अफगानों को निकालकर पाकिस्तान मुसीबत मोल ले रहा है?

काबुल के शासक पाकिस्तान सरकार को गंभीर परिणामों की चेतावनी दे रहे हैं

पाकिस्तान सरकार अपने यहां दशकों से रह रहे लाखों अफगान प्रवासियों को वापस उनके देश भेजने के लिए व्यापक अभियान चला रही है. उसका कहना है कि इस अभियान के तहत उन लोगों को निकाला जा रहा है जो पाकिस्तान में अवैध रूप से रह रहे थे.

इस महीने में अब तक कुल दो लाख लोगों को अफगानिस्तान भेजा जा चुका है. पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना है कि उनके देश में लगभग 40 लाख अफगान रह रहे हैं और इनमें से 17 लाख शरणार्थी ऐसे हैं जिनके पास कोई वैध दस्तावेज नहीं हैं.

पाकिस्तान सरकार ने चेतावनी दी थी कि अगर 1 नवंबर, 2023 की समयसीमा के बाद कोई व्यक्ति गैर कानूनी तौर पर देश में रहता पाया गया तो उसे गिरफ्तार कर उसकी संपत्ति जब्त कर ली जाएगी.

अफगान तालिबान नाराज

पाकिस्तान के इस कदम से अफगान तालिबान नाराज हैं. अफगान शरणार्थियों के शोषण और उत्पीड़न की खबरें भी सुर्खियां बटोर रही हैं. अफगान तालिबान ने पाकिस्तान सरकार के कदम को क्रूरता बताते हुए उसे इसे रोकने को कहा है.

तालिबान द्वारा नियुक्त सरकार के प्रमुख मोहम्मद हसन अखुंद ने एक बयान में कहा, "पाकिस्तान के शासक, मौजूद अंतरिम सरकार और सैन्य जनरलों को इस्लामी सिद्धातों पर अमल करना चाहिए और भविष्य को प्राथमिकता देनी चाहिए और अफगान शरणार्थियों के साथ बदसलूकी और उनकी संपत्ति जब्त करने को रोक देना चाहिए."

अगस्त 2021 से अफगानिस्तान की बागडोर तालिबान के हाथ में है. पाकिस्तान समेत दुनिया के किसी देश ने उनकी सरकार को मान्यता नहीं दी है. लेकिन पाकिस्तान और अफगानिस्तान के जटिल संबंध कूटनीति से कहीं आगे तक जाते हैं.

अफगानिस्तान में 2001 के अमेरिकी हमले के बाद पाकिस्तान में कुछ चरमपंथियों ने तहरीके तालिबान पाकिस्तान का गठन किया था जो अफगान तालिबान की एक शाखा थी. उन्होंने घोषणा की थी कि चूंकि पाकिस्तान की सरकार अमेरिका का साथ दे रही है, पाकिस्तान की सेना "धर्म से भटकने वाला बल" बन गई है तो उसके खिलाफ लड़ाई जायज है.

तब से पाकिस्तान में तालिबान ने सैकड़ों हमले किए. 2014 में पेशावर में एक सैन्य स्कूल पर हमले के बाद पाकिस्तानी अधिकारियों ने तालिबान के खिलाफ व्यापक अभियान छेड़ा. तब बहुत से चरमपंथियों ने भागकर अफगानिस्तान में शरण ली और वहां से पाकिस्तान को निशाना बनाते रहे, हालांकि उनके हमलों की तीव्रता घट गई.

पलटवार का डर

काबुल में तालिबान की सत्ता लौटने के बाद, ऐसे हमले फिर से बढ़ गए हैं. इस महीने पाकिस्तान के कार्यवाहक प्रधानमंत्री अनवार उल हक काकड़ ने कहा कि तालिबान की वापसी के बाद से पाकिस्तान में आतंकवादी घटनाएं 60 फीसदी बढ़ गई हैं.

अफगानिस्तान गंभीर वित्तीय संकट से गुजर रहा है, जहां लाखों लोग पेट भरने के लिए मानवीय मदद पर निर्भर हैं, वरना भूखे मर जाएंगे. ऐसे में, पेशावर में रहने वाले पाकिस्तानी विश्लेषक डॉ फैजुल्लाह जान मानते हैं कि इतने बड़े पैमाने पर अफगान प्रवासियों की वापसी से काबुल की सरकार पर बहुत बोझ बढ़ेगा. इससे अफगान लोगों के बीच पाकिस्तानी विरोधी भावनाएं भी बढ़ेगी. जान के मुताबिक, ऐसे में तालिबान की सरकार पाकिस्तान के खिलाफ कड़ा रुख अपना लिया है.

पेशावर यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाली डॉ नौरीन नसीर कहती को इस बात का डर है कि अब अफगान तालिबान उन पाकिस्तानी चरमपंथियों को खुला समर्थन देने लग जाएंगे जो पहले से ही पाकिस्तान को निशाना बना रहे हैं. वह कहती हैं कि अफगान तालिबान पर आरोप लगते रहे हैं कि वे पाकिस्तान तालिबान का गुचपुच समर्थन करते हैं, लेकिन लाखों अफगान लोगों को निकालने के पाकिस्तान के फैसले के बाद वे खुलकर पाकिस्तान तालिबान के समर्थन में सामने आ जाएंगे.

पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर अफगान शरणार्थियों का रैला है

भारत फायदा उठा सकता है

इस्लामाबाद स्थित सैन्य विशेषज्ञ एहसानुल्लाह टीपू महसूद के अनुसार अफगानिस्तान की तालिबान सरकार में रक्षा मंत्री मुल्ला याकूब पहले ही पाकिस्तान को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दे चुके हैं. महसूद ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, "पाकिस्तान ने मांग की थी कि काबुल पाकिस्तानी तालिबान को हमलों के लिए अफगानिस्तान की जमीन इस्तेमाल ना करने दे लेकिन तालिबान हमलों को रुकवाने में नाकाम रहे."

महसूद कहते हैं कि अफगान शरणार्थियों को निकालने के पाकिस्तान के कदम का मकसद अफगान तालिबान पर दबाव बनाना भी हो सकता है. लेकिन उन्हें यह भी आशंका है कि अफगान तालिबान के फौजी पाकिस्तान तहरीके तालिबान में शामिल होकर पाकिस्तान पर हमले बढ़ा सकते हैं, जिससे पाकिस्तान के सामने सुरक्षा चुनौतियां पैदा होंगी."

इस बात की भी आशंकाए जताई जा रही हैं कि इन हालात की वजह से पाकिस्तान के पहले से ही अशांत बलूचिस्तान प्रांत में भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं. वहां कई चरमपंथी गुट सक्रिय हैं. कुछ अफगान राष्ट्रवादी भी इसके कुछ हिस्से पर अपना दावा जताते हैं.

पाकिस्तान के एक रिटायर्ड जनरल गुलाम मुस्तफा कहते हैं, "कुछ धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रवादी अफगान पहले से ही पाकिस्तान को पसंद नहीं करते हैं." और अब अफगान शरणार्थियों को निकालने के कदम से तालिबान भी नाराज हो रहे हैं. उनका कहना है कि पाकिस्तान का प्रतिद्वंद्वी भारत इस स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश कर सकता है.

Source: DW

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