हिमाचल: पुत्रमोह में फंसे वीरभद्र सिंह, खुद की सीट छोड़ने को तैयार
शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में शिमला ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र खास महत्व रखता है। इस समय शिमला ग्रामीण से प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह विधायक हैं लेकिन इस बार वीरभद्र सिंह यहां से खुद चुनाव लडने की जगह अपने बेटे विक्रमादित्य सिंह को चुनाव लड़ाने की तैयारियों में जुटे हैं।

प्रदेश में इस साल के अंत तक चुनाव होने हैं। लेकिन शिमला ग्रामीण में तो पहले ही सियासी महौल गरमाया है। यहां यही मुद्दा बहस का है कि इस बार यहां से चुनाव कौन लड़ेगा। खबरों के मुताबिक सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के पुत्र एवं युवा कांग्रेस अध्यक्ष विक्रमादित्य सिंह इस बार शिमला ग्रामीण से चुनाव लडने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि अब तक कांग्रेस पार्टी और मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने उनके यहां से चुनाव लडने की औपचारिक घोषणा नहीं की है। इतना जरूर है कि कई बार विधानसभा क्षेत्र कर्मचारी एवं नेताओं की इस मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री के आवास पर बैठकें हो चुकी हैं। स्वयं विक्रमादित्य सिंह भी जनता का समर्थन प्राप्त करने के लिए उनके बीच लगातार जा रहे हैं।
ऐसे में यदि विक्रमादित्य सिंह शिमला ग्रामीण से चुनाव मैदान में उतरते हैं तो मुख्यमंत्री को किसी दूसरे विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लडना होगा। दरअसल डिलिमिटेशन के दौरान रोहड़ू विधानसभा क्षेत्र के आरक्षित होने के कारण मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने वर्ष 2012 में शिमला ग्रामीण से चुनाव लड़ा और बड़ी आसानी से जीत भी दर्ज की। कांग्रेस सरकार बनते ही विधानसभा क्षेत्र के लोगों की समस्याओं के निवारण के लिए प्रदेश सचिवालय में अलग से व्यवस्था की गई।
बिना मुख्यमंत्री के चेहरे के उतरेगी कांग्रेस
चुनाव नजदीक आते ही आपसी गुटबाजी में उलझी कांग्रेस को एकजुट करने के मकसद से पार्टी आलाकमान ने बिना मुख्यमंत्री के चेहरे के उतरने का निर्णय कर लिया है। हिमाचल में कांग्रेस प्रभारी सुशील शिंदे ने कहा कि आने वाले चुनावों में पार्टी किसी को भी चुनाव से पहले मुख्यमंत्री के तौर पर आगे नहीं करेगी और चुनाव सामूहिक नेतृत्व में ही लड़े जाएंगे। लिहाजा यह विवाद अभी ही खत्म हो जाना चाहिये कि चुनावों में पार्टी का नेता कौन होगा। उन्होंने कहा कि सबको साथ लेकर आगे बढ़ेगी। गुटबाजी के लिये कोई स्थान नहीं होगा। शिन्दे के ऐलान से सीएम वीरभद्र सिंह को झटका लगा है। वह पिछले काफी समय से पार्टी आलाकामन पर उन्हें खुला हाथ देने का दवाब बना रहे थे। वे चाह रहे थे कि पंजाब चुनावों की तरह उन्हें भी पार्टी पहले ही सीएम प्रत्याशी घोषित करे।












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