरे देश में हर्षोल्लास का माहौल है। लोग जहां भी हैं, जिस शहर में भी है, उसी शहर को अयोध्या बनाने की तैयारी कर रहे हैं।

कुछ ऐसा ही नजारा असम के कामरूप जिले स्थित हयग्रीव माधव मंदिर में भी देखने को मिल रहा है। जहां अयोध्या में हो रहे भव्य और दिव्य राम मंदिर निर्माण को लेकर उत्साहित भक्त भगवान विष्णु के हयग्रीव अवतार के दर्शन को जुट रहे हैं। आइए जानते हैं अनकही कहानी...

Hayagriva Madhav Temple

हयग्रीव माधव मंदिर भारत के असम राज्य में हाजो में मणिकूट नामक पहाड़ी पर स्थित एक हिंदू मंदिर है। यह विष्णु के हयग्रीव रूप को समर्पित है। हाजो गुवाहाटी से लगभग 30 किमी पश्चिम में स्थित है। पत्थरों से बने इस मंदिर में हयग्रीव माधव की प्रतिमा है। गर्भगृह में स्थापित मूर्ति कृष्णवर्णीय पत्थर की बनी हुई है। इसके अलावा चार अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी हैं। कुछ बौद्ध अनुयायी मानते हैं कि महात्मा बुद्ध को इसी स्थान पर ही मोक्ष की प्राप्ति हुई थी।

क्या है इसका इतिहास?
ऐतिहासिक कामरूप में 11वीं शताब्दी में रचित कलिका पुराण में हयग्रीव अवतार की उत्पत्ति व उनकी इस पहाड़ पर स्थापना का वर्णन है। माना जाता है कि वर्तमान मंदिर का निर्माण 441 साल पहले सन् 1583 में राजा रघु देव नारायण ने कराया था। हालांकि, कुछ इतिहासकार मानते हैं कि वास्तव में इसे कामरूप के पाल राजवंश ने 10वीं शताब्दी में बनवाया था।

अन्य मंदिरों से क्यों है यह अलग?
यह अष्टकोणीय आकार में पत्थर से बना है, जिसका व्यास लगभग 30 फीट है। इसकी छत पिरामिडनुमा है, इसमें हयग्रीव माधब की छवियां हैं, जिनके इष्ट देव को हिंदू विष्णु के नरसिंह अवतार के रूप में पूजते हैं। मंदिर के ऊपरी भाग पर हाथियों की पंक्तियां दिखाई देती हैं और वे असमिया कला के बेहतरीन नमूने हैं। मंदिर के चारों ओर असंख्य ढीली-ढाली मूर्तियां हैं। इनमें से अधिकांश मूर्तियां असम के कारीगरों द्वारा प्राप्त की गई मूर्तिकला की सुंदरता का प्रमाण हैं।

सीढ़ी पहाड़ी के नीचे से एक प्रवेश द्वार तक जाती है, जो मंदिर परिसर में खुलती है। मंदिर के सामने एक सुंदर पूल है, जिसे माधब मंदिर पूल कहा जाता है। पूल में कई कछुए और विभिन्न प्रकार की मछलियां हैं। मंदिर में हर साल डौल, बिहू और जन्माष्टमी पर्व मनाया जाता हैं। यह मंदिर हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म दोनों का प्रचार करता है, जो दूरदराज के स्थानों से बौद्ध भिक्षुओं को आकर्षित करता है।

मंदिर से जुड़ी अन्य बातें
मुख्य मंदिर से सटी एक अन्य संरचना को डौल गृह कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इसे 1750 ई. में अहोम राजा प्रमाता सिंघा ने बनवाया था। होली के रंग-बिरंगे त्योहार के समान डोल त्योहार यहां हर साल बड़े पैमाने पर मनाया जाता है।

प्रभु राम का है गहरा कनेक्शन?
रामलला की मूर्ति को आकार देने वाले कर्नाटक के प्रसिद्ध मूर्तिकार अरुण योगीराज ने अपने हुनर का जादू बिखेरा है। मूर्ति में विष्णु के 10 अवतारों का स्वरूप साफ झलकता है। उन्हीं अवतारों में से चौथे स्वरूप की इस मंदिर में प्रतिमा विराजमान है। मंदिर में हयग्रीव माधब की छवियां हैं, जिनके इष्ट देव को हिंदू विष्णु के नरसिंह अवतार के रूप में पूजते हैं।

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