Haryana Chunav Result: हरियाणा में भाजपा की जीत में RSS का कितना बड़ा रहा रोल?

Haryana Chunav Result 2024: लोकसभा चुनावों में बीजेपी की सीटें अप्रत्याशित रूप से कम हुईं तो कहा गया कि इस बार उसके वैचारिक संगठन आरएसएस (RSS) के स्वयंसेवकों ने दिल खोलकर मेहनत नहीं की। लेकिन, हरियाणा में पार्टी लगातार तीसरी बार और अबतक की सबसे बड़ी बहुमत से सत्ता में लौटी है तो फिर से आरएसएस की भूमिका चर्चाओं में आ गई है।

बीजेपी जब भी देश में कोई चुनाव जीतती है, अप्रत्याशित रूप से जीतती है तो सोशल मीडिया पर कुछ मीम्स वायरल होने लगते हैं। इसमें आरएसएस के स्वयंसेवकों के लिए दावा किया जाता है कि कोई आया था, जिसने पार्टी की जीत सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत की और बीजेपी को जीत का ताज सौंपकर, जिस तरह से चुपचाप आए थे, मदद करने के बाद फिर से चुपचाप लौट गए।

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हरियाणा में बीजेपी की जीत में आरएसएस की बड़ी भूमिका
हरियाणा में बीजेपी को अबतक की सबसे ज्यादा सीटें मिली हैं और दो बार की एंटी-इंकंबेंसी को मिटाकर वह तीसरी बार सत्ता में लौटी है तो इसमें भी राष्ट्रीय स्वयं संघ (RSS) की बहुत बड़ी भूमिका सामने आ रही है। दरअसल, हरियाणा में भी लोकसभा चुनावों में पार्टी की न सिर्फ सीटें आधी हो गई थीं, बल्कि वोट शेयर में भी गिरावट आ गई थी।

जानकारी के मुताबिक एक आंतरिक सर्वे हुआ था, जिसमें भनक लगी थी कि तत्कालीन सीएम मनोहर लाल खट्टर की लोकप्रियता बहुत ही घट चुकी थी, जिसका खामियाजा पार्टी को विधानसभा चुनावों में भुगतनी पड़ सकती है। इसी के बाद फौरन नेतृत्व परिवर्तन हुआ और पार्टी ने नई रणनीति पर अमल करना शुरू किया।

ग्रामीण वोटरों के बीच आरएसएस ने किया काम
संकट सामने देखकर बीजेपी को आरएसएस की याद आई और उसने ग्रामीण मतदाताओं में पार्टी का भरोसा बहाल करने और जमीनी मशीनरी को सक्रिय करने में उससे सहयोग की मांग की। इस साल 29 जुलाई को हरियाणा चुनाव के संबंध में दिल्ली में संघ और बीजेपी के बड़े नेताओं की एक अहम बैठक बुलाई गई।

हरियाणा में बीजेपी को जीत दिलाने के लिए संघ ने जमीनी रणनीति बनाई
इसमें आरएसएस के सह सरकार्यवाह अरुण कुमार, हरियाणा बीजेपी के अध्यक्ष मोहनलाल बड़ौली, केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान एकसाथ बैठे। पार्टी को जमीनी स्तर से सक्रिय करने पर चर्चा हुई। उम्मीदवारों को चुनने, ग्रामीण मतदाताओं तक पहुंचने, लाभार्थी योजनाओं पर फोकस करने के साथ ही उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल बिठाने पर काम करने का फैसला लिया गया।

आरएसएस ने एंटी-इंकंबेंसी को प्रो-इंकंबेंसी में बदला!
मतदान से करीब एक महीने पहले से आरएसएस के स्वयंसेवक बीजेपी की तीसरी बार सरकार बनाने के अभियान में जुट गए। हर जिलों में कम से कम 150 स्वयंसेवकों को सक्रिय किया गया। लक्ष्य ग्रामीण मतदाताओं से संपर्क स्थापित करना था। काम यह था कि राज्य सरकार के खिलाफ जो भी मायूसी या नाराजगी है, उसपर मरहम लगाया जाए। उनकी भावनाओं को प्रो-इंकंबेंसी में बदला जाए।

कुल मिलाकर आरएसस का काम था कि बीजेपी सरकार के खिलाफ कथित तौर पर जो भी नकारत्मकता थी, उसे सकारात्मक धारणा में तब्दील किया जाए। आरएसएस ने पार्टी को सलाह दी कि टिकट देते समय ऐसे उम्मीदवारों पर विचार करें, जिनका मतदाताओं के बीच जनाधार हो।

इसी अभियान के तहत खुद सीएम नायब सिंह सैनी की खाप और पंचायत नेताओं के साथ मुलाकात करवाई गई, जो कथित तौर पर खट्टर सरकार के कार्यकाल से असंतुष्ट थे।

विधायकों में जो पूर्व सीएम को लेकर असहजता थी, उसे भी दूर करने का प्रयास कराया। आरएसस ने सैनी की सरकार और पार्टी के जमीनी लोगों के बीच जिस तरह से एक पुल का काम किया, उसके बारे में शायद चुनावी पंडित भनक भी नहीं लगा पाए।

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