Gujarat: दिग्गज पाटीदार नेताओं की जगह मोदी-शाह ने भूपेंद्र पटेल पर ही क्यों किया भरोसा ? जानिए

गांधीनगर,13 सितंबर: गुजरात में भाजपा के लिए पाटीदार समाज हमेशा से अहम रहा है। इसलिए अगले साल होने वाले चुनावों को देखते हुए पाटीदार को मुख्यमंत्री बनाने की रणनीति में कुछ भी खास नहीं है। लेकिन, सवाल है कि पार्टी में एक से बढ़कर दिग्गज पाटीदारों के होने के बावजूद बीजेपी ने पहलीबार के विधायक पर ही दांव क्यों खेला है। दरअसल, इसके जरिए पार्टी अपने पूरे कोर वोट बैंक की राजनीति को साधना चाहती है। इसमें पाटीदारों के साथ-साथ बहुत बड़ा ओबीसी वोट बैंक भी शामिल है। पार्टी का मौजूदा नेतृत्व यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से ज्यादा प्रदेश की राजनीति को कोई नहीं समझ सकता; और इसलिए भूपेंद्र पटेल को जिम्मेदारी सौंपने के पीछे पहले से सोची-समझी एक सधी हुई रणनीति है।

पाटीदार और ओबीसी भाजपा के कोर वोटर

पाटीदार और ओबीसी भाजपा के कोर वोटर

गुजरात में 2002 के चुनावों को देखते हुए भाजपा ने मुख्यमंत्री बदलकर एकसाथ कई फैक्टर को साधने की कोशिश की है। विजय रुपाणी को हटाकर पार्टी ने खासकर कोविड-19 की दूसरी लहर में हुए कुप्रबंधन के आरोपों से पिंड छुड़ाने की कोशिश तो की ही है, पूर्व मुख्यमंत्री और उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के राजनीतिक करीबी को उनकी जगह पर बिठाकर पाटीदार समुदाय की इच्छा पूरी कर दी है। लेकिन, भाजपा नेतृत्व की असल चुनौती बच गई है दूसरे छोटे समुदाय, खासकर ठाकोर, प्रजापति और बक्षीपंच की; और भूपेंद्र पटेल के जरिए पार्टी ने इस चिंता को भी दूर करने की रणनीति अपनाई है।

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    भाजपा के लिए पाटीदार क्यों हैं अहम ?

    भाजपा के लिए पाटीदार क्यों हैं अहम ?

    सबसे पहले यह समझ लेते हैं कि पाटीदार को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाना बीजेपी के लिए क्यों जरूरी था। यह वह समुदाय है जो प्रदेश में सबसे ज्यादा प्रभावशाली है। सामाजिक रूप से गावों से लेकर शहरों में यह समुदाय पार्टी का बहुत ही बड़ा वोट बैंक रहा है। लेकिन, कांग्रेस हार्दिक पटेल और आम आदमी पार्टी सूरत के व्यवसायी महेश सवानी को अपना नेता बनाकर भाजपा की जमीन काटने की कोशिश कर रही थी और बीजेपी को उसी की काट की तलाश थी। राजनीति के जानकार मनिषी जानी का कहना है कि भाजपा के लिए पाटीदार इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि 'आरएसएस के अधिकतर बड़े नेता पाटीदार समुदाय से हैं, जिनकी वजह से यहां पर आरएसएस-भाजपा का विकास हुआ है। मध्यम वर्ग और कामकाजियों में भी पाटीदारों की अच्छी-खासी तादाद है और दोनों श्रेणियां बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण है।'

    भूपेंद्र पटेल पर ही क्यों किया भरोसा ?

    भूपेंद्र पटेल पर ही क्यों किया भरोसा ?

    मुद्दे की बात ये है कि भूपेंद्र पटेल जैसे लो-प्रोफाइल नेता को कमान सौंपने के पीछे एक सोची-समझी रणनीति है। जानी के मुताबिक इससे पाटीदारों का जो थोड़ा-बहुत वोट भी डगमगाने का खतरा था, वह साध लेने की उम्मीद है, साथ ही साथ दूसरे समुदायों में यह संदेश देना है कि गुजरात के लोगों के लिए सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही मायने रखने चाहिए। इसकी ओर सबसे सटीक इशारा गुजरात से पार्टी सांसद दिनेशचंद्र अनावैद्य ने किया है, जो कि पार्टी के बक्षीपंच मोर्चा के भी प्रमुख हैं। उन्होंने कहा है कि भाजपा ओबीसी के लिए चिंतित नहीं है क्योंकि 'नरेंद्र मोदी की वजह से ही बक्षीपंच समुदाय को सामाजिक और राजनीति पहचान मिली है।.........नरेंद्रभाई की वजह से ही इस समुदाय को स्थानीय स्तर के चुनावों में भी टिकट मिलना शुरू हुआ था.....हमारी पार्टी ने उनके लिए खास योजनाएं शुरू कीं और यहां तक कि नेताओं को भी तैयार किया, जैसा कांग्रेस ने कभी नहीं किया। ओबीसी विधेयक और ओबीसी आयोग के बाद, हर ओबीसी अब पार्टी के साथ है।' यानी लो-प्रोफाइल होने की वजह से पटेल सीएम तो रहेंगे, लेकिन गुजरात में चेहरा पीएम मोदी ही रहेंगे, जो खुद ओबीसी समाज से आते हैं।

    बीजेपी के लिए भूपेंद्र पटेल की नाम ही काफी है!

    बीजेपी के लिए भूपेंद्र पटेल की नाम ही काफी है!

    भाजपा के लिए पाटीदार कितने अहम हैं, इसका अंदाजा पिछले महीने पार्टी की जन आशीर्वाद यात्रा में ही जाहिर हो गया था। इस दौरान केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडविया ने भाजपा की ओर से इस समुदाय को मिले सम्मान की चर्चा की थी, जिसमें स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के निर्माण के साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल को पद्म भूषण से सम्मानित किया जाना भी शामिल है। वैसे 2015-16 में पाटीदार आंदोलन की वजह से प्रदेश में जो उपद्रव हुआ था, आज की तारीख में वह शांत है। तब यह समाज पार्टी से काफी नाराज नजर आ रहा था। हालांकि,अब पाटीदारों की ओर से प्रतिनिधित्व बढ़ाने का दबाव जरूर बढ़ने लगा था। पिछले जून की ही बात है कि सौराष्ट्र के कागवाड़ स्थित खोडालधाम मंदिर में लेउवा और कड़वा पटेलों की एक बैठक हुई थी, जिसमें पाटीदार समाज के कई बड़े नेता मौजूद थे। इस बैठक में ही पाटीदार मुख्यमंत्री की वकालत की गई थी। यहां कुछ नेताओं की शिकायत थी कि उनके समर्थन की तुलना में बीजेपी में उन्हें हिस्सेदारी नहीं मिल रही है। अब उनकी मांग पूरा करने के लिए भूपेंद्र पटेल का नाम ही काफी है।

    भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री के पद पर बिठाकर पाटीदारों की इच्छा तो पूरी की ही गई है, ओबीसी समेत भाजपा के बाकी वोट बैंक को यह संदेश देने की कोशिश हुई है कि गुजरात की जनता के लिए सिर्फ पीएम मोदी ही मायने रखते हैं।

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