21 साल पहले Rajdhani Express Derail होने की कहानी, तत्कालीन रेल मंत्री और CM राबड़ी के बीच हुई तकरार
दर्जनों रेल हादसों के बाद आज इंडिया बुलेट ट्रेन की तैयारियों में जुटा है। तेज गति से कई शहरों को जोड़ने वाली वंदे भारत एक्सप्रेस भी संचालन हो रहा है। तमाम सुनहरे पन्नों के बीच एक स्याह पन्ना 2002 के हादसे का है।

Rajdhani Express Derail होना भारतीय रेलवे के इतिहास में सबसे काले पन्नों में एक है। इसका कारण केवल हादसा नहीं, बिहार के रफीगंज में हुई ट्रेन दुर्घटना के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री और केंद्रीय रेल मंत्री के बीच का संवाद भी है।
दरअसल, करीब 21 साल पहले दक्षिण बिहार के औरंगाबाद जिले में रफीगंज में राजधानी एक्सप्रेस हादसे का शिकार हुई थी। धावी नदी पर बने पुल से कई बोगियां नीचे गिर गई थीं। इस हादसे में 130 लोगों की मौत हुई थी।
हादसे से जुड़ी सबसे अफसोस की बात ये है कि दुर्घटना के तुरंत बाद तत्कालीन बिहार सरकार और रेलवे के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया था। इससे 2002 में रफीगंज दुर्घटना के बाद भ्रम की स्थिति भी बन गई थी।
लगभग 21 साल पहले वर्ष 9 सितंबर को हुई दुर्घटना राजधानी पटना से लगभग 150 किमी दूर रफीगंज में धावी नदी पर हुई। एक पुल के ऊपर से बेपटरी हुई राजधानी एक्सप्रेस भारत की सबसे खौफनाक रेलवे आपदाओं में एक है।
तत्कालीन रेल मंत्री नीतीश कुमार ने इस दुर्घटना के लिए माओवादियों की तोड़-फोड़ को जिम्मेदार ठहराया था। हालांकि, तत्कालीन बिहार सरकार ने अफसोसजनक बयान दिए थे। राजद की राबड़ी देवी ने रेलवे की विफलता को दुर्घटना को जिम्मेदार ठहराया था।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रेलवे अधिकारियों ने 21 साल पहले कहा था कि फिशप्लेट - रेल के सिरों को जोड़ने वाली स्टील की छड़ें - नदी पर बने पुल के हावड़ा जाने की तरफ वाले छोर से लगभग 50 मीटर दूर हटा दी गई थीं।
राबड़ी के पति और नीतीश के प्रतिद्वंद्वी राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने रफीगंज में दुर्घटनास्थल का दौरा करने के बाद कहा था कि भारतीय रेलवे "भगवान की दया" पर चल रहा है।
इस हादसे की एक शखास बात ये भी है कि रफीगंज दुर्घटना के लगभग एक महीने बाद, माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (बिहार में संचालित नक्सली संगठन) ने रेलवे ट्रैक में तोड़फोड़ की जिम्मेदारी ली थी। खेद व्यक्त करते हुए माओवादियों ने कहा, दोबारा ट्रेनों को निशाना नहीं बनाएंगे।
नक्सली संगठनों के सीपीआई (माओवादी) में विलय के बाद, वादा भुला दिया गया। एक बार फिर भारतीय रेलवे को मई 2010 में निशाना बनाया गया। बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले में हावड़ा-मुंबई ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस लापता (ट्रैक गायब) पटरियों से गुजरने के बाद पटरी से उतर गई थी।
कोरोमंडल हादसे की तरह ही इसमें भी यात्री ट्रेन मालगाड़ी से टकरा गई थी। हादसे में कम से कम 140 यात्रियों की जान जाने के बाद नक्सलियों ने इसकी जिम्मेदारी बाद में ली।
डिब्रूगढ़ राजधानी धीमी गति से चल रही थी, ऐसे में नुकसान कम हुआ। हालांकि, 2002 के रफीगंज हादसे में राजधानी एक्सप्रेस ट्रेन की बोगियां कई फीट नीचे नदी में जा गिरी थी। रिपोर्ट्स के अनुसार, कई यात्रियों की मौत दम घुटने से हुई थी।
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