Somnath Temple History: मंदिर निर्माण में गिरनार के बजाय अरावली के पत्थर क्यों हुए इस्तेमाल?
Somnath Temple History: गुजरात के सौराष्ट्र तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है। यह मंदिर आस्था, पुनर्निर्माण और सांस्कृतिक गौरव का भी प्रतीक है। आज जो भव्य सोमनाथ मंदिर हम देखते हैं, उसका वर्तमान ढांचा लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone) से निर्मित है। इसे मजबूती के साथ-साथ एक विशिष्ट भव्यता भी प्रदान करता है। पहले इस मंदिर का निर्माण कार्य गिरनार के पहाड़ों के पत्थरों से होना था, लेकिन फिर राजस्थान के अरावली के पत्थरों को प्राथमिकता दी गई।
अरावली के पत्थरों की मजबूती और भव्यता को देखते हुए यह फैसला लिया गया था। सोमनाथ मंदिर का आधुनिक स्वरूप अपनी भव्यता और विशालता के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। दुनिया भर से श्रद्धालु मंदिर दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

Somnath Temple History: अरावली के पत्थरों से हुआ निर्माण
- ऐतिहासिक दृष्टि से सोमनाथ मंदिर और सौराष्ट्र क्षेत्र के कई अन्य मंदिरों के लिए पत्थरों का प्रमुख स्रोत गिरनार की पहाड़ियां (Girnar Hills) मानी जाती रही हैं। इन पहाड़ियों से प्राप्त पत्थर प्राचीन काल में मंदिर निर्माण के लिए उपयोग किए जाते थे।
- हालांकि, आधुनिक पुनर्निर्माण (1951) के दौरान मंदिर के लिए उच्च गुणवत्ता वाला लाल बलुआ पत्थर मुख्य रूप से राजस्थान की खदानों से मंगवाया गया।
- राजस्थान का बलुआ पत्थर अपनी मजबूती, टिकाऊपन और सुंदर नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। इन पत्थरों पर बारीक नक्काशी बेहद खूबसूरती से उभरती है और राजस्थान की ऐतिहासिक इमारतें इसकी गवाह हैं। इसी वजह से मंदिर के निर्माण के लिए दूर राजस्थान से पत्थर मंगाए गए थे।
Somnath Temple Facts: मारु-गुर्जर स्थापत्य शैली की मिसाल
- सोमनाथ मंदिर का निर्माण मारु-गुर्जर (चालुक्य) स्थापत्य शैली में किया गया है। इसे "कैलाश महामेरु प्रसाद" शैली में निर्मित माना जाता है। इसे ब्रह्मांडीय पर्वत मेरु का प्रतीक है।
- पौराणिक कथाओं के अनुसार, सोमनाथ मंदिर का पहला स्वरूप चंद्रदेव (सोमराज) द्वारा सोने से बनवाया गया था। बाद में रावण ने चांदी से, भगवान श्रीकृष्ण ने चंदन की लकड़ी से, और अंततः भीमदेव ने इसे पत्थर से निर्मित करवाया।
Somnath Temple Rochak Tathya: सोमनाथ मंदिर का 7वीं बार निर्माण
वर्तमान सोमनाथ मंदिर को सातवां पुनर्निर्माण माना जाता है। मंदिर के आधुनिक स्वरूप को बनकर तैयार होने में लगभग साढ़े तीन साल का समय लगा था। मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प भारत के पहले उप-प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने लिया था। उन्होंने 12 नवंबर 1947 को जूनागढ़ के भारत में विलय के बाद मंदिर के पुनरुद्धार की बात कही थी। सरदार पटेल के निधन के बाद, इस कार्य की जिम्मेदारी के.एम. मुंशी ने संभाली और श्री सोमनाथ ट्रस्ट के माध्यम से मंदिर का निर्माण सार्वजनिक चंदे से कराया गया। मंदिर के मुख्य वास्तुकार प्रभाशंकर सोमपुरा थे, जिनका परिवार सदियों से गुजरात में मंदिर निर्माण की परंपरा से जुड़ा रहा है।
Somnath Temple History: प्रथम राष्ट्रपति ने किया था उद्घाटन
मंदिर का निर्माण कार्य मई 1951 में पूरा हुआ और 11 मई 1951 को भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की। इस मंदिर के पुनर्निर्माण को भारत की आस्था और गौरव से जोड़कर देखा जाता है। यह मंदिर आज भी भारत की सांस्कृतिक पुनर्जागरण की मिसाल बना हुआ है।












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