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Himachal Elections: पुरानी पेंशन बहाली के मामले में भाजपा से नाराज हैं प्रदेश के लाखों  कर्मचारी, सत्ता वापसी में बन सकता है रोड़ा

शिमला। हिमाचल प्रदेश चुनावों में इस बार सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिये ओल्ड पेंशन स्कीम की बहाली का मामला गले की फांस बन गया है। इसके चलते कर्मचारियों की भारी नाराजगी का सामना पार्टी को चुनावों में करना पड रहा है। और विपक्षी दल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी इस मुद्दे को भुनाने के लिये कोई कोर कसर नहीं छोड रहे है। जिससे सारा चुनाव ओपीएस के ईर्द गिर्द सिमटने लगा है।

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    Himachal Elections state employees angry with BJP over old pension congress jairam thakur


    चुनावों की घोषणा से पहले भाजपा के रणनीतिकारों का शायद इस बात का आभास ही नहीं था, कि यह मुद्दा आगे चलकर गले की फांस बन जायेगा। यही वजह रही कि सरकार कर्मचारियों की इस मांग को मानने के लिये अपने आपको तैयार नहीं कर पाई। और चुनाव आचार संहिता लगने के बाद भी पार्टी स्तर पर भाजपा ने इस मांग की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। जिससे सरकारी कर्मचारियों में पार्टी के प्रति नाराजगी गहरी होती चली गई। प्रदेश में लाखें सरकारी कर्मचारी हैं। और हर घर का एक सदस्य प्रदेश सरकार का कर्मचारी है। इतने बडे वोट बैंक की नाराजगी किसी भी सरकार को सत्ता से बेदखल कर सकती है।

    यही वजह है कि इस बार भी चुनावों में ओपीएस एक बड़ा मुद्दा भाजपा के खिलाफ बन गया है। इससे पहले भी भाजपा की सरकार राज्य के कर्मचारियों के गुस्से का शिकार हो चुकी है। व 1993 के चुनावों में कर्मचारियों के गुस्से की वजह से ही भाजपा को नुकसान उठाना पडा था। और चुनावों में शांता कुमार की सरकार को करारी हार का सामना करना पडा था। उसके बाद शांता कुमार की सक्रिय राजनीति में वापसी नहीं हो पाई। और उन पर कर्मचारी विरोधी होने का ठप्पा ही लग गया । इन दिनों प्रदेश के कर्मचारियों के बीच भाजपा सरकार के प्रति गुस्सा देखा जा रहा है।

    गौरतलब है कि दिसंबर 2003 में पूर्व प्रधान मंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार द्वारा ओपीएस को समाप्त कर दिया गया था। और सभी राज्य सरकारों, जिनमें दिवंगत वीरभद्र सिंह के नेतृत्व वाली हिमाचल की कांग्रेस सरकार भी शामिल है, को केंद्र के फैसले को लागू करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। उसके बाद राष्ट्रीय पेंशन योजना 1 अप्रैल, 2004 से लागू की गई थी। लेकिन अब कर्मचारी संगठन पुरानी पेंशन बहाली की मांग करने लगे है। जिससे प्रदेश की राजनीति में खासी हलचल हो रही है। कर्मचारियों की मांग को कांग्रेस पार्टी और आम आदमी पार्टी का समर्थन भी मिल रहा है। लेकिन भाजपा के लिये यह मामला दो धारी तलवार पर चलने जैसा है।

    माना जा रहा है कि मोदी सरकार अकेले हिमाचल में पुरानी पेंशन योजना की बहाली के मूड में नहीं रही है। चूंकि कर्मचारियों की अहम मांग ओपीएस को छेडना मधुमक्खियों के छत्ते से छेडने जैसा है। क्योंकि इसके राष्ट्रीय प्रभाव होंगे। लिहाजा यह काम भाजपा सरकार के लिये आसान नहीं रहा। वैसे भी हिमाचल पहले ही 80,000 करोड़ रुपये से अधिक की देनदारियों से जूझ रहा है। और ओपीएस का वार्षिक बोझ लगभग 5,000 करोड़ रुपये से अधिक हो सकता है, जो किसी भी सरकार के लिये वहन करना आसान नहीं होगा।

    हालांकि , कांग्रेस के दो मुख्यमंत्रियों , राजस्थान के अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ के भूपेश बघेल ने अपने-अपने राज्यों में ओपीएस को वापस करने का साहसिक निर्णय लिया है और क्रमशः 25 फरवरी, 2022 और 12 अप्रैल, 2022 को अधिसूचना जारी की थी।

    राजनैतिक जानकार रविन्दर सूद मानते हैं कि मौजूदा दौर में कर्मचारियों ने अपनी व्यक्तिगत विचारधारा को तोड़कर हाथ मिलाया है। और सभी कर्मचारी संगठन इस मामले पर एकमत हैं। क्योंकि वे ओपीएस को अपने परिवारों के भविष्य के सुरक्षा कवच के रूप में देखते हैं जबकि नए एनपीएस, जो वर्तमान में लागू है, ने अकल्पनीय अनिश्चितता पैदा कर दी है। इसलिए, इस मांग को वापस लेने पर किसी भी सुलह या समझौते की बहुत कम संभावना रही है। जाहिर है इसका नुकसान भाजपा को उठाना पडेगा।

    दूसरी ओर विपक्षी दल कांग्रेस इस मामले पर अपने राजनीतिक हित साधने में जुटी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह, कांग्रेस विधायक दल के नेता मुकेश अग्निहोत्री और अभियान समिति के अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सहित कांग्रेस नेताओं ने कर्मचारियों के साथ एकजुटता दिखाई है और सत्ता में आते ही पहले ही दिन ओपीएस में वापस लौटने की अधिसूचना जारी करने का वादा किया है।.कांग्रेस ओपीएस मुद्दे पर अपना चुनावी अभियान बड़ी चतुराई से तैयार किया है । कांग्रेस को लगता है कि यह मुद्दा हिमाचल में भाजपा के ’मिशन रिपीट’ के सपने को बड़ा झटका देने की क्षमता रखता है।

    वहीं , मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा कि कांग्रेस पिछले लंबे वक्त से ऐसे मुद्दों को उठाने की कोशिश हो रही है, जिनसे राजनीतिक लाभ लिया जा सकता है। ओपीएस तो चल रहा था। हमने बंद कहां किया। ये निर्णय हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़े नेता वीरभद्र सिंह ने लिया। उस वक्त न कर्मचारियों ने सोचा और न ही कांग्रेस ने सोचा। 2004 में इसे लागू किया। इसके बाद जब कांग्रेस की सरकारें बनीं तो ये ख्याल उस वक्त क्यों नहीं आया। ये कर्मचारियों की भावनाएं जानबूझकर भड़का रहे हैं, जिससे उन्हें चुनावी लाभ मिल सके।

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