क्या है #OROP, जिसके लिए 40 वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं सैनिक
आखिर क्या है ओआरओपी जिसे लेकर 40 वर्षों से राजनीति में मचा रहता है कोहराम।
नई दिल्ली। हरियाणा के भिवानी के रहने वाले रिटायर्ड सूबेदार राम कृष्ण ग्रेवाल की आत्महत्या के बाद एक बार फिर वन रैंक वन पेंशन (ओआरओपी) का मुद्दा गर्मा गया है। ओआरओपी एक ऐसा विषय जो पिछले 40 वर्षों से रिटायर्ड सैनिकों के लिए संघर्ष की वजह बना हुआ है।

हर बार विवाद का मुुद्दा
कई सरकारों की ओर से ओआरओपी को मंजूरी दी जा चुकी है लेकिन इसके बाद भी इसमें कई पेंच हैं। इन अड़चनों की वजह से ही ओआरओपी आज कई मुश्किलों में है। आखिर ओआरओपी है क्यों और क्यों हर बार यह एक विवाद का
विषय बन जाता है।
क्या है ओआरओपी
ओआरओपी के तहत रिटायर होने वाले सेम रैंक के सैनिकों को एक समान सेवा कार्यकाल के साथ एक जैसी पेंशन दी जानी चाहिए चाहे उनके रिटायरमेंट की तारीख कुछ भी हो।
ओआरओपी के तहत पेंशन की दरों में होने वाला बदलाव पहले रिटायर हुए सैनिकों और वर्तमान में रिटायर होने वाले सैनिकों के लिए एक समान रहेगा। ऐसे में रिटायरमेंट किसी भी तारीख पर हो ओआरओपी हमेशा प्रभावी रहेगा।
क्या है ओआरओपी की अहमियत
जहां कुछ सैनिक 35 से 37 वर्ष की उम्र में रिटायर हो जाते हैं तो वहीं कुछ 54 से 56 वर्ष की उम्र में रिटायर होते हैं।
इसके अलावा उनके पास उनकी तनख्वाह में बाकी नागरिकों की तरह बढ़ोतरी का भी कोई विकल्प नहीं होता है। ऐसे में वह सिर्फ अपनी पेंशन पर निर्भर करते हैं।
विशेषज्ञों की मानें तो ओआरओपी युवाओं को उत्साहित कर सकती है कि वे सेनाओं में शामिल हों।
अगर ओआरओपी आ जाता है तो फिर ज्यादा से ज्यादा युवा सेनाओं के लिए आकर्षित होंगे। वे मानते हैं कि ओआरओपी के बाद एक तरह की वित्तीय सुरक्षा मिलती है तो काफी अहमियत रखती है।
ओआरओपी की अड़चनें
वर्ष 1973 में पहली बार ओआरओपी की मांग की गई। उस समय कहा गया कि सैनिकों और आम नागरिकों की पेंशन एक समान होनी चाहिए। लेकिन कई तरह की बाधाएं आईं।
तब से लेकर आज तक ओआरओपी बराबर बहस का मुद्दा बना हुआ है। वर्ष 1973 से लेकर अब तक ओआरओपी में शुरुआती निवेश इसे सफल बनाने से रोकता है।
आमतौर पर पेंशन की राशि सर्विंग ऑफिसर या पर्सनल की तनख्वाह से ही काट ली जाती है।
ओआरओपी की वजह से सरकार की जेब पर सीधा बोझ पड़ेगा। वहीं वित्त आयोग की ओर से तनख्वाह में इजाफे के बाद भी सरकारी खर्चे बढ़ जाएंगे।
क्या है वर्तमान स्थिति
सरकार ने ओआरओपी के कांसेप्ट को स्वीकार कर लिया है लेकिन हर वर्ष पे स्केल को बेस ईयर के तौर पर लेने का तर्क दिया जाता है।
सरकार वर्ष 2011 के पे स्केल को बेस ईयर के तौर पर लेना चाहती थी लेकिन वेटरंस की मांग थी कि इसे वर्ष 2014 से लिया जाए।
तीन वर्ष के अंतर से न सिर्फ सैलरी और पेंशन का अंतर बढ़ेगा बल्कि रिटायर होने वाले सैनिकों की संख्या में भी इजाफा होगा।
अतिरिक्त सैनिकों की वजह से करीब 4,000 करोड़ से 6,000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ सरकार पर पड़ा। अंत में सरकार को मांगों के आगे झुकना पड़ा और वर्ष 2014 को बेस ईयर माना गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने ओआरओपी को लागू कर दिया है। इसे लागू करने के साथ ही 1,000 करोड़ के खर्च का अनुमान लगाया गया है। सरकार का कहना है कि इंस्टॉलमेंट्स में इसे दिया जाएगा।
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