मोरबी में 43 साल पहले आई थी एक भयानक आपदा, तब RSS-Modi की भूमिका ने बदल दी थी गुजरात की राजनीति
Morbi Bridge collapse: मोरबी, पुल हादसे की वजह से आज दुनिया भर में सुर्खियों में है। कई वैश्विक नेताओं ने वहां हुई दर्दनाक घटना पर गहरा दुख जताया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मोरबी पहुंचे हैं और हादसे वाली जगह का मुआयना किया है और अस्पताल जाकर घायलों को भी देखा है। लेकिन, 43 साल पहले मोरबी की उसी मच्छु नदी पर बना बांध टूट गया था,जिसपर यह पुल टूटकर गिरा है। तब बांध टूटने के चलते ऐसी तबाही आई थी कि पूरा शहर बर्बाद हो गया था। उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आरएसएस से जुड़े हुए थे और राहत और बचाव कार्यों के साथ-साथ मोरबी के पुनर्वास में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका अदा की थी। उस समय संघ ने वहां जिस तरह से कार्य किया था, उससे पूरे गुजरात की जो राजनीति बदली, उसका प्रभाव आजतक बरकरार है।

मोरबी में आई आपदा ने बदल दी थी गुजरात की राजनीति
गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के मोरबी में मच्छु नदी पर बना जो केबल ब्रिज टूटकर गिरा है, उस नदी पर बने बांध टूटने की वजह से एक बार शहर में बहुत बड़ी तबाही आ चुकी है। घटना 43 साल पहले 1979 की है, जिसमें हजारों लोगों की मौत हो गई थी। आगे चलकर उस तबाही ने पाटीदार समाज के गढ़ माने जाने वाले इस इलाके की पूरी राजनीति बदल कर रख दी। क्योंकि, उस त्रासदी के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयंसेवकों ने राहत और पुनर्वास के कार्यों में अमूल्य योगदान दिया था। वह त्रासदी कितनी बड़ी थी, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूभाई पटेल ने पुनर्निमाण के काम को सुनिश्चित करवाने के लिए अपनी पूरी कैबिनेट को मोरबी में बिठा दिया था।

मच्छु डैम आपदा क्या है ?
मोरबी का इतिहास 17वीं शताब्दी में एक देशी रियासत के तौर पर सामने आने से जुड़ा है। उसके बाद इस शहर को इसके इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी 11 अगस्त, 1979 को झेलनी पड़ी जब मच्छु बांध का एक हिस्सा टूटने की वजह से पूरा शहर तबाह हो गया था। उस साल बहुत ज्यादा बारिश होने की वजह से बांध में पानी लबालब भरा हुआ था। लगातार बारिश की वजह से पानी निकासी के स्रोत पहले ही भरे हुए थे। अचानक बांद टूटा और शहर ने अपने इतिहास का सबसे बड़ा जल प्रलय देखा।

'मोरबी के पुनर्निमाण में आरएसएस ने बड़ी भूमिका निभाई'
मोरबी को फिर से खड़ा करना तत्कालीन सरकार और उसकी पूरी मशीनरी के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी। ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक तब सरकारी मशीनरी को आरएसएस के स्वयंसेवकों का पूर्ण सहयोग मिला और उन्होंने राहत और पुनर्वास के काम में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री सुरेश मेहता उस दौर के बारे में याद करते हैं, 'तब मैं संघ से नहीं जुड़ा था।' उन्होंने आगे बताया, 'लेकिन, मैं मोरबी में कार्य करने के लिए पहुंच गया था। उस समय के संघ के नेता - चिमनभाई शुक्ला, केशुभाई पटेल, प्रवीण मनियार - जो नजदीक थे, जल्दी पहुंच गए थे।' उन्होंने कहा कि 'संघ के स्वयंसेवकों ने बहुत अच्छा काम किया था।' केशभाई पटेल उस समय गुजरात के सिंचाई मंत्री हुआ करते थे।

पीएम मोदी ने भी राहत-पुनर्वास में दिया था सक्रिय योगदान
अहमदाबाद में आरएएस के एक नेता जयंती भदेसिया ने मीडिया वालों को बताया था कि उस समय पीएम मोदी ने भी राहत और बचाव के कार्यों में बहुत ही सक्रिय भूमिका निभाई थी और शहर के पुनर्निमाण के लिए आंध्र प्रदेश से कार्यकर्ताओं को भी बुलाया गया था। 2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान मोरबी की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद भी उस त्रासदी के दौरान संघ के स्वयंसेवकों की ओर से निभाई गई भूमिका का जिक्र किया था। इस दौरान उन्होंने पूर्व पीएम इंदिरा गांधी पर तंज भी कसा था। वो बोले थे- 'इंदिराबेन मोरबी आई थीं। चित्रलेखा (एक प्रसिद्ध गुजराती मैगजीन) पर एक तस्वीर थी, जिसमें इंदिराबेन रुमाल से चेहरा ढंक कर बदबू से बचकर भागती दिख रही थीं और दूसरी तस्वीर में जनसंघ और आरएसएस के कार्यकर्ता कीचड़ में उतरे हुए थे, लोगों का काम करने के लिए।'

'मोरबी आपदा के बाद भाजपा के साथ हो गए पाटीदार'
सुरेश मेहता का कहना है कि आपदा के समय संघ की जबर्दस्त मौजूदगी और वहां पर उसके पहले से किए गए प्रयासों की वजह सौराष्ट्र भगवा राजनीति का गढ बन गया। माधवसिंह सोलंकी के 'खाम जाति इंजीनियरिंग' के बाद के दिनों में गुजरात के प्रभावशाली पाटीदार समाज कांग्रेस से दूर हटकर पूरी तरह से भारतीय जनता पार्टी के साथ लामबंद हो गया। मोरबी में एक और त्रासदी हुई है। इस समय गुजरात और केंद्र में संघ की विचारधारा वाली मजबूत सरकार है और खुद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि मोरबी पुल हादसे का आने वाले विधानसभा चुनावों पर क्या असर पड़ता है?












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