शिमला: कांग्रेस सरकार की गुटबाजी, नेता एक-दूसरे पर उगल रहे हैं जहर
उन्होंने कहा कि जिनके घर शीशे के होते हैं वो दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकते। इससे पहले धर्मशाला के कार्यक्रम में सीएम वीरभद्र सिंह ने पार्टी को पीठ में छुरा घोंपने वालों से खतरा बताया था।
शिमला। चुनावी साल में प्रदेश की सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार की गुटबाजी अब अपना पूरा रंग दिखाने लगी है। पार्टी मामलों के प्रभारी सुशील कुमार शिंदे के गुटबाजी को खत्म करने के प्रयासों को इसके चलते धक्का ही लगा है। एक ओर हर मंच पर शिंदे एकता का पाठ पढ़ा रहे हैं तो पार्टी नेता अब सरेआम एक दूसरे के खिलाफ जहर उगलने लगे हैं।

पार्टी अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू और सीएम वीरभद्र सिंह के बीच चल रही खींचतान के बीच अब परिवहन मंत्री जीएस बाली भी मैदान में आ गए हैं। बाली के खिलाफ धर्मशाला में सीएम ने जहर उगला तो बाली भी पीछे नहीं रहे। बाली ने शिंदे की मौजूदगी में ही नगरोटा बगवां में रैली के दौरान वीरभद्र सिंह को नसीहत दे डाली कि राजा को रंक बनते देर नहीं लगती। उनका साफ इशारा वीरभद्र सिंह की तरफ था। उन्होंने कहा कि जिनके घर शीशे के होते हैं वो दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकते। इससे पहले धर्मशाला के कार्यक्रम में सीएम वीरभद्र सिंह ने पार्टी को पीठ में छुरा घोंपने वालों से खतरा बताया था। उन्होंने कहा था कि पार्टी में काले व सफेद कौए हैं।
दरअसल, चुनावी साल में कांग्रेस में वर्चस्व की लड़ाई छिड़ी हुई है। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पूरी कमान अपने हाथ में रखना चाहते हैं। इसके लिए वो पार्टी आलाकमान पर भी दवाब बना रहे हैं ताकि टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव प्रचार तक हाथ ऊपर बना रहे। ताकि दोबारा सीएम की कुर्सी तक पहुंचा जा सके। हिमाचल में सियासी तौर पर कांगड़ा जिला सबसे अहम है। यहां सबसे अधिक 15 विधानसभा सीटें हैं। शिमला की सत्ता का रास्ता कांगड़ा से होकर ही जाता है। कांगड़ा के मंत्री जीएस बाली की महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है। वो भी आने वाले चुनावों में अपने आपको सीएम के दावेदार के तौर पर पेश कर रहे हैं। यही कारण है कि वीरभद्र सिंह जीएस बाली को किसी भी सूरत में आगे बढ़ते नहीं देखना चाहते।

बाली के विधानसभा क्षेत्र नगरोटा बगवां में कार्यकर्ता सम्मेलन के दौरान सीएम वीरभद्र सिंह मौजूद नहीं थे। लेकिन हिमाचल प्रभारी सुशील कुमार शिंदे और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू उस आयोजन में मौजूद थे। शिंदे के सामने ही बाली ने परोक्ष रूप से मुख्यमंत्री के खिलाफ जमकर भड़ास निकाली। यही नहीं, सुखविंदर सिंह सुक्खू ने भी बाली को क्रांतिकारी सोच वाला नेता बता दिया। वहीं, ठीक उसी दिन कांगड़ा जिला में ही पुलिस विभाग के समारोह में मौजूद वीरभद्र सिंह ने बयान दे डाला कि इस दफा विधानसभा चुनाव में अधिकांश पुराने चेहरों को ही टिकट दिया जाएगा। जाहिर है, वीरभद्र सिंह ये संकेत देना चाहते हैं कि चुनाव में उनकी ही ज्यादा चलेगी। इन परिस्थितियों में पार्टी प्रभारी सुशील कुमार शिंदे की कांग्रेस को एकजुट रखने की कोशिशों को धक्का लग रहा है।
पिछले विधानसभा चुनाव में कौल सिंह प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे। वीरभद्र सिंह ने हाईकमान पर दबाव बनाकर खुद अध्यक्ष पद हासिल कर लिया। उस दौरान कौल सिंह ने अपने मन की बात कही थी। कौल सिंह ने कहा था कि वे भला मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकते? उनमें सीएम बनने की सारी काबीलियत है लेकिन कौल सिंह की ये हसरत मन में ही रह गई। वीरभद्र सिंह पिछले चुनाव में अकेले अपने दम पर पार्टी को सत्ता में ले आए। दिसंबर 2012 में वीरभद्र सिंह सीडी केस से बरी हुए और उन्होंने सीएम पद संभाल लिया।

पचास साल के राजनीतिक जीवन में वीरभद्र सिंह के समक्ष इस दफा पहली बार बड़ी चुनौती है। वे आय से अधिक संपत्ति केस में ईडी व सीबीआई की जांच झेल रहे हैं। इसके अलावा उनके सामने अपने बेटे विक्रमादित्य सिंह को स्थापित करने की जिम्मेदारी है। वीरभद्र सिंह अपने सीएम रहते विक्रमादित्य सिंह को विधायक बनते देखना चाहते हैं। बता दें कि वीरभद्र सिंह शिमला ग्रामीण सीट को विक्रमादित्य सिंह के लिए छोडऩा चाहते हैं लेकिन कांग्रेस में उनकी राह आसान नहीं है। वीरभद्र सिंह चाहकर भी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुखविंद्र सिंह सुक्खू को कुर्सी से नहीं हटा पाए। राज्य में विधानसभा चुनाव अक्टूबर महीने में हो सकते हैं। ऐसे में कांग्रेस के पास गुटबाजी को थामने के लिए बहुत कम समय बचा है।












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