श्रद्धांजलि: 'जॉर्ज द जायन्ट किलर' को इसलिए याद रखेगा हिन्दुस्तान
नई दिल्ली। 1930 में जन्मे जॉर्ज फर्नांडीज महज 16 साल की उम्र में पादरी बनने के लिए मंगलोर से बैंगलोर पहुंचे थे, मगर नियति उन्हें बम्बई खींच लाई। चर्च के पादरी तो नहीं बन सके जॉर्ज, मगर मजदूरों के बीच रहते हुए ट्रेड यूनियन आंदोलन के 'फादर' जरूर बन गये। महज 19 साल की उम्र में जॉर्ज फर्नांडीज ने खुद को ट्रेड यूनियन आंदोलन में झोंक दिया। सड़क परिवहन और रेस्टोरेंट में काम करने वाले साथियों को उन्होंने इकट्ठा किया जो मालिकों के शोषण का सामना कर रहे थे। इस दौरान वे समुद्र तट से लेकर सड़कों पर खुले आसमान के नीचे रातें काटीं। मगर, यही संघर्ष उनके भावी राजनीतिक जीवन की पाठशाला बन गयी।

जॉर्ज द जायन्ट किलर
राम मनोहर लोहिया के सम्पर्क में आने के बाद जॉर्ज के जीवन की दशा और दिशा बदल गयी। 50 का दशक आते-आते जॉर्ज मुम्बई में ट्रेड यूनियन आंदोलन का बडा चेहरा बन चुके थे। 1961-68 तक बॉम्बे म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन की सियासत भी जॉर्ज ने की। ये वो दौर था जब कंपनियां गुंडे पाला करती थीं। जॉर्ज ने इन गुंडों के ख़िलाफ़ सड़क पर संघर्ष किया। शिवसेना नेता बाल ठाकरे के साथ जॉर्ज के रिश्ते भी इसी दौरान मजबूत हुए। 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी की ओर से जॉर्ज फर्नांडीज़ ने लोकसभा का चुनाव लड़ा। दिग्गज कांग्रेसी नेता एस के पाटिल को हराने के बाद जॉर्ज फर्नांडीज़ को नया नाम मिला- जॉर्ज द ज़ायन्ट किलर। 60 के दशक में बॉम्बे में संगठित मजदूरों के भी सर्वमान्य नेता बन चुके थे जॉर्ज फर्नांडीज़।

जॉर्ज के आंदोलन से घबराकर इंदिरा ने लगायी थी इमरजेंसी
संसद तक का सफर तय कर लेने के बाद जॉर्ज ने राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हो गये। 1969 में वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव चुन लिए गये। 1973 में वे पार्टी के प्रमुख हो गये। 1974 में जॉर्ज ने ट्रेड यूनियन आंदोलन को राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बना डाला। ऑल इंडिया रेलवे मेन्स फेडरेशन के अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने यादगार राष्ट्रीय आंदोलन चलाया। 8 मई 1974 से 27 मई 1974 तक यानी 19 दिन चले इस आंदोलन ने इंदिरा सरकार को भयभीत कर दिया। कहते हैं कि इसी आंदोलन के बाद ही 25 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी।

जॉर्ज ने इंदिरा गांधी का मंच उड़ाने की रची थी साजिश !
आपातकाल के दौरान जॉर्ज फर्नांडीज़ ने भूमिगत रहते हुए सरकार विरोधी गतिविधियों को अंजाम दिया। 10 जून 1976 को कलकत्ता से जॉर्ज फर्नांडीज़ गिरफ्तार किए गये। उन पर बरोदा डायनामाइट केस का इल्जाम लगा। वे तिहाड़ जेल में बंद कर दिए गये। जर्मनी, नॉर्वे और ऑस्ट्रिया ने जॉर्ज को वकील मुहैया कराने और उनकी जान की हिफाजत का आग्रह किया। हालांकि जॉर्ज के ख़िलाफ़ इस मामले में कभी कोई आरोपपत्र अदालत में दायर नहीं हुआ। बरोदा डायनामाइट केस में कहा जाता है कि जॉर्ज ने दो पत्रकारों और एक उद्योगपति की मदद से इंदिरा गांधी के सार्वजनिक मंच को उड़ान की साजिश रची।

जेल में रहते हुए जॉर्ज ने रिकॉर्ड मतों से जीता था चुनाव
जॉर्ज फर्नांडीज़ ने आपातकाल हटने के बाद बिहार के मुजफ्फरपुर से जेल में रहते हुए ही चुनाव लड़ा और तीन लाख से ज्यादा मतों के अंतर से जीत दर्ज की। देश की पहली गैर कांग्रेस सरकार में जॉर्ज फर्नांडीज़ केंद्रीय कपड़ा मंत्री बने। मंत्री रहते हुए बहुराष्ट्रीय कंपनियों का जॉर्ज ने विरोध किया। कोकाकोला और आईबीएम कंपनियों पर भारतीय कानून मानने का जॉर्ज ने दबाव बनाया और ये दोनों कंपनियां भारत छोड़ने को मजबूर हो गयीं। 1978 में ही केंद्रीय मंत्री रहते हुए जॉर्ज ने दूरदर्शन केंद्र स्थापित किया। इसके अलावा कांटी थर्मल पावर स्टेशन और लिज्जत पापड़ फैक्ट्री की स्थापना का श्रेय भी उन्हें प्राप्त है।

दोहरी सदस्यता पर जॉर्ज के बवाल से गिरी थी जनता सरकार
जनता पार्टी में जनसंघ का विलय हो चुका था लेकिन जनसंघ से जुड़े नेताओँ का आरएसएस से संबंध बना हुआ था। जॉर्ज फर्नांडीज़ ने इसका विरोध किया। उन्होंने दोहरी सदस्यता का विरोध किया। इसी मुद्दे पर जनता पार्टी में अंतर्विरोध इतना गहरा हो गया कि सरकार गिर गयी। जॉर्ज फर्नांडीज़ ने एक बार फिर विपक्ष में आ गये। 1980 में जॉर्ज दोबारा मुजफ्फरपुर से चुनाव जीते, लेकिन 1984 में बंगलौर उत्तर से चुनाव हार गये। 1989 में एक बार फिर जॉर्ज फर्नांडीज़ मुजफ्फरपुर लौटे और यहीं सांसद बनकर वीपी सिंह सरकार में रेलवे मंत्री हुए। रेल मंत्री के तौर पर कोंकण रेलवे प्रॉजेक्ट की उन्होंने नींव डाली।

पोखरण और करगिल का जॉर्ज ने किया था नेतृत्व
जॉर्ज फर्नांडीज ने 1994 में जनता दल तोड़कर समता पार्टी बनायी और बीजेपी के साथ 13 दिन की वाजपेयी सरकार में शामिल हुए। 1998 में भी 13 महीने की सरकार में जॉर्ज फर्नांडीज़ शरीक रहे। इस दौरान पोखरण परीक्षण का नेतृत्व भी जॉर्ज फर्नांडीज ने रक्षा मंत्री के तौर पर किया। इस सरकार के गिरने के बाद जॉर्ज फर्नांडीज ने अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मिलकर एनडीए बनाने में भूमिका निभाई। यह प्रयोग सफल रहा। देश को पहली ऐसी गैर कांग्रेस सरकार मिली जो 5 साल (1999-2004) तक चल सकी। यह 24 दलों की गठबंधन सरकार रही। एनडीए सरकार में रक्षा मंत्री के तौर पर जॉर्ज फर्नांडीज ने ऑपरेशन विजय का नेतृत्व करते हुए देश को करगिल युद्ध में जीत दिलायी।

आखिरी वक्त में अपनों ने ही छोड़ दिया साथ
इस बीच जॉर्ज फर्नांडीज ने 2003 में समता पार्टी का जनता दल यू में विलय कर लिया। मगर, ये फैसला बहुत सही साबित नहीं हुआ। 2004 में एनडीए के सत्ता से बाहर होने के बाद जॉर्ज फर्नांडीज को अपनी ही पार्टी में नीतीश कुमार ने दरकिनार कर दिया। यहां तक कि मुजफ्फरपुर से टिकट देने से भी उन्होंने मना कर दिया। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा लेकिन हार का सामना करना पड़ा। 2009 में जॉर्ज फर्नांडीज ने राज्यसभा के लिए भी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर ही पर्चा भरा, लेकिन जेडीयू ने उम्मीदवार नहीं दिया और उन्हें सर्वसम्मति से चुनकर जाने में मदद की। संसदीय लोकतंत्र में बतौर सदस्य यह उनका आखिरी कार्यकाल रहा। फिर जॉर्ज ऐसे अस्वस्थ हुए कि कभी उठ नहीं पाए। पारिवारिक और राजनीतिक मित्र एक-एक कर साथ छोड़ते चले गये। लम्बे गुमनाम अस्वास्थ्यकर जीवन जीते हुए आखिरकार 29 जनवरी 2019 को उन्होंने आखिरी सांस ली।
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