किसान आंदोलन: ट्रैक्टर परेड में हिंसा और लाल क़िले की घटना के बाद किसान नेताओं के सामने 4 बड़ी चुनौतियाँ

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किसान ट्रैक्टर परेड के दौरान दिल्ली में कई जगहों पर हुई हिंसक घटनाओं ने आंदोलनकारियों के लिए कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

अब तक, किसानों की एकता, विभिन्न विचारधाराओं के समर्थन और शांतिपूर्ण आंदोलन को इस किसान आंदोलन की ताक़त समझा गया था. लेकिन 26 जनवरी की घटनाओं, विशेष रूप से लाल क़िले पर निशान साहिब (सिखों का परंपरागत केसरिया झंडा) और किसानों के हरे-पीले झंडे को फहराने से लोगों में आंदोलन के अस्तित्व को लेकर संदेह पैदा हो गया है.

26 जनवरी की ट्रैक्टर परेड के बाद, किसान नेताओं को अब इन चार मुख्य चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.

1. किसान आंदोलनकारियों में एकता

किसान आंदोलनकारियों और संगठनों के बीच अब एकता बनाए रखना किसान नेताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बनने वाली है.

भारतीय किसान यूनियन उगराहां और किसान मज़दूर संघर्ष समिति पहले से ही अपने स्वतंत्र कार्यक्रम दे रही हैं.

लेकिन किसान ट्रैक्टर परेड के मामले में, किसान मज़दूर संघर्ष समिति ने एक तरह से संयुक्त मोर्चा से विद्रोह ही कर दिया.

हालांकि, समिति के राज्य महासचिव सरवन सिंह पंधेर ने कहा कि वे संयुक्त मोर्चे के साथ समन्वय से काम कर रहे हैं.

'लेकिन संयुक्त मोर्चे की ओर से दिल्ली पुलिस के साथ परेड के लिए जो मार्ग तय किया गया था, हम उससे सहमत नहीं थे.' यह निर्णय ही रिंग रोड और लाल क़िले तक उनकी पहुँच का आधार बना.

रिंग रोड पर सरवन सिंह पंधेर की ओर से परेड करने के बाद ही देर शाम को सिंघु बॉर्डर पर संयुक्त मोर्चे के मंच पर भारी भीड़ जमा हो गई और लोग रिंग रोड पर अपना जुलूस निकालने की घोषणा करने लगे.

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इन लोगों ने संयुक्त मोर्चे की परेड की शुरुआत से पहले ही बैरिकेड्स तोड़ दिए और दिल्ली में प्रवेश किया, जिसके बाद सरवन सिंह पंधेर कहते रहे कि लाल क़िले पर जाना उनका प्रोग्राम नहीं था.

इस अलग कार्यक्रम ने अब तक के शांतिपूर्ण आंदोलन को गंभीर नुक़सान पहुँचाया है.

ऐसे में किसान यूनियन और आंदोलनकारी संयुक्त कार्रवाई करने में सक्षम होंगे. इस पर सवाल उठ रहे हैं.

2. युवाओं को अनुशासित रखना

किसान आंदोलन का नेतृत्व करने वाले किसान संगठनों के नेताओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती आंदोलन में शामिल युवाओं को अनुशासित करना होगा.

किसान ट्रैक्टर परेड के बाद बीबीसी पंजाबी से बात करते हुए, किसान नेता मंजीत सिंह राय ने कहा, "हमें जाना तो दिल्ली वाले रूट पर ही था, लेकिन युवाओं ने दूसरा मार्ग ले लिया. इसलिए हमें भी वापस आना पड़ा. आख़िरकार, ये हमारे बच्चे हैं."

मंजीत सिंह के बयान से स्पष्ट है कि कई युवा किसान नेताओं द्वारा दिए गए कार्यक्रम से अलग रास्ता चुन रहे थे.

युवा नेतृत्व के नाम पर, इस आंदोलन में कई ऐसे नेता हैं, जिन्हें किसान संगठन मंच के पास भी नहीं आने दे रहें हैं. वही नेता लाल क़िले पर पहुँचने पर, माइक पकड़े भीड़ को संबोधित करते देखे गए.

आंदोलन के लिए आने वाले दिनों में ऐसे व्यक्तियों की गतिविधियों से युवाओं की रक्षा करना किसान नेताओं के लिए एक कठिन चुनौती होगी.

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3. सरकार पर दबाव बनाए रखना

किसान ट्रैक्टर परेड को 26 नवंबर के बाद की सबसे बड़ा क़दम माना जा रहा था. इसे लेकर सरकार भी काफ़ी दबाव में थी. इस दबाव के परिणामस्वरूप, सरकार ने क़ानून को डेढ़ साल के लिए स्थगित करने की पेशकश भी की.

जब किसानों ने प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, तो सरकार ने बातचीत रोक दी. कुछ का मानना है कि अब आंदोलन लंबे समय तक चल सकता है, क्योंकि 26 जनवरी की कार्रवाई के बाद सरकार पर ज़्यादा दबाव नहीं होगा.

किसान नेता हनान मौला ने 26 जनवरी को किसान ट्रैक्टर परेड के दौरान हुई हिंसा को आपराधिक तत्व और सरकारी साज़िश करार दिया. उन्होंने कहा कि ये किसान आंदोलन को बदनाम करने के लिए किया गया था.

दूसरी ओर, सत्तारूढ़ भाजपा के नेता विपक्ष पर आंदोलन में घुसपैठ करने का आरोप लगा रहे हैं.

हालाँकि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्थिति की समीक्षा के लिए एक आपात बैठक की, लेकिन सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया.

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26 जनवरी किसान ट्रैक्टर परेड के बाद किसान क्या बड़ी कार्रवाई करेंगे, ताकि सरकार पर फिर से वार्ता की मेज पर आने के लिए दबाव बनाया जा सके.

इस सवाल का जवाब बलबीर सिंह राजेवाल ने किसान ट्रैक्टर परेड से पहले ही दे दिया था. उन्होंने 25 जनवरी की शाम को एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि बजट सत्र 28 जनवरी से शुरू होगा. 1 फरवरी को केंद्रीय बजट पेश किया जाएगा, उसी दिन किसान संसद की ओर पैदल मार्च करेंगे.

उन्होंने कहा था कि अगले कार्यक्रमों की घोषणा जल्द की जाएगी.

4. आंदोलन को कमज़ोर होने से रोकना

परिस्थितियों को देखते हुए, आम जनता सवाल कर रही है कि क्या आंदोलन जारी रहेगा.

लोगों को संदेह है कि ट्रैक्टर परेड से पहले मंच पर आने वाले और लाल क़िले तक पहुँचने वाले लोग अब आगे क्या करेंगे , किसान संगठन उन्हें कैसे नियंत्रित करेंगे. यह एक बहुत ही गंभीर सवाल है.

लोगों ने आमतौर पर शांतिपूर्ण आंदोलन को को सबसे बड़ी ताक़त के रूप में देखा. किसानों ने नारा दिया "शांत रहेंगे तो जीतेंगे, हिंसक होंगे तो मोदी जीत जाएगा."

लेकिन इस आंदोलन के हिंसक घटनाओं से जुड़ जाने के कारण लोग अब सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह आंदोलन जारी रहेगा. अब सरकार कोई कार्रवाई करेगी.

इस सवाल पर, किसान नेता मंजीत सिंह राय और सरवन सिंह पंधेर का कहना है कि आंदोलन शांतिपूर्ण रहेगा.

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संयुक्त मोर्चा के नेता शिव कुमार कक्का ने संवाददाताओं से कहा, "लाल क़िले पर जो भी हुआ, उसके लिए मैं पूरे देश से माफ़ी माँगता हूँ. जो लोग ट्रैक्टर परेड में निर्धारित मार्ग से भटके हैं और जिन संगठनों ने यह काम किया है, वे संयुक्त मोर्चे का हिस्सा नहीं हैं. हमने एक महीने पहले ट्रैक्टर परेड की घोषणा की थी."

"पुलिस को रुट पर पहले से चर्चा करनी चाहिए थी. उन्होंने लापरवाही बरती है. पुलिस को उन संगठनों से बात करनी चाहिए थी, जो संयुक्त मोर्चा के अलावा कार्रवाई कर रहे हैं.

उनका कहना है कि आंदोलन जारी रहेगा और जब तक मांगें पूरी नहीं होतीं, किसान पीछे नहीं हटेंगे.

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