जानिए कैसे समंदर के अंदर नेवी को और ताकतवर बनाने के लिए सरकार खर्च करेगी 60,000 करोड़
नई दिल्ली। सेनाओं के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में तेजी लाने की बहस के बीच ही केंद्र सरकार ने फैसला किया है कि वह इंडियन नेवी के एक अटके प्रोग्राम को शुरू करेगी। भारत सरकार 60,000 करोड़ रुपए की लागत से P-75I पनडुब्बियों के कार्यक्रम का विस्तार करेगी। रक्षा मंत्रालय की ओर से यह अब तक का सबसे बड़ा कार्यक्रम है और इसकी मंजूरी दो जून को हुई कैबिनेट की सुरक्षा समिति की मीटिंग में दी गई है। इस कार्यक्रम की शुरुआत के साथ ही सरकार देश में रक्षा उपकरणों को तैयार करने से जुड़ी एक बड़ी और अहम नीति की ओर बढ़ेगी।

सरकार प्रोजेक्ट के लिए काफी आक्रामक
एक सरकारी अधिकारी की ओर से इस प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी गई और बताया गया है कि रक्षा मंत्रालय इस प्रोजेक्ट को लेकर काफी आक्रामक है। सरकार की योजना कार्यक्रम के तहत लंबे समय से अटके पड़े P-75I कार्यक्रम को मार्च 2018 तक पटरी पर लाना है।

सरकार का सबसे बड़ा कार्यक्रम
यह कार्यक्रम सरकार के महत्वाकांक्षी, 'रणनीतिक साझेदारी' (एसपी) मॉडल के तहत लॉन्च होने वाला पहला सबसे बड़ा कार्यक्रम है। इसका मकसद रक्षा उत्पादन की अग्रणी निजी कंपनियों को एक साथ लाना है। रक्षा मंत्रालय के इस कार्यक्रम के तहत कई मेगा डील सेनाओं के हिस्से आएंगी।

दो कंपनियों पर बड़ी जिम्मेदारी
लार्सन एंड टूब्रो (एलएंडटी) और रिलायंस डिफेंस ये दो कंपनिया ही फिलहाल P-75I कार्यक्रम के लिए योग्य हैं। सरकार इस प्रक्रिया में कुछ विदेशी कंपनियों को भी नियमों के तहत शॉर्टलिस्ट करेगी।

तैयार होंगी छह पनडुब्बियां
प्रोजेक्ट 75 के तहत वर्तमान समय में छह स्कॉर्पिन क्लास की पनडुब्बियों का निर्माण किया जा रह है। इन पनडुब्बियों को फ्रांस की नौसेना रक्षा और ऊर्जा कंपनी डीसीएनएस की ओर से डिजाइन किया गया है। पनडुब्बियों का निर्माण मंझगांव डॉक लिमिटेड में हो रहा है। एसपी मॉडल के तहत चुनिंदा निजी कंपनियों को विदेशी कंपनियों की साझेदरी के साथ भारत में पनडुब्बियों और लड़ाकू विमान बनाने के लिए प्लेटफॉर्म दिया जाएगा।

एफडीआई की सीमा
सरकार की ओर से एसपी मॉडल के तहत करीब 49 प्रतिशत की एफडीआई सीमा निर्धारित की गई है। सभी विदेशी कंपनियां, भारतीय कंपनियों के नियंत्रण में रहेंगी। इस कार्यक्रम की रुपरेखा के तहत भारत की चुनिंदा कंपनियों के लिए ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्यूफैक्चरर्स यानी ओईएम के साथ ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी की जरूरत होगी।












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