लेफ्ट के आखिरी किले में भी बज गई खतरे की घंटी! बंगाल और त्रिपुरा की तरह केरल भी हो जाएगा साफ?
Kerala Lok Sabha Chunav Result 2024: वामपंथी दलों के अंतिम गढ़ केरल में इस बार सत्ताधारी लेफ्ट डेमोक्रैटिक फ्रंट (LDF) को 20 में से सिर्फ एक सीट मिली है। जबकि गठबंधन ने इस चुनाव में पूरा दम लगाया था। गठबंधन ने प्रमुख चुनाव क्षेत्रों में धुरंधरों को उतारा था।
केरल में इस बार 2019 की तरह यूनाइटेड डेमोक्रैटिक फ्रंट (UDF) के पक्ष में कोई माहौल भी नहीं नजर आ रहा था। सबरीमाला जैसा कोई संवेदनशील मुद्दा भी नहीं था, जिसे पिछली बार सीपीएम की अगुवाई वाले एलडीएफ की करारी हार का कारण बताया गया। इस बार ऐसा कोई धमाकेदार सियासी मुद्दा नहीं था, जो उसके खिलाफ होने की संभावना हो।

केरल में भी लेफ्ट के पैर के नीचे से खिसक गई जमीन!
सबरीमाला मुद्दे के दौरान वामपंथी सरकार के रवैए के बाद हुए चुनावी नुकसान को देखते हुए, 2019 के चुनावों के बाद सीपीएम की सेंट्रल कमेटी ने प्रदेश नेतृत्व को सलाह दी थी कि कुछ ऐसी रणनीति पर काम करें, ताकि परंपरागत हिंदू वोटों को अपने साथ जोड़े रख सकें।
लेफ्ट से राइट होने लगे एलडीएफ के वोटर
लेकिन, 2014 के लोकसभा चुनावों में अलपुझा और अट्टिंगल चुनाव क्षेत्रों में चुनाव नतीजों को देखने से लगता है कि एझावा समुदाय का वोट भारतीय जनता पार्टी की ओर खिसक गया है। यह जाति सीपीएम की कोर वोटर समझी जाती रही है। लेकिन, बीजेपी की ओर इनके झुकाव ने इस बार एलडीएफ उम्मीदवारों की किस्मत पर ताला लगाने का काम कर दिया।
एलडीएफ के वोट शेयर में गिरावट
2019 के चुनावों के मुकाबले पूरे केरल में एलडीएफ के वोट शेयर में 2% की गिरावट ही दर्ज की गई है। यह 35.3% से गिरकर 33.3% रह गया है। वामपंथियों के लिए सबसे बड़ी चिंता की वजह ये होगी कि उसके वोटों में वहां गिरावट हुई है, जो उसके गढ़ माने जाते रहे हैं। लेकिन, अगर गहराई से देखें तो यह समस्या इनके लिए बहुत ही गंभीर है
पार्टी की अपनी सीटों पर भागने लगे हैं समर्थक वोटर
मसलन, कन्नूर लोकसभा सीट की थालीपरम्बा विधानसभा सीट में एलडीएफ प्रत्याशी को इस बार सिर्फ 75,544 वोट पड़े हैं। जबकि, 2019 में यहां उसे 80,719 वोट मिले थे। जबकि, थालीपरम्बा से सीपीएम के प्रदेश सचिव एमवी गोविंदन विधायक हैं।
दिग्गजों की सीटों पर भी पार्टी उम्मीदवारों के छूटे पसीने
इसी तरह धर्मदम विधानसभा क्षेत्र में एलडीएफ के कन्नूर प्रत्याशी एमवी जयराजन को मात्र 2,616 वोटों की लीड मिली है। यह वही विधानसभा सीट है, जहां पर 2021 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पिनराई विजयन 50,123 से अधिक वोटों से जीते थे। इसी तरह मट्टनूर विधानसभा क्षेत्र में पार्टी उम्मीदवार को महज 3,034 वोटों की बढ़त मिली है, जहां पूर्व स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा रिकॉर्ड 60,000 से ज्यादा वोटों से जीती थीं।
10 सीटों पर एक लाख से ज्यादा वोटों से हारे एलडीएफ उम्मीदवार
केरल की 20 लोकसभा सीटों में से 10 सीटों पर एलडीएफ के उम्मीदवारों की 1 लाख से भी ज्यादा वोटों से हार हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसा नहीं है कि केरल में लोकसभा चुनाव में यूडीएफ और विधानसभा चुनाव में एलडीएफ को वोट देने वाला यह परंपरागत ट्रेंड है; और न ही इसका राज्य सरकार के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी से लेना देना है।
मुस्लिम वोटरों को लुभाने में जुटा रह गया लेफ्ट
यह भी तथ्य है कि सीपीएम ने इस बार मुस्लिम वोट जुटाने के लिए पूरे चुनाव अभियान को सीएए और गाजा से लेकर यूसीसी जैसे मुद्दों पर केंद्रित कर दिया था। लेकिन, सीपीएम उन सीटों पर भी कुछ नहीं कर पाई, जहां मुस्लिम आबादी 25% से भी ज्यादा है।
भाजपा केरल में पहली बार जीती है लोकसभा चुनाव
भारतीय जनता पहली बार केरल में एक सीट जीतने में सफल रही है। उसे त्रिशूर में सफलता मिली है और उसने कई सीटों पर जोरदार प्रदर्शन किया है। जिस तरह से अभी केरल में एलडीएफ की पकड़ है, कभी वैसा ही पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में भी लेफ्ट फ्रंट का हुआ करता था।
बंगाल में टीएमसी ने वामपंथियों को ऐसे उखाड़ा कि अब वह अपने दम पर चुनाव लड़ने की स्थिति में भी नहीं रह गए हैं। त्रिपुरा में उनके साथ बीजेपी भी ऐसा ही कर चुकी है।












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