छह लाख साल और पीछे गया इंसान के खाना बनाने का इतिहास

इंसान ने खाना पका कर खाना कब शुरू किया इसके सटीक समय को लेकर पुरातत्वशास्त्रियों के बीच हमेशा से विवाद रहा है. प्राचीन काल के चूल्हे या भट्टियां खाने पकाने के लिए थीं या फिर सिर्फ गर्मी देने के लिए यह साबित करना मुश्किल रहा इसलिये यह विवाद पक्के तौर पर सुलझाया नहीं जा सका.
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पाक कला का जन्म मानव इतिहास का एक प्रमुख मोड़ रहा है. इसकी वजह से खाने को चबाना और पचाना बहुत आसान हो गया. माना जाता है कि इसने दुनिया भर में मानव जाति के विस्तार में बहुत बड़ा योगदान दिया.
6 लाख साल पीछे गया इतिहास
अब तक निएंडरथल और होमो सेपिएंस के खाना पकाने के जो सबूत मिले थे वह करीब 170,000 साल पुराने थे इस बारे में नेचर इकोलॉजी और इवॉल्यूशन जर्नल में रिपोर्ट छपी थी. इस तारीख को 6 लाख साल और पहले ले जाने का सबूत तेल अवीव यूनिवर्सिटी के स्टाइनहार्ट म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के पुरातत्वशास्त्री इरित जोहर ने ढूंढ निकाला है.

इरित ने 16 साल की मेहनत के बाद यह खोज की है. इस समय में उन्होंने उत्तरी इस्राएल के गेशर बेनोत याकोव में मिले हजारों मछलियों के जीवाश्मों की सूची तैयार की है. जॉर्डन नदी के किनारे के इस इलाके में कभी एक झील हुआ करती थी. यहां मिले प्राचीन मछलियों के जीवाश्मों ने रिसर्चरों की टीम को इस बात की पड़ताल करने में मदद दी है कि सबसे पहले कब खाना पकाने की शुरूआत हुई.
खाना पकाने के सबूत
जोहर ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया, "यह किसी पहेली सुलझाने जैसा था, जैसे जैसे ज्यादा जानकारी सामने आती गई हम इंसान की उत्पत्ति के बारे में कहानी बनाते गये."पहला सुराग ऐसे इलाके में मिला जहां "मछलियों के कोई कांटे नहीं थे" लेकिन उनके दांतों की भरमार थी. इससे इन्हें पकाने का संकेत मिला क्योंकि मछलियों की हड्डियां यानी उनके कांटे 500 डिग्री सेल्सियस की आंच पर पकाई जाये तो नरम हो कर टूट जाती हैं लेकिन उनके दांतों पर कोई असर नहीं होता.
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इसी इलाके में जोहर के एक साथी को एक जला हुआ चकमक पत्थर भी मिला और साथ ही कुछ ऐसे सबूत जिनसे पता चलता है कि इस जगह का इस्तेमाल चूल्हे या भट्ठी के रूप में हुआ था. इसके साथ ही ज्यादातर जो दांत मिले है वो कार्प मछली की दो बड़ी प्रजातियों के हैं. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्हें उनके मांसल शरीर की वजह से खाने के लिए चुना गया होगा. कुछ कार्प मछलियां दो मीटर तक लंबी थीं.

दांतों से मिले सबूत
जौहर ने बताया कि निर्णायक सबूत दांतों के इनेमल के अध्ययन से मिला. रिसर्चरों ने एक खास तकनीक का इस्तेमिल किया जिसमें जिसे एक्स-रे पाउडर डिफ्रैक्शन कहते हैं. लंदन की नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम में इस तकनीक के इस्तेमाल से रिसर्चरों को पता चला कि इनेमल को बनाने वाले क्रिस्टल की रचना गर्मी से कैसे बदल जाती है.
मछलियों के दूसरे जीवाश्मों से जब नतीजों की तुलना की गई तो पता चला कि झील के इलाके में मिली मछलियों के दातों ने 200-500 डिग्री सेल्सियस का तापमान झेला था. यही वो तापमान है जो मछली पकाने के लिए इस्तेमाल होता है.
अब हमारे पूर्वजों ने मछलियों को पकाया था, भुना, सेंका या फिर हल्का सा तला था यह अब भी नहीं बता है. हालांकि रिसर्च से यह जरूर पता चला है कि मिट्टी के बने चूल्हे जैसी चीज का इस्तेमाल हुआ था.
आग की खोज
होमो इरेक्टस ने आग की खोज करीब 17 लाख साल पहले की थी. जौहर का कहना है, "अगर आप गर्मी के लिए आग को नियंत्रित नहीं कर तो इसका मतलब यह नहीं है कि भोजन पकाने के लिए भी इसे नियंत्रित नहीं किया जा सकता- उन लोगों ने आग के संपर्क में आई मछली खाई होगी."
फ्रांस की नेशनल म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के पुरातत्वप्राणीविज्ञानी अना मरास कहती हैं कि हो सकता है कि खाने के बाद मछलियों के कांटें और हड्डियां उन्होंने आग में फेंक दी होंगी. मरास इस रिसर्च में शामिल नहीं हैं मगर उनका कहना है, "आग से संपर्क में पूरा सवाल यही है कि क्या यह बचे खुचे से मुक्ति पाने के लिए हुआ या फिर उसे पकाने के लिए." विज्ञान कभी ना कभी तो इसका पता भी लगा ही लेगा.
एनआर/आरपी (एएफपी)
Source: DW
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