विपक्षी एकता के सामने वो 7 चुनौतियां, जिससे निपटने में INDIA गठबंधन को होगी मुश्किल

विपक्षी दलों ने बेंगलुरु में 26 बीजेपी-विरोधी दलों को एकजुट करके अपने मजबूत मंसूबे का संदेश जरूर दिया है। लेकिन, तथ्य ये है कि इन सबके मन में कुछ न कुछ डर अभी तक निकल नहीं पाया है, जो आने वाले दिनों में गठबंधन के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरने वाला है।

मसलन, सभी विपक्षी दलों के में मन में यह संदेह बना हुआ है कि कहीं इस तरह के गठबंधन की वजह से वह अपना कोर वोट कांग्रेस जैसी बड़ी और पुरानी पार्टी को तो नहीं ट्रांसफर करने जा रहे हैं। आने वाले दिनों में ये पार्टियां बैठेंगी तो सिर्फ सीटों के तालमेल पर ही बात नहीं होगी, अपने कोर वोटरों के हाथ से निकलने की आशंका भी बरकार रहेगी।

opposition idnia nda bjp

जम्मू और कश्मीर
26 विपक्षी दलों में जम्मू-कश्मीर की नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी भी शामिल हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन राज्य में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन की सरकार थी। दोनों पार्टियां एकसाथ चुनाव लड़ीं, लेकिन पांचों सीटें हार गईं। महबूबा मुफ्ती की पीडीपी घाटी की तीनों सीटें श्रीनगर, बारामुला और अनंतनाग जीती। जबकि, जम्मू और उधमपुर सीट बीजेपी के खाते में गईं।

2019 के लोकसभा चुनाव में तीनों पार्टियां कहने के लिए अलग-अलग लड़ीं। लेकिन,पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस ने कांग्रेस के लिए जम्मू और उधमपुर में प्रत्याशी नहीं उतारे। घाटी की तीनों सीटें नेशनल कांफ्रेंस को मिलीं और जम्मू और उधमपुर में भाजपा 50% से भी ज्यादा वोट लेकर जीत गई। श्रीनगर और बारामुला में पीडीपी तीसरे नंबर पर रही थी। कांग्रेस को प्रदेश में एक भी सीट नहीं मिली, लेकिन उसे 26% वोट मिले। यहां मुश्किल ये होगी कि घाटी में अब्दुल्ला परिवार की नेशनल कांफ्रेंस घाटी की तीन सीटों में से कांग्रेस और पीडीपी के लिए कौन सी छोड़ने को तैयार होगी।

पंजाब
2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पंजाब की 13 में से 8 लोकसभा सीट जीती थी। एक सीट आम आदमी पार्टी के खाते में गई थी। पिछले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को बुरी तरह से सत्ता से बेदखल कर दिया। अब, राज्य में वह मुख्य विपक्षी पार्टी है। संगरूर लोकसभा उपचुनाव में अकाली दल (मान) ने आम आदमी पार्टी को हरा दिया।

उधर जालंधर लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस आम आदमी पार्टी से हार गई। प्रदेश कांग्रेस, आम आदमी पार्टी से किसी तरह के समझौते के पक्ष में नहीं है। गांधी परिवार के सामने यहां इंडिया गठबंधन धर्म निभाने के लिए प्रदेश यूनिट की मांग को अनसुना करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा।

दिल्ली
दिल्ली में लोकसभा की सात सीटें हैं। पिछले दोनों लोकसभा चुनावों से यह सातों सीटें बीजेपी के खाते में जा रही हैं। बीजेपी को सभी सीटों पर 50% से ज्यादा वोट मिलते रहे हैं। 2019 में राहुल गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन की कोशिश भी की थी, लेकिन तब प्रदेश नेताओं के विरोध की वजह से बात नहीं बनी थी। इस बार भी प्रदेश नेताओं के विचार नहीं बदले हैं। यह भी विपक्षी गठबंधन के लिए एक चुनौती होने वाली है।

उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े राज्य होने के साथ ही उन राज्यों में शामिल है, जहां 2019 में बीजेपी और अपना दल के एनडीए गठबंधन को 50% से ज्यादा वोट मिले थे। गठबंधन राज्य की 80 में से 64 सीटें जीती थी। सपा, बसपा और रालोद गठबंधन ने मिलकर करीब 40% वोट जुटाए थे। कांग्रेस को 6% वोट मिले थे। चुनावी पंडित दावा कर रहे थे कि विपक्षी दलों का तालमेल भाजपा को डुबा देगा।

बीजेपी को 2014 के मुकाबले 9 सीटों का नुकसान जरूर हुआ था, लेकिन वोट शेयर 7% बढ़ गए थे। जबकि, सपा, बीएसपी, आरएलडी और कांग्रेस सबके वोट शेयर में गिरावट दर्ज हुई थी। इस बार मायावती पहले ही ऐलान कर चुकी हैं कि उनकी बीएसपी किसी गठबंधन के चक्कर में नहीं पड़ेगी। दूसरी तरफ बीजेपी ओपी राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को अपने पाले में जोड़ चुकी है। ऐसे में यूपी में बीजेपी को टक्कर देना इंडिया गठबंधन के लिए पहले भी चुनौती थी और इस बार और ज्यादा रहने वाली है।

पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस से लड़ने के लिए कांग्रेस और लेफ्ट ने गठंबधन कर रखा है। हाल के पंचायत चुनाव में बीजेपी के लिए टीएमसी दुश्मन रही तो उससे कम कांग्रेस और लेफ्ट के लिए भी नहीं रही है। वहां भाजपा आज टीएमसी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बन चुकी है। यह पिछले कई चुनावों से स्पष्ट हो चुका है। जबकि, कांग्रेस और सीपीएम की अगुवाई वाला लेफ्ट गठबंधन अपना अस्तित्व बचाने की कोशिश में जुटा है।

2019 में बीजेपी ने वहां 42 में से 18 सीटें जीती थी। तृणमूल कांग्रेस 2014 की 34 सीटों से घटकर 22 तक पहुंच गई थी। कांग्रेस को 2 सीटों से संतोष करना पड़ा और करीब साढ़े तीन दशक शासन करने वाले लेफ्ट गठबंधन का खाता भी नहीं खुल पाया। ऐसे में टीएमसी के साथ गठबंधन करना कांग्रेस और सीपीएम के लिए कितना आसान होगा, यह बड़ा सवाल है।

केरल
केरल में विपक्षी दलों के सामने एक अलग ही तरह की चुनौती होगी। 2019 में वहां कांग्रेस की अगुवाई वाले पुराने यूपीए गठबंधन ने 20 में से 19 सीटें जीती थी। जबकि सत्ताधारी वामपंथी गठबंधन सिर्फ एक सीट जीत सकी थी। यहां न तो कांग्रेस और न ही लेफ्ट के लिए साथ चुनाव लड़ना आसान होगा, क्योंकि दोनों को डर है कि इससे बीजेपी को दायरा बढ़ाने में मदद मिलेगी।

पिछले विधानसभा चुनावों में लेफ्ट गठबंधन ने यहां लोकसभा चुनावों की पूरी कहानी ही पलट दी थी। ऐसे में सीटों का तालमेल चाहने पर भी आसान नहीं होने वाला है।

ताकतवर बीजेपी
2019 में 13 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ऐसे थे जहां बीजेपी को 50% से अधिक वोट मिले थे। अगर इसमें महाराष्ट्र, यूपी और बिहार को शामिल कर लें तो 50% से अधिक वोट शेयर वाले एडीए राज्यों का आंकड़ा 16 पहुंच जाता है। पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों में जहां पहले बीजेपी को ज्यादा प्रमुखता नहीं दी जाती थी, अब वह न सिर्फ मुख्य विपक्षी पार्टी है, बल्कि क्रमश: 40% और 38% वोट जुटा रही है। महाराष्ट्र और बिहार में समीकरण पिछले चुनावों के मुकाबले बदले जरूर हैं, लेकिन जिस तरह से भाजपा 2014 वाले एनडीए को फिर से आगे बढ़ाने पर फोकस कर रही है, उससे निपटना भी विपक्षी दलों के लिए आसान नहीं रहने जा रहा है।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+