'वो पांच मुश्किलें जो राहुल गांधी को जीत से दूर करती हैं'

Rahul Gandhi in Uttar Pradesh
बैंगलोर। कल रामपुर और अलीगढ़ में रैलियां कर कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव 2014 के लिए देश के सबसे बड़े राज्‍य उत्‍तर प्रदेश में जनाधार तलाशना शुरू कर दिया है। अपने भाषण में राहुल ने मुजफ्फरनगर में हुए दंगों का भी जिक्र किया और सपा सरकार की निंदा की, वहीं उन्‍होने कुछ दिन पहले दलितों के प्रति भी हमदर्दी दिखाकर उन्‍हें अपने पाले में लाने की कोशिश की। खास बात है कि राहुल की यह रैलियां आम चुनाव में उनके मुख्‍य प्रतिद्वंदी नरेंद्र मोदी से पहले प्रदेश में आयोजित की गई, जिसमें उन्‍होने केंद्र सरकार द्वारा पारित खाद्य सुरक्षा बिल और भूमि अधिग्रहण बिल की प्रशंसा की। राहुल भले ही इन बिलों के सहारे कांग्रेस के सत्‍ता में वापसी के सपने देख रहे हों लेकिन यह इतना आसान भी नहीं होगा, उन्‍हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

देखें वह कौन सी बातें हैं जो राहुल के लिए मुश्किलें खड़ी करती हैं-

1. मायावती और मुलायम की निंदा

राहुल ने अपनी रैली में मायावती और मुलायम सिंह की निंदा की। जिनकी पार्टियों ने सरकार चलाने में कांग्रेस की मदद की। इनकी निंदा कर राहुल ने यह दिखाने की कोशिश की है कि वह पार्टी और गठबंधन से ऊपर हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्‍या कांग्रेस अकेले ही राहुल के नेतृत्‍व में सरकार बनाने का सपना देख रही है। यह भी लगता है कि वह खुद की, पार्टी की और गठबंधन की स्थिति को लेकर भ्रम फैला रहे हैं।

2. उत्‍तर प्रदेश ही राहुल और कांग्रेस की मदद नहीं करेगा

सरकार बनाने के लिए सिर्फ उत्‍तर प्रदेश ही कांग्रेस की मदद नहीं करेगा। इन दिनों नरेंद्र मोदी देश के अलग अलग हिस्‍सों का दौरा कर रहे हैं। यहां तक कि जहां भाजपा की सरकार नहीं है उन राज्‍यों में भी। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में वह पहले ही रैली कर चुके हैं। जबकि राहुल अभी सिर्फ उत्‍तर प्रदेश और कुछ राज्‍यों तक ही सीमित हैं। जबकि मध्‍य प्रदेश, छत्‍तीसगढ़, तमिलनाडु, बिहार और पश्चिम बंगाल में भी उन्‍हें अपना जनाधार तलाशना होगा। तेलंगाना मुद्दे पर उबल रहे राज्‍य आंध्र प्रदेश में भी अभी तक वह नहीं पहुंचे हैं।

3. प्रभावशाली भाषण न देना

यह भी एक सच है कि राहुल गांधी के भाषण आम जनता और कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्‍साह नहीं पैदा करते है, वहीं दूसरी तरफ मोदी अपने भाषणों और अंदाज से जनता को प्रभावित करने में कामयाब दिख रहे हैं। इसके अलावा कई मौकों पर दिये गये उनके बयानों की भी निंदा हो रही है। वह एक तरफ गरीबी को मानसिक अवस्‍था कहते हैं तो दूसरी तरफ अपने भाषणों में कई बार इसी शब्‍द को दोहराते हैं। अगर मोदी को देखें तो वह अपना भाषण स्रोताओं के अनुसार बदलते रहते हैं, जबकि राहुल हर जगह उन्‍हीं शब्‍दों और लाइनों को दोहराते हैं, जैसे आधी रोटी खाएंगे, कांग्रेस पार्टी को वापस लाएंगे।

4. भ्रष्‍टाचार पर चुप्‍पी

यूपीए के शासन में हुए घोटालों पर और जनता को भ्रष्‍टाचार से मुक्‍त करने पर राहुल गांधी ने अभी कुछ नहीं कहा है। इसके अलावा जब अन्‍ना हजारे का आंदोलन चलाया जा रहा था तब भी वह परिदृश्‍य से गायब हो गये थे। देश की सबसे बड़ी समस्‍या पर राहुल ने कुछ भी नहीं बोला।

5. गठबंधन में दिलचस्‍पी नहीं

राहुल गांधी किन क्षेत्रीय पार्टियों से गठबंधन करने के इच्‍छुक हैं। इस पर उनका मत स्‍पष्‍ट नहीं हैं। वह केंद्र में तो उन पार्टियों से समर्थन ले रहे हैं लेकिन आम जनता के सामने उनकी आलोचना कर रहे है। अगर वह किसी नये गठबंधन की तलाश में हैं तो इस कुछ नहीं कह सके हैं। मोदी की गठबंधन चलाने की क्षमता पर सवाल उठाये जाते है, वैसे राहुल के साथ ऐसी कोई मुश्किल नहीं है।

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