2018 में 92 दिन, दिल्लीवासियों ने ली जहरीली हवा में सांस

नयी दिल्ली। देश की राजधानी में धुंध छाते ही देश भर के टीवी चैनलों की स्‍क्रीन धुआं-धुआं हो जाती है। हर तरफ एक ही चर्चा- दिल्ली की जहरीली हवा। बात अगर बीते साल यानी 2018 की करें, तो साल के 365 दिनों में मात्र 5 दिन दिल्लीवासियों को शुद्ध हवा मिली। जबकि 92 दिन ऐसे रहे, जिसमें वातावरण बेहद जहरीली गैसों से भरा हुआ था। यह हम नहीं बल्कि दिल्ली के रेजीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन की शीर्ष संस्था यूनाइटेड रेजीडेंट्स ज्वाइंट एक्शन (ऊर्जा) के द्वारा किये गये सर्वे की रिपोर्ट कह रही है। रिपोर्ट के अनुसार बीते वर्ष 66 दिन प्रदूषण के लिहाज से औसत रहे। वहीं, 145 दिन प्रदूषण का स्तर खराब जबकि 57 दिन बहुत ज्यादा खराब।

संस्‍था ने दिल्ली में वायु प्रदूषण से निपटने के लिये लागू किये गये ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (जीआरएपी) की प्रभावशीलता, प्रदूषण के दमघोंटू स्तर तक पहुंचने के तीन साल बाद इसे लेकर नागरिकों में जागरूकता के स्तर और जीआरएपी को लागू करने के लिये जिम्मेदार संस्थाओं की जवाबदेही मापने की कोशिश भी की। इस प्रयास के तहत केन्द्र, राज्य तथा नगरीय निकायों के 14 विभागों में आरटीआई के जरिये कई तथ्य उजागर हुए।

 जहरीली हुई दिल्ली की हवा

जहरीली हुई दिल्ली की हवा

ऊर्जा ने आर्क फाउंडेशन की मदद से एक सर्वेक्षण कराया गया, जिसका उद्देश्य दिल्ली के निवासियों के बीच वायु प्रदूषण को लेकर जागरूकता के स्तर का पता लगाना था। यह सर्वेक्षण केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा दिल्ली के 10 इलाकों रोहिणी, आनंद विहार, आईटीओ, सिरी फोर्ट, बवाना, आर.के. पुरम, पटपड़गंज, लोधी रोड, द्वारका और अशोक विहार में लगे प्रदूषण निगरानी केन्द्रों के पांच किलोमीटर की परिधि में किया गया। जिन लोगों पर यह सर्वे किया गया, उनमें से 89 प्रतिशत को ऐसी किसी भी निगरानी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। वहीं, 88 प्रतिशत लोगों ने वायु की गुणवत्ता सम्बन्धी आंकड़े प्रदर्शित करने वाले एलईडी स्क्रीन को नहीं देखा था। ये लोग नवम्बर 2018 से 7 जनवरी 2019 के बीच प्रदूषण के खतरनाक स्तरों से बिल्कुल अनजान थे। इस दौरान जहां आनंद विहार में प्रदूषण का स्तर 960 से ज्यादा रहा, वहीं 8 नवंबर को आईटीओ में यह आंकड़ा 1700 तक पहुंच गया। जीआरएपी को जनवरी 2017 में अधिसूचित किया गया था, मगर इस नीति के लागू होने के बावजूद दिल्ली को वर्ष 2017-18 की सर्दियों में प्रदूषण के खतरनाक स्तरों से जूझना पड़ा। यहां तक कि उस साल गर्मी के मौसम में भी प्रदूषण का स्तर चिंताजनक रूप से काफी ज्यादा था। अप्रैल, मई और जून में सीबीसीबी द्वारा जारी आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। वर्ष 2018 में दिल्ली को सिर्फ पांच दिन स्वच्छ हवा मिली। इसके अलावा 66 दिन प्रदूषण के लिहाज से औसत रहे। वहीं, 145 दिन प्रदूषण का स्तर खराब, 57 दिन बहुत खराब और 92 दिन अत्यधिक खराब रहा।

 7 में से सिर्फ 1 सवाल का जवाब

7 में से सिर्फ 1 सवाल का जवाब

जीआरएपी के मुताबिक वायु की गुणवत्ता के रखरखाव के लिये सीपीसीबी, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) और भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) जिम्मेदार हैं। आरटीआई से मिली सूचनाओं से यह पता चलता है कि वायु की गुणवत्ता खराब होने की स्थिति में त्वरित कदम उठाने के लिये इतनी विस्तृत प्रक्रिया और अधिसूचना की मौजूदगी के बावजूद इसे सही तरीके से लागू नहीं की गयी। यहां तक कि जीआरएपी के क्रियान्वयन पर नजर रखने के लिये जिम्मेदार विभागों में सूचनाशून्यता और जागरूकता का अभाव भी पाया गया। ईपीसीए ने आरटीआई याचिका में पूछे गये सात सवालों में से सिर्फ एक का ही जवाब दिया। सीपीसीबी द्वारा दिए गए जवाब के मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्थित उच्च प्रदूषण श्रेणी वाली 17 औद्योगिक इकाइयों में से केवल तीन के द्वारा ही सीपीसीबी के मानकों का पालन किया गया। इनमें से दो तो अपने आप बंद हो गयीं जबकि एक ने प्रदूषण के सभी मानकों का पालन किया। आरटीआई से मिले जवाब के मुताबिक हरियाणा में 161 में से पांच राजस्थान में 161 में से 20 और उत्तर प्रदेश में 942 में से महज 25 औद्योगिक इकाइयां ही प्रदूषण नियंत्रण के मानकों पर खरी उतर सकी। सफर के मुताबिक वर्ष 2010 के मुकाबले 2018 में औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले प्रदूषणकारी तत्वों के उत्सर्जन में 48 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। ऐसा दिल्ली के अंदर नहीं बल्कि उसकी सीमा से सटे क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियों में वृद्धि के कारण हुआ है।

 समस्या के निदान के लिए गंभीर नहीं

समस्या के निदान के लिए गंभीर नहीं

संसद में चार जनवरी 2019 को उठाये गये एक सवाल पर पर्यावरण मंत्री डाक्टर हर्ष वर्द्धन ने कहा कि एनसीएपी प्रदूषण की बढ़ती हुई समस्या से निपटने के लिये देशव्यापी पंचवर्षीय रणनीति है। इसके तहत वर्ष 2024 तक पीएम 2-5 और पीएम10 के स्तरों में 20 से 30 प्रतिशत की कमी लाने का लक्ष्य है। इसके लिये वर्ष 2017 को आधार वर्ष माना गया है। मानकों पर खरे नहीं उतरने वाले (नान अटेनमेंट) 102 शहरों में एनसीएपी को लागू किया जाएगा। इस पर दो साल में 300 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक वायु प्रदूषण के कारण भारत में स्वास्थ्य के नुकसान के तौर पर चुकायी गयी कीमत इसके सकल घरेलू उत्पाद के 3 प्रतिशत के बराबर है।

 आरटीआई में पूछे गए सवाल में क्या मिला जवाब

आरटीआई में पूछे गए सवाल में क्या मिला जवाब

आश्चर्यजनक रूप से प्रदूषणकारी उद्योगों की सूची में भारी प्रदूषण फैलाने वाले वे ऊर्जा संयंत्र और अवैध निजी फैक्ट्रियां शामिल नहीं की गयी हैं, जो अब भी कोयले और तेल से चलती हैं। इनमें कचरे के निस्तारण के समुचित बंदोबस्त नहीं हैं और वे हवा में भारी मात्रा में धूल छोड़ते हैं। ऐसा ज्यादातर राख के भारी उत्सर्जन के कारण होता है। सीपीसीबी ने सभी नगर निगमों को कचरा जलाने तथा निर्माण कार्यों से निकलने वाली धूल से होने वाले वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिये प्रभावी कदम उठाने और यंत्रीकृत झाड़-पोंछ के निर्देश दिये थे। इसके बावजूद लोक निर्माण विभाग ने अभी तक एक भी यंत्रीकृत वैक्यूम स्वीपिंग मशीन नहीं खरीदी है। एयर एम्बिएंस फंड में धन होने के बावजूद ऐसा नहीं किया जा रहा है। दिल्ली में 20 स्थानों पर वायु की गुणवत्ता पर निगरानी के लिये केन्द्रों की स्थापना पर 19,06,81,086 रुपये खर्च किये। डीपीसीसी ने जनवरी 2017 में जीआरएपी के लागू होने के बाद वायु प्रदूषण पर नजर रखने के लिये एक भी रियल टाइम मानीटरिंग स्टेशन स्थापित नहीं किया। पेट्रोल से चलने वाली कारों के मुकाबले डीजल वाली कारों पर अधिक कर लगाया गया है। हालांकि 2000 सीसी या उससे ज्यादा क्षमता वाले डीजल वाहनों के पंजीयन से वसूले जाने वाले पर्यावरण प्रदूषण सम्बन्धी शुल्क के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। आरटीआई अर्जी से प्राप्त सूचना के मुताबिक एमसीडी ने बड़ी संख्या में कूड़ा जलाने वालों का चालान किया है। साथ ही इस सम्बन्ध में जागरूकता अभियान भी चलाया है। इसके बावजूद सभी वार्डों में कचरा जलाने का सिलसिला जारी है। इससे निकलने वाला जहरीला धुआं सांस लेने में दिक्कत और आंखों में जलन पैदा कर रहा है।

 रिहायशी इलाकों में औद्योगिक इकाईयां

रिहायशी इलाकों में औद्योगिक इकाईयां

टाक्सिक लिंक रिपोर्ट-2013 के मुताबिक दिल्ली में स्थित 1-3 लाख औद्योगिक इकाइयों में से एक लाख से भी ज्यादा तो रिहायशी इलाकों में स्थित अनाधिकृत और गैर-अनुरूपण क्षेत्रों में संचालित की जा रही हैं। इस समस्या से निपटने के लिये केन्द्र सरकार ने प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2016 जारी किया था, लेकिन नगर निगम के अधिकारियों द्वारा निगरानी और क्रियान्वयन के अभाव के कारण इन नियमों का समुचित पालन नहीं किया जा रहा है।सरकार ने हर नियम का क्रियान्वयन सुनिश्चित कराने और इसकी स्थिति पर नजर रखने के लिये विशेष निगरानी समितियां बनायी थीं। इसके बावजूद टनों विषैला कचरा अब भी खुले में जलाने का सिलसिला जारी है। इस सबको देखते हुए नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के तहत निर्धारित लक्ष्यों के हासिल होने को लेकर गम्भीर आशंकाएं पैदा हो गयी हैं।

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