दुनिया की सबसे उम्रदराज प्रोफेसर चिलुकुरी संथम्मा, कैसे है ऊषा चिलुकुरी वेंस से इनका खास कनेक्शन?

ओहियो सीनेटर और रिपब्लिकन उप-राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जेडी वेंस की पत्नी उषा चिलुकुरी वेंस के चर्चाओं में आने से बहुत पहले, उनकी 96 वर्षीय दादी, चिलुकुरी संथम्मा, आंध्र प्रदेश के हर घर में एक जाना पहचाना नाम बन चुकी थीं। अपनी अधिक उम्र के बावजूद, संथम्मा ने विजयनगरम के एक निजी विश्वविद्यालय में फिजिक्स प्रोफेसर के रूप में पढ़ाना जारी रखा हुआ है।

आंध्र विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त प्रोफेसर संथम्मा 96 साल की उम्र में भी बच्चों को फिजिक्स सीखा रही हैं। अपनी उम्र और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के बावजूद, वह सेंचुरियन यूनिवर्सिटी में बच्चों को पढ़ाने के लिए विजाग से विजयनगरम तक की 60 किलोमीटर की यात्रा करती हैं। शिक्षा के प्रति उनका समर्पण अटूट है।

Chilukuri Santhamma

संथम्मा की शैक्षणिक यात्रा 1956 में शुरू हुई जब वह आंध्र विश्वविद्यालय में लेक्चरर के रूप में शामिल हुईं। 1989 में सेवानिवृत्त होने के बाद भी वह मानद संकाय सदस्य बनी रहीं। परमाणु और आणविक स्पेक्ट्रोस्कोपी में उनकी विशेषज्ञता ने उन्हें विशेष पहचान दिलाई है।

शिक्षा के अलावा, संतम्मा दूसरों की मदद में भी आगे हैं। उन्होंने विशाखापत्तनम में अपना घर विवेकानंद मेडिकल ट्रस्ट को एक क्लिनिक के लिए दान कर दिया, जो जल्द ही एक अस्पताल बन जाएगा। उनका योगदान फिजिक्स क्लास तक सीमित नही है, उनका व्यक्तित्वा समुदाय पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।

संतम्मा के साहित्यिक योगदान में भगवद गीता - द डिवाइन डायरेक्टिव शामिल है, जो भगवद गीता के श्लोकों की अंग्रेजी व्याख्या है। उनकी रुचि फिजिक्स के अलावा पुराणों, वेदों और उपनिषदों के क्षेत्र तक फैली हुई है, जो उनकी विविध बौद्धिक गतिविधियों को प्रदर्शित करती है।

शांतम्मा चेन्नई में बिताए शुरुआती दिनों को याद करती हैं जब 1959 में इंडियन ऑफ टेक्नोलॉजी मद्रास (IIT) की स्थापना हुई थी। उनके जीजा, राम शास्त्री, IIT-M में स्थापित की गई एक प्रयोगशाला में काम करते थे। राम शास्त्री के साथ, उषा के दादा अपने परिवार के साथ चेन्नई चले गए, जिसमें उषा के पिता और उनके भाई-बहन भी शामिल थे।

बाद में उषा का परिवार आंध्र प्रदेश से अमेरिका चले गए। जब उनसे अमेरिका जाने के कारणों के बारे में पूछा गया, तो प्रोफेसर शांतम्मा ने मजाकिया अंदाज में कहा, "ओह, यह गुरुत्वाकर्षण बल है, आप जानते हैं? स्वतंत्रता, सफलता और आराम।" इस आकर्षण के कारण उषा के माता-पिता 1980 में सैन डिएगो चले गए, जहां उषा और उनकी छोटी बहन का जन्म हुआ।

पारिवारिक और व्यावसायिक जीवन

उषा के माता-पिता दोनों ही इंजीनियरिंग और आणविक जीव विज्ञान के प्रोफेसर थे। देश के साथ-साथ महाद्कोवीप भी बदल गया लेकिन उन्होंने हिंदुत्व को बनाए रखा और शाकाहारी बने रहे। उषा ने अपने जीवन के इस पहलू का उल्लेख हाल ही में अपने पति जेडी वेंस को रिपब्लिकन राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प के साथी के रूप में नामित किए जाने के बाद दिए गए भाषण में किया था।

उषा की छोटी बहन श्रेया ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में अपना करियर बनाया और वर्तमान में सैन डिएगो, कैलिफोर्निया में एक सेमीकंडक्टर फर्म में काम करती हैं। उषा की मौसी डॉ. शारदा जंध्याला चेन्नई में एनेस्थेटिस्ट के तौर पर काम करती हैं। परिवार की प्रवास की कहानी बेहतर अवसरों और जीवन स्थितियों की एक आम खोज का उदाहरण है जिसे भारत के कई परिवारों ने दशकों से अनुभव किया है।

'इंटेलिजेंस विरासत में मिली'

जब उन्हें पता चला कि रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार ट्रंप ने उषा के पति को अपना उप-राष्ट्रपति चुना है, तो संतम्मा ने अपनी पोती के लिए खुशी जाहिर की।

उन्होंने कहा, "उषा मेरे पति सुब्रमण्यम शास्त्री के सबसे बड़े भाई राम शास्त्री की पोती हैं। मुझे खुशी है कि उन्हें हमारे परिवार की तरह ही तीक्ष्ण बुद्धि और सूझबूझ विरासत में मिली है। मेरे पति और उनके बड़े भाई (उषा के दादा) दोनों ने ही यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के तौर पर काम किया है। हमारे परिवार की सामाजिक सरोकार भी बहुत गहरी है। मेरे पति ने आपातकाल के दौरान दो साल जेल में बिताए थे, क्योंकि वह आरएसएस के कार्यकर्ता थे।"

उन्होंने उषा को अपना आशीर्वाद दिया और उनके पति की सफलता के लिए आशा व्यक्त की। उन्होंने कहा, "यह परिवार के लिए गर्व का क्षण है। मैं चाहती हूं कि चुनाव जीतने के बाद वे भारत के लिए योगदान दें। इसके अलावा, मुझे उम्मीद है कि वे अमेरिका में हिंदू धर्म के गहन दर्शन का प्रचार करेंगे।"

चिलुकुरी संथम्मा की शिक्षण के प्रति प्रतिबद्धता

जब उनसे 96 वर्ष की आयु में शिक्षण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, "जब तक आप स्वस्थ हैं, आपको समाज की भलाई के लिए स्वयं को समर्पित करना चाहिए।"

शिक्षा और परोपकार के प्रति संतम्मा का समर्पण उनकी उल्लेखनीय जीवन यात्रा को दर्शाता है। उनका योगदान अकादमिक हलकों के भीतर और बाहर कई लोगों को प्रेरित करता रहता है।

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