DDU University News: अमेरिका के ओहायो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ने बताया प्रकृति का महत्व

Gorakhpur News: दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आज सफलतापूर्वक समापन हुआ। संगोष्ठी का मुख्य विषय "एनवायरनमेंटल एंड अपोकैलिप्टिक इमेजिनेशन: इको-क्रिटिकल रीडिंग्स इन साउथ एशियन लिटरेचर" था। समापन सत्र में विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. सत्यार्थ त्रिपाठी (एमिटी यूनिवर्सिटी, लखनऊ) और गेस्ट ऑफ ऑनर के रूप में उत्तर प्रदेश के जलवाय परिवर्तन एवं वन विभाग के विशेष सचिव, डॉ. चंद्रभूषण त्रिपाठी (आईएएस) शामिल हुए। मुख्य अतिथि के रूप में ओहायो विश्वविद्यालय अमेरिका के प्रो. योगेश सिन्हा रहे. समापन सत्र की अध्यक्षता विज्ञान संकाय के अधिष्ठाता एवं कुलसचिव प्रो शान्तनु रस्तोगी द्वारा की गई।

प्रो. योगेश सिन्हा ने अपने समापन व्याख्यान में दक्षिण एशियाई साहित्य में लैंगिक दृष्टिकोण और एनवायरनमेंटल स्थिरता पर गहन विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने महिलाओं की पोषणकर्ता भूमिका को एनवायरनमेंटल स्थिरता में अत्यंत महत्वपूर्ण बताया और इस दिशा में साहित्य और पर्यावरण के आपसी संबंधों को उजागर किया. उन्होंने कहा प्रकृति हमसे कुछ नहीं मांगती है, वह बस हमें देती जाती है। लेकिन लालच करने पर वह हमें दंड भी देती है।उन्होंने इस बात को दक्षिण एशियाई साहित्य से समझाया ।

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विशिष्ट अतिथि प्रो. सत्यार्थ त्रिपाठी ने अपने व्याख्यान में कहा कि जीवन में समालोचनात्मक दृष्टि का होना अति आवश्यक है। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि एक अच्छे विद्यार्थी के लिए जीवनभर सीखने की चेष्टा बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने कवियों वर्ड्सवर्थ, कीट्स और रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविताओं के उदाहरणों के माध्यम से साहित्य में एनवायरनमेंटल मुद्दों की महत्ता पर प्रकाश डाला। प्राचीनकाल से ही भारतीय सनातन संस्कृति में प्रकृति को माँ का स्थान प्राप्त है। प्रकृति ने कभी भी किसी भी प्राणी के साथ भेदभाव किये बिना, सभी का समान रूप से लालन-पालन किया है। इसी को आधार मानकर मानव जाति ने पर्यावरण का संरक्षण करते हुए, प्रकृति की उपासना करना आरंभ किया था। इस बात से अनभिज्ञ आज का मानव आधुनिकता के नाम पर पर्यावरण को दूषित करने में लगा हुआ है। भविष्य की रक्षा करने के लिए आज मानव को पर्यावरण का संरक्षण करना ही होगा।

गेस्ट ऑफ ऑनर डॉ. चंद्रभूषण त्रिपाठी ने भारतीय ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए बताया कि वेदों और शास्त्रों में एनवायरनमेंट संरक्षण से संबंधित गहन विचार निहित हैं। उन्होंने कहा कि इन प्राचीन ग्रंथों में पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान निहित है, जिसे आज के संदर्भ में अपनाने की आवश्यकता है।पृथ्वी और प्रकृति आने वाली पीढ़ियों के धरोहर होते हैं। और हमें दूसरों के धरोहर की रक्षा करनी चाहिए।

सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रोफ़ेसर शांतनु रस्तोगी ने संगोष्ठी के विषय की महत्वपूर्णता पर प्रकाश डालते हुए इसके क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभावों को समझाया।

सांस्कृतिक संध्या का हुआ आयोजन
संगोष्ठी के समापन से पूर्व सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया, जिसमें दीप्ति राय, अनुराग और उनके पुत्र आभास एवं आरव ने अपनी मनमोहक प्रस्तुतियों से सबका दिल जीत लिया। विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र निरंकार के बेटे अभिनव त्रिपाठी ने "रश्मिरथी" कविता का प्रभावशाली पाठ किया, जिसने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।

अंग्रेज़ी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अजय कुमार शुक्ल ने संगोष्ठी के सफल आयोजन पर सभी अतिथियों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों का आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी की रिपोर्ट प्रो. आलोक कुमार द्वारा प्रस्तुत की गई और कार्यक्रम का संचालन डॉ. संजीव कुमार विश्वकर्मा ने किया।

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