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Freebies: राजनीतिक फायदे के लिए मुफ्त स्कीम पड़ेगी भारी! बनेगा दीर्घकालिक आर्थिक संकट, इस रिपोर्ट ने डराया

Freebies Schemes: देश में पिछले कुछ वक्त से विकास और भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति के दावे के साथ-साथ अब राजनीतिक मुफ्त उपहार (Freebies Schemes) देश में चुनाव जीतने के लिए एक अहम रणनीति बन गई है। जो कभी सिर्फ चुनावी वादे हुआ करते थे, आज वो मुफ्त की योजनाओं यानी रेवड़ियों पर आकर सिमट गई है। ऐसे में अब इस मुफ्त-मुफ्त की राजनीति को लेकर एक डरा देने वाली रिपोर्ट सामने आई है।

एक्विटास इन्वेस्टमेंट (Aequitas Investments ) की एक रिपोर्ट बताती है कि कैसे राजनीतिक पार्टियां वोट हासिल करने के लिए कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर मुफ्त उपहारों पर निर्भर हो रहे हैं, जो आगे चलकर सबसे बड़ा आर्थिक संकट बनकर सामने आएगी।

Freebies Schemes

Freebies: अल्पकालिक फायदा, दीर्घकालिक आर्थिक चुनौती

रिपोर्ट में कहा गया है, "जैसे-जैसे राजनीतिक दल नीचे की ओर जाने की दौड़ में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, कल्याणकारी योजनाएं और 'मुफ्त उपहार' सिर्फ चुनावी वादों से बढ़कर राजनीतिक सत्ता की नई मुद्रा बन गई हैं।" इस रिपोर्ट में बताया गया है कि जैसे-जैसे राजनीतिक सत्ता की दौड़ तेज होती जाएगी, चुनौती यह सुनिश्चित करने की होगी कि अल्पकालिक राजनीतिक लाभ दीर्घकालिक आर्थिक संकट का कारण ना बनें।

रिपोर्ट में कहा गया है कि 2024 के आम चुनाव देश की राजकोषीय नीतियों में एक अहम बदलाव को चिह्नित करेंगे। राज्य चुनावों ने यह भी दर्शाया कि कैसे राजनीतिक दल "सबसे निचले स्तर की दौड़" में शामिल हैं, एक-दूसरे से आगे निकलने के लिए ज्यादा से अधिक मुफ्त उपहार दे रहे हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ये कल्याणकारी योजनाएं, हालांकि अल्पावधि में नागरिकों के लिए फायदेमंद हैं, लेकिन लंबे समय में राज्यों के लिए गंभीर वित्तीय जोखिम पैदा करती हैं।

Freebies: कर्नाटक का उदाहरण आया सामने

कर्नाटक का उदाहरण बताते हए कहा गया है कि राज्य चुनावों में कांग्रेस पार्टी की जीत के बाद उसने कई महंगी कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं। गृह लक्ष्मी योजना, जो महिलाओं को 2,000 रुपये प्रति माह प्रदान करती है, और गृह ज्योति योजना, जो 200 यूनिट मुफ्त बिजली प्रदान करती उसे मिलकर लगभग 52,000 करोड़ रुपये खर्च किए हैं।

यह राशि 2023-24 के लिए राज्य के राजकोषीय घाटे का 78 प्रतिशत है, जिससे कर्नाटक की वित्तीय स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। इसके विपरीत राज्य में भाजपा की योजनाबद्ध कल्याणकारी खर्च केवल 2100 करोड़ रुपये या घाटे का सिर्फ 3 प्रतिशत था।

देश में हर राज्य में चुनावी मुफ्त योजनाओं का बोलबाला

यह प्रवृत्ति केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं है। अन्य राज्यों ने भी अपने महंगे कल्याण कार्यक्रमों की घोषणा करते हुए इसका अनुसरण किया है, जो इस प्रकार है:

महाराष्ट्र ने "लाडली बहना योजना" जैसी योजनाएं शुरू कीं, इसके अलावा राज्य राजमार्गों पर टोल फीस समाप्त करना, कृषि ऋण माफी और मुफ्त स्वास्थ्य सेवा शामिल है, जिसकी लागत सालाना 44,000 करोड़ रुपये है।

उत्तर प्रदेश ने महिला पेंशन और वृद्धावस्था कल्याण कार्यक्रमों के लिए 36,000 करोड़ रुपये देने का वादा किया है। बिहार ने नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 75 प्रतिशत आरक्षण नीति शुरू की। दिल्ली ने बिजली सब्सिडी का विस्तार किया, जिससे 2.2 मिलियन परिवारों को शून्य बिजली बिल प्राप्त करने की अनुमति मिली।

दिल्ली में हाल ही में हुए चुनावों में 18 वर्ष से अधिक आयु की सभी महिलाओं को 2100-2500 रुपये देने का वादा किया गया है, इसके अलावा दिल्ली की महिलाओं को पहले से ही मुफ्त बस यात्रा दी जा रही है।

इन नीतियों का वित्तीय तनाव स्पष्ट हो रहा है। दिल्ली ने अपने स्वयं के वित्त विभाग के विरोध के बावजूद 2024-25 के लिए राष्ट्रीय लघु बचत कोष (NSSF) से 10,000 करोड़ रुपये का ऋण मांगा है। इसी तरह, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक सरकारी कर्मचारियों को वेतन देने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं।

रिपोर्ट में ब्राजील के बोल्सा फ़मिलिया कार्यक्रम से तुलना की गई है, जो 2003 में 3.6 मिलियन परिवारों को वित्तीय सहायता देने के लक्ष्य के साथ शुरू हुआ था। 2020 तक इस योजना का विस्तार 14.1 मिलियन परिवारों तक हो गया, जिससे गरीबी में उल्लेखनीय कमी आई, लेकिन देश की आर्थिक मुश्किलें भी बढ़ गईं।

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