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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 90 दिनों के भीतर सार्वजनिक भूमि से अतिक्रमण तत्काल हटाने का निर्देश दिया

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण को 90 दिनों के भीतर हटाने का आदेश दिया है। इस निर्देश में उन अधिकारियों के खिलाफ विभागीय और आपराधिक कार्यवाही शुरू करना शामिल है जो इसका पालन करने में विफल रहते हैं। न्यायालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि ग्राम सभा की भूमि पर अतिक्रमण के संबंध में प्रधानों, लेखपालों और राजस्व अधिकारियों द्वारा निष्क्रियता विश्वास का आपराधिक उल्लंघन है।

 इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया

न्यायमूर्ति पी.के. गिरि ने मनोज कुमार सिंह द्वारा दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल) के बाद यह आदेश जारी किया। सिंह ने आरोप लगाया कि चुनार, मिर्ज़ापुर के चौका गाँव में एक तालाब पर ग्रामीणों ने अतिक्रमण कर लिया था, जबकि शिकायतों के बावजूद स्थानीय अधिकारियों द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि जलाशयों पर अतिक्रमण अस्वीकार्य है और इसे दंड के साथ तुरंत हटाया जाना चाहिए।

कानूनी निहितार्थ और जिम्मेदारियाँ

न्यायालय ने जल संरक्षण के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, "जल ही जीवन है; इसके बिना जीवन नहीं रह सकता।" न्यायमूर्ति गिरि ने कहा कि ग्राम की भूमि प्रबंधन समिति सार्वजनिक भूमि को संरक्षित करने के लिए जिम्मेदार है। इसके सदस्यों, जिनमें प्रधान और लेखपाल शामिल हैं, द्वारा निष्क्रियता को भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 316 के तहत विश्वास का आपराधिक उल्लंघन माना जाएगा।

आपराधिक कार्यवाही और प्रवर्तन

निर्णय में इस तरह के उल्लंघनों में शामिल अधिकारियों के खिलाफ बीएनएस के तहत आपराधिक कार्यवाही का निर्देश दिया गया। न्यायालय ने ग्राम सभा की भूमि को सौंपी गई संपत्ति के रूप में वर्णित किया और इसके अतिक्रमण को सार्वजनिक विश्वास का दुरुपयोग बताया। पुलिस अधिकारियों को अतिक्रमण हटाने में पूर्ण सहयोग करने का निर्देश दिया गया है।

जवाबदेही सुनिश्चित करना

न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि अतिक्रमण की रिपोर्ट करने वाले सूचना देने वालों को हर स्तर पर सुना जाए। यदि अतिक्रमण जारी रहता है या आदेशों का कार्यान्वयन नहीं होता है, तो गैर-अनुपालक अधिकारियों के खिलाफ उच्च न्यायालय में सिविल अवमानना ​​कार्यवाही शुरू की जा सकती है।

With inputs from PTI

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