बीजेपी के घोषणापत्र से ग़ायब 'अफ़स्पा क़ानून' मणिपुर चुनाव में कितना बड़ा मुद्दा?
पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर की कुल 60 विधानसभा सीटों के लिए 28 फ़रवरी और 5 मार्च को दो चरणों मतदान होने हैं.
सत्तारूढ़ बीजेपी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी जैसे शीर्ष नेता मणिपुर में चुनावी सभाएं कर रहे हैं. वहीं कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत कई केंद्रीय नेताओं के मणिपुर में चुनाव प्रचार करने से यहां मुक़ाबला बेहद दिलचस्प बन गया है.
बीजेपी और कांग्रेस के बीच होने वाले इस चुनावी मुक़ाबले में नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी), जनता दल (यूनाइटेड) और नागा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) के प्रदर्शन पर भी लोगों की नज़र टिकी हुई है. दरअसल राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो पिछली बार की तरह इस बार का चुनाव भी त्रिशंकु सदन की ओर इशारा कर रहा है. अगर ऐसा होता है तो प्रदेश में नई सरकार गठन करने में इन छोटे क्षेत्रीय दलों की भूमिका काफ़ी अहम साबित होगी.
क्योंकि 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की 28 सीटों के मुक़ाबले बीजेपी ने महज 21 सीटें जीती थी लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने एनपीपी (4 सीटें), एनपीएफ (4 सीटें), टीएमसी (1 सीट), लोक जनशक्ति पार्टी (1 सीट), तथा एक निर्दलीय विधायक के साथ मिलकर सरकार बना ली थी. मणिपुर में बीजेपी ने पांच साल गठबंधन की सरकार चलाने के बाद इस बार भी राज्य के लोगों से कई बड़े वादे किए हैं.
मणिपुर विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने 17 फ़रवरी को मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह की मौजूदगी में पार्टी का घोषणापत्र जारी किया, जिसमें प्रमुख तौर पर 'प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना' के तहत महिलाओं के लिए साल में दो मुफ़्त एलपीजी सिलेंडर, कॉलेज जाने वाली सभी मेधावी लड़कियों को मुफ़्त स्कूटर, बारहवीं कक्षा पास करने वाले सभी मेधावी छात्रों को मुफ़्त लैपटॉप, कौशल विश्वविद्यालय तथा चिकित्सा सुविधाओं के लिए एक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की स्थापना जैसे कई बड़े वादे किए गए हैं.
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लेकिन बीजेपी के इस चुनावी घोषणापत्र में अफ़स्पा (AFSPA) यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून को निरस्त करने से जुड़ी कोई भी बात शामिल नहीं है.
नगालैंड में दो महीने पहले जब भारतीय सेना की कथित गोलीबारी में 13 नागरिकों की मौत हो गई थी उस दौरान जिन राज्यों से अफ़स्पा यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून को हटाने की मांग उठी थी उसमें मणिपुर भी शामिल था.
नगालैंड के मोन ज़िले की घटना के बाद पूर्वोत्तर भारत में इस क़ानून के ख़िलाफ़ स्थानीय लोगों के विरोध को देखते हुए गृह मंत्रालय ने पांच सदस्यीय कमेटी बनाने की घोषणा की थी. उस समय लोगों को लगा शायद नगालैंड, मणिपुर जैसे राज्यों से भारत सरकार अफ़स्पा क़ानून को हटाएगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.
लोग इतने ग़ुस्से में थे कि नगालैंड विधानसभा को इस क़ानून के ख़िलाफ़ एक विशेष सत्र आयोजित कर एक प्रस्ताव पारित करना पड़ा. वहीं अफ़स्पा क़ानून को लेकर लोगों के ग़ुस्से को देखते हुए मणिपुर, मेघालय के मुख्यमंत्रियों ने अपनी प्रतिक्रिया दी थी.
उस समय मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने कहा था, "मैं ख़ुद अफ़स्पा के ख़िलाफ़ हूं. लेकिन एक ज़िम्मेदार प्रधान के रूप में मुझे राष्ट्रीय सुरक्षा भी देखनी है."
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वहीं मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा ने अफ़स्पा क़ानून को ख़त्म करने की मांग उठाई थी. कोनराड संगमा एनपीपी दल के प्रमुख हैं. मेघालय और मणिपुर में उनकी पार्टी बीजेपी के साथ गठबंधन में है.
एनपीपी ने 2017 के मणिपुर चुनाव में नौ सीटों पर चुनाव लड़ा था और चार पर जीत हासिल की. लेकिन इस बार अकेली चुनाव लड़ रही एनपीपी ने मणिपुर में 38 उम्मीदवार उतारे हैं.
दरअसल उग्रवाद प्रभावित पूर्वोत्तर के कई राज्यों में अफ़स्पा क़ानून एक बड़ा चिंता का विषय है. आलोचक इस क़ानून को "फर्जी हत्याओं" के लिए दोषी ठहराते हैं और कहते हैं कि अक्सर इसका दुरुपयोग होता है.
मणिपुर चुनाव में यह एक बड़ा मुद्दा है जिस पर विपक्षी पार्टी कांग्रेस लगातार बीजेपी को घेर रही है. कांग्रेस ने वादा किया है कि अगर वह मणिपुर विधानसभा चुनाव जीतकर सत्ता में वापसी करती है तो अफ़स्पा को निरस्त करने के लिए काम करेगी.
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बीजेपी नेतृत्व वाली सरकार में सहयोगी रही एनपीपी ने भी अपने चुनावी घोषणा पत्र में सबसे पहले अफ़स्पा को ख़त्म करने का वादा किया है.
मणिपुर में एनपीपी के महासचिव शेख़ नूरुल हसन ने बीबीसी से कहा,"हमारी पार्टी जिन चार महत्वपूर्ण मुद्दों पर इस बार का चुनाव लड़ रही है उसमें सबसे बड़ा मुद्दा मणिपुर में अफ़स्पा को हटाने का है. बीजेपी सरकार में हम एक छोटे पार्टनर थे लेकिन हमने मुख्यमंत्री के समक्ष मज़बूत शर्तों के साथ दो बार अफ़स्पा हटाने की बात रखी थी लेकिन वो हमारी बात सुनने को तैयार नहीं थे."
एनपीपी महासचिव हसन बीजेपी पर आरोप लगाते हैं कि मौजूदा सरकार में उनके चारों विधायक मंत्री होते हुए भी उन्हें काम करने की खुली छूट नहीं थी. वित्त विभाग एनपीपी के मंत्री के पास होने के बावजूद 2 करोड़ से ज़्यादा लेनदेन के लिए मुख्यमंत्री की मंजूरी लेनी पड़ती थी.
एनपीपी नेता दावा करते हैं कि इस बार प्रदेश में उनकी पार्टी एक वैकल्पिक राजनीतिक पार्टी के तौर पर उभरी है और अफ़स्पा जैसे मुद्दों पर मणिपुर की जनता उनको अपना समर्थन देगी.
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मणिपुर के बहुसंख्यक मैती समुदाय से आने वाले 37 साल के प्रेम कुमार चाहते कि अफ़स्पा को अब प्रदेश से हटाया जाना चाहिए.
राजधानी इंफ़ाल में छोटा मोटा कारोबार कर अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे प्रेम कहते हैं, "यह केवल मेरी बात नहीं है बल्कि मणिपुर का हर व्यक्ति चाहता है कि अफ़स्पा को यहां से हटाया जाए. यह हम सबके लिए एक चिंता का विषय है. केंद्र सरकार बार-बार 'यह उग्रवाद क्षेत्र है' कह कर इस क़ानून को लागू कर देती है लेकिन इससे आम लोगों में हमेशा डर बना रहता है. लोग देर शाम घर से बाहर निकलने में डरते हैं."
मणिपुर विधानसभा चुनाव में बेरोज़गारी, क़ानून- व्यवस्था, शिक्षा- स्वास्थ्य से जुड़े कई मुद्दों पर बात हो रही है. लेकिन सवाल यह है कि क्या यहां के मतदाता वोट डालते समय अफस्पा को हटाने जैसे मुद्दे को ध्यान रखेंगे?
मणिपुर में लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप फ़नजोबम कहते हैं, "मणिपुर में अफ़स्पा क़ानून का काफ़ी विरोध है. लेकिन मतदान वाली राजनीति और यहां अलगाववाद पॉलिटिक्स में काफ़ी फर्क़ है. इसलिए चुनाव में इसका कोई असर नहीं दिखता. पिछले दिनों असम में भी ऐसी ही राजनीति देखने को मिली थी. जिस तरह वहां लोगों ने नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के ख़िलाफ़ विरोध और ग़ुस्सा जाहिर किया था ठीक उसके उलट जब चुनाव हुए तो लोगों ने सीएए को लाने वाली बीजेपी के समर्थन में ही वोट डाल दिया. यही स्थिति मणिपुर में भी है."
वो कहते है, "अफ़स्पा उग्रवाद को चुनौती देने वाला सही क़ानून नहीं है. इसलिए यह बहुत ख़तरनाक है. उग्रवाद की चुनौती से निपटने के लिए पुलिस को सशक्त करने की आवश्यकता है. अगर पुलिस अलगाववादियों से निपटने के दौरान आम नागरिकों के साथ कोई क्रूरता करती है तो क़ानून के अनुसार उसकी जवाबदेही तय की जा सकती है. क्योंकि मणिपुर में जिन पुलिस वालों ने फर्ज़ी एनकाउंटर किए थे उनके ख़िलाफ़ कोर्ट में कार्रवाई हुई लेकिन अफ़स्पा के तहत ऐसे मामलों में कोई कार्रवाई नहीं होती. अफस्पा में किसी पर कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार की तरफ़ से राज्य पुलिस को अभियोग मिलना होगा. लेकिन केंद्र सरकार इस तरह के अभियोग की मंजूरी ही नहीं देती. जम्मू- कश्मीर से लेकर मणिपुर तक ऐसे कई उदाहरण है."
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मणिपुर में अफ़स्पा क़ानून को लागू किए करीब 63 साल हो गए हैं. इस क़ानून के प्रावधानों के तहत अशांत क्षेत्रों में भारतीय सशस्त्र बलों को विशेष अधिकार मिलते हैं. सुरक्षाबलों को बिना वारंट घर की तलाशी लेने से लेकर संज्ञेय अपराध करने वाले किसी भी व्यक्ति को गिरफ़्तार करने तथा गोली चलाने का अधिकार होता है.
मौजूदा समय में यह क़ानून मणिपुर के अलावा जम्मू-कश्मीर, असम, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में लागू है.
पत्रकार फ़नजोबम के अनुसार मणिपुर सरकार ने जनवरी में अफ़स्पा क़ानून के मियाद को एक और साल के लिए बढ़ा दिया था, ऐसे में सत्तारूढ़ पार्टी अपने चुनावी घोषणा पत्र में इसका विरोध नहीं कर सकती.
मणिपुर में बीजेपी के लिए क्या अफ़स्पा चुनावी मुद्दा नहीं है? इस सवाल का जवाब देते हुए मणिपुर प्रदेश बीजेपी के प्रवक्ता बसंत शर्मा कहते हैं, "फिलहाल अफ़स्पा राज्य में कोई मुद्दा नहीं है. क्योंकि प्रदेश में बीजेपी की सरकार आने के बाद फर्जी मुठभेड़ और एक्स्ट्रा जुडिशियल किलिंग का एक भी मामला सामने नहीं आया. इसलिए अभी अफ़स्पा को निरस्त करना इतना ज़रूरी नहीं है. हमारी सरकार ने क़ानून-व्यवस्था में भी काफ़ी सुधार किया है."
एनपीपी के आरोपों का जवाब देते हुए बीजेपी प्रवक्ता कहते हैं, "अफ़स्पा हटाने के संदर्भ में एनपीपी ने सरकार के साथ कोई चर्चा नहीं की थी. एनपीपी के लोग झूठ बोल रहे हैं. क्योंकि पिछले पांच साल में अफ़स्पा को लेकर कोई सवाल ही नहीं उठा. अगर फिर भी जनता को लगता है कि इस क़ानून को वापस लेना जरूरी है तो समय आने पर हमारी सरकार आवश्यक कदम उठाएगी. जहां तक एनपीपी का आरोप है कि उनके मंत्रियों को खुली छूट नहीं थी अगर यह बात सच है तो वे लोग अब तक हमारी सरकार का समर्थन कैसे करते रहे."
अफ़स्पा क़ानून के ख़िलाफ़ 16 सालों तक भूख हड़ताल करने वाली इरोम शर्मिला को साल 2017 के विधानसभा चुनाव में केवल 90 वोट मिले थे.
इरोम को लगा कि उनकी भूख हड़ताल का सरकार पर काफ़ी कम असर पड़ रहा है तो उन्होंने मणिपुर से अफ़स्पा को हटाने के लिए राजनीति में क़दम रखा लेकिन लोगों ने उनका साथ नहीं दिया.
उस चुनाव में इरोम ने एक नई राजनीतिक पार्टी - पीपल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस एलायंस बनाई थी जिसके बैनर तले पांच उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था और वे सभी हार गए थे.
अफ़स्पा के ख़िलाफ़ इरोम शर्मिला की लड़ाई में लंबे समय तक साथ रहे जानेमाने मानवाधिकार कार्यकर्ता बबलू लोइटोंगबाम ने बीबीसी से कहा, "2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब मणिपुर के दौरे पर आए थे उस समय उन्होंने भी मणिपुर में अफ़स्पा क़ानून को वापस लेने की बात कही थी. शर्मिला ने उस समय बहुत भरोसे के साथ मोदी जी को चिट्ठी भी लिखी थी. क्योंकि शर्मिला को ऐसी उम्मीद थी की बीजेपी शासन में आने से उनकी आवाज़ सुनी जाएगी लेकिन अफ़सोस की बात है कि सरकार में आने के बाद से पीएम मोदी ने इस मुद्दे पर कुछ नहीं किया."
वो कहते हैं, "बीजेपी में शामिल होने से पहले तक मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह भी अफ़स्पा विरोधी आंदोलन से जुड़े हुए थे लेकिन बाद में वे यू-टर्न ले लिए. 2017 तक बीजेपी के घोषणापत्र में अफ़स्पा हटाने का मुद्दा शामिल था लेकिन इसे बीजेपी का पाखंड ही कहेंगे कि उसके बाद से इस मसले पर कोई बात नहीं की जा रही है."
मानव अधिकार कार्यकर्ता बबलू अफ़स्पा हटाने के मुद्दे पर कांग्रेस की भी आलोचना करते हुए कहते हैं, "कांग्रेस के पी चिदंबरम जब देश के गृह मंत्री थे उस समय उन्होंने भी अफ़स्पा को लेकर कुछ नहीं किया लेकिन अब जब सत्ता में नहीं है तो अफ़स्पा को लेकर अख़बारों में ज़बरदस्त आर्टिकल लिख रहे हैं. राजनीति करने वाले इन पाखंडी नेताओं के कारण आम वोटर के पास चुनाव में अपने मुद्दे के लिए कोई विकल्प ही नहीं बचता."
पत्रकार प्रदीप फ़नजोबम अफ़स्पा जैसे गंभीर मुद्दे के ख़िलाफ़ खड़े होने के लिए महिलाओं की अधिक भागीदारी की ज़रूरत बताते हैं.
वे कहते हैं, "मणिपुर में महिलाएं बहुत शक्तिशाली हैं लेकिन विधानसभा में उनकी उपस्थिति काफ़ी कम है. महज दो या तीन महिला ही विधानसभा में पहुंच पाती हैं. अफ़स्पा जैसे मुद्दे के ख़िलाफ़ महिलाओं को लड़ना होगा."
अफ़स्पा के ख़िलाफ़ इरोम शर्मिला का आंदोलन भले ही ख़त्म हो गया है लेकिन सुप्रीम कोर्ट में मणिपुर के 1528 कथित फर्जी मुठभेड़ के मामले विचाराधीन है. कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सीबीआई ने क़रीब 39 मामलों की जांच की है. ऐसी उम्मीद की जा रही है कि अफस्पा के ख़िलाफ़ जारी क़ानूनी लड़ाई ही उन सारी विधवा महिलाओं को न्याय दिलाएगी.
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