भारत देश की पहली देसी जीएम फसल के लिए तैयार

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भारत का कहना है कि वह जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) फसलों जैसी आधुनिक कृषि तकनीकों का इस्तेमाल करना चाहता है ताकि देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो सके और आयात पर निर्भरता घटे. भारत में खाद्य तेलों जैसी चीजों का उत्पादन बढ़ाने की कोशिश हो रही है. हालांकि जीएम फसलों को लेकर देश में खासा विवाद है.

पर्यावरण मंत्रालय ने इसी साल अक्टूबर में देश में ही तैयार जीएम सरसों को इस्तेमाल की इजाजत दी थी. अब तक कपास ही एक ऐसी फसल है जिसकी जीएम फसल की भारत में खेती की इजाजत है.

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भारत में खाद्य तेलों की भारी मांग है और इसका 60 प्रतिशत हिस्सा आयात से पूरा किया जाता है. इसके लिए भारत इंडोनेशिया और मलेशिया के अलावा काला सागर के आसपास के देशों पर निर्भर रहता है.

फसल बढ़ाने की खातिर

पर्यावरण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने संसद को बताया कि देश की कृषि चुनौतियों से निपटने के लिए इस तरह की तकनीकों का प्रयोग आवश्यक है. उन्होंने कहा, "जीई जैसी जेनेटिक तकनीकों का इस्तेमाल करके पौधों को रोपने की योजनाओं को मजबूत करना जरूरी है ताकि भारतीय कृषि की उभरती चुनौतियों का सामना किया जा सके और विदेशों पर निर्भरता घटाते हुए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके." जीई (जेनेटिकली इंजीनियर्ड) फसलें भी जीएम फसलों का ही दूसरा नाम है.

इस साल 31 मार्च को खत्म हुए पिछले वित्त वर्ष में भारत ने खाद्य तेलों के आयात पर 19 अरब डॉलर खर्च किए थे. यूक्रेन पर रूस के आक्रमण ने आयात को प्रभावित किया और दाम बहुत बढ़ गए, जिसका सीधा असर भारत पर हुआ.

भारत सरकार भले ही जीएम फसलों को लेकर उत्साहित हो, बहुत से कार्यकर्ता हैं जो इसे नुकसानदेह मानते हैं. उनका कहना है कि जीएम मस्टर्ड की फसल के लिए कीटनाशकों का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करना होगा जिससे मधुमक्खियों के लिए खतरा पैदा हो जाएगा. देश का सर्वोच्च न्यायालय इस बारे में एक याचिका पर सुनवाई भी कर रहा है जिसमें धारा मस्टर्ड हाइइब्रिड डीएमएच-11 बीज को व्यवयासिक इस्तेमाल के लिए जारी करने के सवाल पर फैसला होना है.

क्यों चितित हैं कुछ लोग?

विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञता वाले देश के 111 डॉक्टरों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम एक पत्र लिखा है जिसमें डीएमएच-11 को इजाजत ना दिये जाने का आग्रह किया गया है. इन डॉक्टरों ने अपने पत्र में चेतावनी दी है कि इस फसल से सेहत को बड़े नुकसान हो सकते हैं.

पत्र में लिखा गया है, "हम ग्लूफोसिनेट अमोनियम जैसे कीटनाशक के प्रति सहनशील हो चुके जेनेटिकली मॉडिफाइज डीएमएच-11 और उसके दो पूर्ववर्तियों को जारी किये जाने को लेकर बेहद चिंतित हैं. जीएम मस्टर्ड के मामले में यह दावा किया जा रहा है कि ग्लूफोसिनेट का इस्तेमाल केवल बीजों के उत्पादन के दौरान किया जाएगा और किसानों को उसके स्प्रे से रोका जाएगा. लेकिन एचटी कपास के मामले में ग्लाइफॉस्फेट का प्रयोग अवैध रूप से होता रहा और उसे सरकार एक दशक में भी नियंत्रित नहीं कर पाई है."

खाने की बर्बादी बचाने के लिए एक डॉलर की मशीन

डीएमच-11 को जेनेटिसिस्ट दीपक पेंटल ने तैयार किया है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने उन्हीं से दो किलो बीज खरीदे हैं.

चौबे का कहना है कि इजाजत मिलने के बाद वैज्ञानिकों को पर्यावरण के लिहाज से मधुमक्खियों और दूसरे जीवों पर जीएम मस्टर्ड के प्रभावों का अध्ययन करने में आसानी होगी.

2010 में ऐसी ही बहस बैंगन के जीएम बीज को लेकर हुई थी. तब पर्यावरण और कृषि अधिकार कार्यकर्ताओं के विरोध के चलते उस बीज को इजाजत नहीं दी गई थी.

वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत में तेजी से बढ़ती आबादी और खेती के लिए घटती जमीन के कारण कृषि के ज्यादा कुशल तरीकों का विकास जरूरी है ताकि खाद्य पदार्थों की मांग पूरी की जा सके. भारत अगले साल चीन को पछाड़कर दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन सकता है.

रिपोर्टः विवेक कुमार (रॉयटर्स)

Source: DW

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