'मुसलमान हूं पर रामायण सुनी है', AR Rahman के बयान से हड़कंप, अब जगतगुरु बोले- 'ये बहुत बुरे लोग हैं'
AR Rahman Ramayan Controversy: ऑस्कर जीत चुके संगीतकार एआर रहमान का नाम भारतीय सिनेमा और संगीत की पहचान बन चुका है। लेकिन इस बार चर्चा उनके संगीत की नहीं, बल्कि उनके एक बयान की है, जिसने सियासत, धर्म और बॉलीवुड को एक साथ गर्मा दिया है।
"मैं मुसलमान हूं, लेकिन ब्राह्मण स्कूल में पढ़ा हूं, रामायण और महाभारत की कहानियां सुनी हैं। लेकिन फिर भी 8 सालों से मुझे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में काम नहीं मिल रहा है" - रहमान का यह बयान सामने आते ही सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक बहस तेज हो गई, मामला यहीं नहीं रुका, जगतगुरु परमहंस आचार्य से लेकर सांसद पप्पू यादव तक ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देकर इसको और गरमा दिया।

जगतगुरु परमहंस का तीखा हमला
रहमान के इसी बयान पर जगतगुरु परमहंस आचार्य का बयान सामने आया, जिसने विवाद को और भड़का दिया। उन्होंने कहा कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे लोगों को काम नहीं मिलना चाहिए।
परमहंस आचार्य बोले,
''देखिए फिल्म इंडस्ट्री में काम इंसान को ही मिलना चाहिए, जब उनकी सोच इतनी खराब हो, पहले वे हिंदू थे तो उनको काम कम मिल रहा था तो फिर काम के लिए वो मुसलमान बन गए, अब उनको फिर काम नहीं मिल रहा है तो वो कह रहे हैं कि मुसलमान हैं...इसलिए काम नहीं मिल रहा है..ये दोहरा रैवया कब तक चलेगा। उनकी सोच हिंदुओं को लेकर इतनी खराब है तो क्या ही बोला जाए। ऐसे लोग बहुत बुरे हैं।"
Jagatguru Paramhansacharya on AR Rahman-
— News Arena India (@NewsArenaIndia) January 16, 2026
"Such people in Hindi film industry should not get work.
When their mindset is so corrupt, first they were Hindus, then they became Muslims, and now they claim they aren’t getting work, such people are very bad." pic.twitter.com/HFRLlBN6uY
सांसद पप्पू यादव बोले- देश में साफ तौर पर विभाजन बढ़ रहा है
मामले पर पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव ने कहा कि देश में साफ तौर पर विभाजन बढ़ रहा है। उनके मुताबिक, साहित्य और गंभीर रचनात्मक कामों को नजरअंदाज किया जा रहा है, जबकि सिनेमा और क्रिकेट भी हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से देखे जाने लगे हैं। उन्होंने इसे मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व से जोड़ते हुए चिंता जताई।
Purnea, Bihar: On singer A. R. Rahman’s statement, Purnea MP Pappu Yadav says, "The country is clearly divided. Even cinema and cricket are being promoted while serious literature is ignored. Writers like Renuka and poets like Vidyapati are sidelined, and even comic poets have… pic.twitter.com/7dA4y4508m
— IANS (@ians_india) January 17, 2026
पप्पू यादव कहते हैं, "देश साफ तौर पर बंटा हुआ है। सिनेमा और क्रिकेट को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, जबकि गंभीर साहित्य को नजरअंदाज किया जा रहा है। रेणुका जैसे लेखक और विद्यापति जैसे कवियों को साइडलाइन कर दिया गया है, और यहां तक कि कॉमिक कवि भी हिंदू-मुस्लिम लाइन पर बँट गए हैं। मुझे लगता है कि सरकार और पॉलिटिकल लीडरशिप की वजह से यह बंटवारा क्रिकेट और फिल्म इंडस्ट्री में भी फैल गया है।"
वहीं लेखिका और कॉलमिस्ट शोभा डे ने रहमान के बयान को "खतरनाक" बताया। उन्होंने कहा कि बॉलीवुड एक ऐसी जगह रही है, जहां धर्म कभी काम का पैमाना नहीं रहा। उनके मुताबिक, रहमान इतने बड़े और परिपक्व कलाकार हैं कि उन्हें ऐसा बयान नहीं देना चाहिए था, भले ही उनके पास अपनी वजहें हों।
मौलाना यासूब अब्बास बोले- किसी भी क्षेत्र में साम्प्रदायिक भेदभाव नहीं होना चाहिए
ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने कहा कि किसी भी क्षेत्र में साम्प्रदायिक भेदभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि फिल्म इंडस्ट्री में कई मुस्लिम नामचीन लोग बिना किसी परेशानी के काम कर रहे हैं और रहमान किस समस्या से जूझ रहे हैं, यह वही बेहतर बता सकते हैं।
मौलाना यासूब अब्बास कहते हैं,
"चाहे फिल्म इंडस्ट्री हो या कहीं और, किसी को भी सांप्रदायिक भेदभाव का सामना नहीं करना चाहिए। मैं कई लोगों को जानता हूं, जैसे जाने-माने प्रोड्यूसर अब्बास-मस्तान, जो बिना किसी दिक्कत के पूरी तरह से काम कर रहे हैं। जहां तक रहमान साहब को किन दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है और क्यों, यह तो वही बता सकते हैं।"
बॉलीवुड से लोगों ने क्या-क्या कहा?
बॉलीवुड के भीतर से भी इस बयान पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आईं। गीतकार जावेद अख्तर ने कहा कि रहमान इतने बड़े कलाकार हैं कि छोटे निर्माता उन्हें अप्रोच करने से भी हिचक सकते हैं। गायक शान ने इसे व्यक्तिगत अनुभव से जोड़ते हुए कहा कि काम न मिलना हर कलाकार के जीवन का हिस्सा है और इसे धर्म से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। उन्होंने साफ कहा कि संगीत में कोई धार्मिक एंगल नहीं होता, अगर ऐसा होता तो बीते तीन दशकों के सुपरस्टार्स इतने लंबे समय तक टिके नहीं रहते।
संगीतकार शंकर महादेवन ने कहा कि कई बार फैसले संगीत से जुड़े लोग नहीं, बल्कि गैर-रचनात्मक लोग लेते हैं, जिससे अच्छे काम भी बाहर रह जाते हैं। वहीं भजन गायक अनुप जलोटा ने रहमान के योगदान को याद दिलाते हुए कहा कि उन्होंने कम समय में 25 साल जितना काम किया है और उनके टैलेंट पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
अब पढ़िए एआर रहमान का पूरा बयान
बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में एआर रहमान ने अपने करियर के पिछले आठ सालों को लेकर खुलकर बात की। उन्होंने माना कि इस दौरान बॉलीवुड में उन्हें पहले जैसी लगातार फिल्में नहीं मिलीं। रहमान ने इसके पीछे इंडस्ट्री की बदलती राजनीति, फैसले लेने वालों की सोच और माहौल में आए बदलाव की ओर इशारा किया। हालांकि उन्होंने साफ कहा कि उनके सामने किसी ने सीधे तौर पर साम्प्रदायिक वजह नहीं बताई, लेकिन कुछ बातें "कानों तक जरूर पहुंचीं"।
इसी बातचीत में नितेश तिवारी की आने वाली फिल्म 'रामायण' का जिक्र भी आया, जिसमें रहमान संगीत दे रहे हैं। जब उनसे पूछा गया कि अलग धर्म से होने के बावजूद क्या उन्हें इस फिल्म में काम करने में कोई दुविधा हुई, तो उन्होंने बेहद सहज अंदाज में कहा कि वे ब्राह्मण स्कूल में पढ़े हैं, हर साल रामायण और महाभारत की कथाएं सुनी हैं और वे हर अच्छी चीज को महत्व देते हैं। उनका कहना था कि ज्ञान किसी एक धर्म की बपौती नहीं, बल्कि हर जगह से सीखने की चीज है।
रहमान बोले,
''मैं 'ब्राह्मण स्कूल' में पढ़ा हूं, हर साल रामायण-महाभारत सुना हूं, इसलिए मैं पूरी कहानी जानता हूं... ये किसी व्यक्ति के गुणों की कहानी है। मैं हर अच्छी चीज को महत्व देता हूं, ज्ञान वह है जो आप हर दिन, हर जगह सीख सकते हैं, हमें स्वार्थ से ऊपर उठना चाहिए।''
रहमान ने कहा,
''पिछले 8 सालों में शायद सत्ता का बदलाव हुआ है और जो रचनात्मक नहीं हैं, वे फैसले ले रहे हैं। शायद साम्प्रदायिक बात भी रही हो, लेकिन मेरे सामने किसी ने नहीं कहा। हां कुछ विहस्पर सुनाई देती हैं। जैसे आपको बुक किया था लेकिन दूसरी म्यूजिक कंपनी ने फिल्म फंड की और अपने संगीतकार ले आए। मैं कहता हूं ठीक है, मैं आराम करूंगा''
रहमान आगे अपनी सोच को और साफ करते हुए कहते हैं कि पैगंबर का संदेश हमेशा ज्ञान को सबसे ऊपर रखने का रहा है। ज्ञान कहां से मिल रहा है, यह नहीं, बल्कि यह मायने रखता है कि हम उसे ग्रहण कर रहे हैं या नहीं। चाहे वह किसी राजा से मिले, किसी साधारण इंसान से, अच्छे अनुभव से या फिर मुश्किल हालात से, ज्ञान से मुंह मोड़ना नहीं चाहिए। उनके मुताबिक इंसान को संकीर्ण सोच और निजी स्वार्थ से ऊपर उठना चाहिए। जब सोच ऊंची होती है, तो इंसान खुद भी चमकता है और उसकी रोशनी दूसरों तक भी पहुंचती है, और यही सबसे जरूरी बात है।












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