क्‍या ममता से प्रेरित हैं 'आप' के अरविंद केजरीवाल ?

Arvind Kejriwal Mamata Banerjee
बैंगलोर। भारतीय राजनीति में आम आदमी पार्टी की सफलता देश के मतदाताओं में एक उम्‍मीद जगाती है। एक ऐसी पार्टी जिसने भ्रष्‍टाचार, कुशासन से उकता चुके लोगो को अपने साथ जोड़ा और व्‍यवस्‍था परिवर्तन का सपना दिखाया। 'आप' के उद्भव ने राजनीति में कहीं पीछे छूट चुके सिद्धांतों की फिर से याद दिलाई। भले ही 'आप' का सत्‍ता में आना अभी कठिन दिखाई देता हो, पर यह भी एक सवाल कि जिन सिद्धांतों के आधार पर जनता ने पार्टी पर भरोसा दिखाया है, क्‍या उन पर वह आगे भी कायम रह पाएगी। एक अन्‍य नेता ममता बनर्जी की बात करें तो उन्‍होने पश्चिम बंगाल में एक ऐसी पार्टी का आधिपत्‍य खत्‍म किया जो कि पिछले 34 वर्षों से लगातार सत्‍ता में थी, उन्‍होने वाम पार्टियों के प्रति जनता में व्‍याप्‍त आक्रोश को अपनी जीत का आधार बनाया पर अब यह जगजाहिर है कि पार्टी जनता से किये गये अपने वादों को नहीं निभा पा रही हैं।

सत्‍ता में आने पर ही होगी 'आप' की असली परीक्षा

भारत जैसे विविधता वाले देश में जहां कई क्षेत्रीय पार्टियां हैं ऐसे में 'आप' के सत्‍ता में आने पर अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम किस तरह से राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अपने मूल्‍यों के साथ टिक पाते हैं और वह कैसे समझौते करेंगे। इसका परीक्षण किया जाना बाकी है। पहले भी देश की जनता ने देखा है कि व्‍यक्तिगत लाभ पाने के लिए कई बार गठबंधन और सिद्धांतों को ताक पर रखकर राजनीति की जाती है।

'आप' के मजबूत पक्ष

'आप' के सामने भले ही बड़ी चुनौतियां हो लेकिन खास बात यह है कि देश का वो तबका इसे विकल्‍प के रूप में देखता है, जो वर्तमान राजनीति से निराश हो चुका है वहीं देश का शहरी वर्ग भी इसे ईमानदार पार्टी के रूप में देखता है। हालांकि यह भी एक सच है कि नरेंद्र मोदी देश के एकमात्र नेता है जो कि शहरी मतदाताओं का ध्‍यान आकर्षित करने के साथ ही उनका भरोसा जीत सके हैं।

इसके अलावा एक तीसरे विकल्‍प के रूप में भी 'आप' ने दिल्‍ली की राजनीति को रोमांचक बना दिया है और राज्‍य में दो पार्टियों के एकाधिकार को खत्‍म किया है वहीं 'आप' में विचारधारा की भी कमी देखी जा रही है, जो कि लोगों को उनसे जोड़ने का काम करती है। स्‍वतंत्रता के पहले कांग्रस एक राष्‍ट्रीय विचारधारा वाली पार्टी मानी जाती थी, ठीक वैसे ही अभी 'आप' के पास 'भ्रष्‍टाचार मुक्‍त भारत' ही एकमात्र एजेंडा है। सत्‍ता में आने के बाद पार्टी किस तरह से इसी एजेंडे को आगे बढ़ाएगी खासकर उस स्थिति में जब देश के अन्‍य दलों के लिए व्‍यक्तिगत लाभ ही सर्वोपरि हैं।

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