क्या ममता से प्रेरित हैं 'आप' के अरविंद केजरीवाल ?

सत्ता में आने पर ही होगी 'आप' की असली परीक्षा
भारत जैसे विविधता वाले देश में जहां कई क्षेत्रीय पार्टियां हैं ऐसे में 'आप' के सत्ता में आने पर अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम किस तरह से राष्ट्रीय स्तर पर अपने मूल्यों के साथ टिक पाते हैं और वह कैसे समझौते करेंगे। इसका परीक्षण किया जाना बाकी है। पहले भी देश की जनता ने देखा है कि व्यक्तिगत लाभ पाने के लिए कई बार गठबंधन और सिद्धांतों को ताक पर रखकर राजनीति की जाती है।
'आप' के मजबूत पक्ष
'आप' के सामने भले ही बड़ी चुनौतियां हो लेकिन खास बात यह है कि देश का वो तबका इसे विकल्प के रूप में देखता है, जो वर्तमान राजनीति से निराश हो चुका है वहीं देश का शहरी वर्ग भी इसे ईमानदार पार्टी के रूप में देखता है। हालांकि यह भी एक सच है कि नरेंद्र मोदी देश के एकमात्र नेता है जो कि शहरी मतदाताओं का ध्यान आकर्षित करने के साथ ही उनका भरोसा जीत सके हैं।
इसके अलावा एक तीसरे विकल्प के रूप में भी 'आप' ने दिल्ली की राजनीति को रोमांचक बना दिया है और राज्य में दो पार्टियों के एकाधिकार को खत्म किया है वहीं 'आप' में विचारधारा की भी कमी देखी जा रही है, जो कि लोगों को उनसे जोड़ने का काम करती है। स्वतंत्रता के पहले कांग्रस एक राष्ट्रीय विचारधारा वाली पार्टी मानी जाती थी, ठीक वैसे ही अभी 'आप' के पास 'भ्रष्टाचार मुक्त भारत' ही एकमात्र एजेंडा है। सत्ता में आने के बाद पार्टी किस तरह से इसी एजेंडे को आगे बढ़ाएगी खासकर उस स्थिति में जब देश के अन्य दलों के लिए व्यक्तिगत लाभ ही सर्वोपरि हैं।












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