नवीन शोध व तथ्यों के आलोक में इतिहास की परख व पहचान निरंतर होते रहना आवश्यक: पूनम टंडन

Gorakhpur News: दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय और भारतीय अनुसन्धान परिषद, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में इतिहास विभाग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि इतिहास को समग्रता में देखने की जरुरत है. नवीन शोध व तथ्यों के आलोक में इतिहास की परख व पहचान निरंतर होते रहना आवश्यक है. विश्वविद्यालय ज्ञान के उत्पादन का केंद्र है. सार्थक परिवर्तन की दिशा में ऐसे विमर्श व संगोष्ठी का बड़ा महत्व है. चिंतन की यह प्रकिया आगे भी जारी रहेगी।

आई सी एच आर के अध्यक्ष पद्मश्री प्रो. रघुवेंद्र तंवर ने हिंसक कान्तिकारी गतिविधियों एवं अहिंसक आंदोलनकारियों के साथ ब्रिटिश हुकूमत के व्यवहार को दर्शाते हुए यह स्पष्ट किया कि इतिहास लेखन में आख्यानों का बुनियादी महत्व है. स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास लेखन को एक नए आख्यान की आवश्यकता है. यह आख्यान भावनाओं से प्रेरित न होकर तथ्यों एवं घटनाक्रमों पर आधारित होना चाहिए. वैसे भी भारतीय इतिहास लेखन की धारा काफी पुरानी पड़ चुकी है. अतः भारतीय इतिहास लेखन को भी एक मुक्ति की आवश्यकता है. अब इतिहास में उन क्रांतिकारियों को दर्ज किया जा रहा है जो अबतक गुमनाम थे।

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उद्घाटन सत्र का बीज वक्तव्य देते हुए ऑर्गनाइज़र के संपादक श्री प्रफुल्ल केतकर ने कहा कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम का स्वरुप व्यापक था. जैसे-जैसे यूरोपीय आक्रमण का स्वरुप बदलता गया, वैसे-वैसे हमारे प्रतिकार का रूप भी बदलता गया. स्वधर्म, स्वदेशी, स्वभाषा- राष्ट्रीय शिक्षा और स्वराज, उसका क्रमिक विकास था.

राजनैतिक स्वाधीनता, हमारे स्वतंत्रता संग्राम का केवल एक हिस्सा था. भारतीय समाज के सभी वर्ग, सभी प्रदेश और उपासना पद्धतियों ने यूरोपियन आक्रमण का प्रतिकार किया. यह प्रतिकार सत्याग्रह से लेकर सशस्त्र संग्राम द्वारा विभिन्न मोर्चो' से किया गया.
वास्को डी गामा के आगमन से ही यह संघर्ष शुरू हुआ. 1857 तक ऐसे 376 युद्ध हुए जो स्वाधीनता संग्राम का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

उन्होंने कहा कि यह संगोष्ठी भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के संकुचित स्वरुप से निकलकर समग्रता में अध्ययन की हमको प्रेरणा देगी, इसका मुझे विश्वास है. पंडित दीनदयाल जी को अपेक्षित भारत की सांस्कृतिक अवधारणा उसी आधार पर प्रस्थापित होगी.

संगोष्ठी के विषय प्रवर्तक और आई सी एच आर के सदस्य सचिव डॉ. ओम जी उपाध्याय ने अपने सम्बोधन में कहा कि स्वाधीनता संग्राम की कम से कम 8 धाराएं पूरी मजबूती के साथ प्रवाहित हो रही थीं. लेकिन दुर्भाग्य से पूरा इतिहास- लेखन केवल एक ही धारा पर केंद्रित रहा. इनमें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की धारा, जिससे पूरे आंदोलन की वैचारिक खाद पानी निकल कर आ रही थी, को भी हाशिए पर धकेल दिया गया. बंकिम चंद्र वंदेमातरम लिखते हुए भारत माता और मां दुर्गा को समीकृत कर रहे थे. स्वामी विवेकानंद ने वर्ष 1892 में कन्याकुमारी में तीन दिन ध्यान करने के बाद अपना निष्कर्ष दिया कि भारत माता और मां जगदंबा में कोई अंतर नहीं है. लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक आजादी की लड़ाई "गणपति उत्सव" और "शिवाजी उत्सव" के माध्यम से लड़ रहे थे; वहीं भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार जब कोलकाता में पहली बार गीता का प्रकाशन कर रहे थे, तो उसके मुख्य पृष्ठ पर खड्ग धारिणी भारत माता का चित्र प्रकाशित कर रहे थे. इसी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की धारा ने पूरी आजादी की लड़ाई की सभी धाराओं को असीम ऊर्जा और उत्साह दिया.

दूसरी जो अत्यधिक महत्वपूर्ण धारा, जिसे इतिहास लेखन में जितना महत्व मिलना चाहिए था उतना नहीं मिल सका; वह थी- क्रांतिकारी आंदोलन की धारा. हजारों हजार युवा क्रांतिवीर अपने मातृभूमि को दासता की बेड़ियों से मुक्त करने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे रहे थे. दुर्भाग्य से हमारी पीढ़ियों को यह बताने का प्रयास किया गया कि हमें यह आजादी बिना खड्ग और ढाल के मिल गई जबकि सच्चाई इसके एकदम विपरीत है.

1857 के महासंग्राम में चार लाख लोगों का बलिदान हुआ. दिल्ली, जिसकी जनसंख्या केवल 152000 थी, 27000 लोगों को फांसी दे दी गई. लखनऊ में 20000 से अधिक क्रांतिवीर फांसी पर लटका दिए गए. वहीं इलाहाबाद में दो महीने तक पेड़ों पर टंगी लाशों को बैलगाड़ियों पर लाद कर ले जाया गया. दुनिया के लिखित इतिहास में ऐसा वीभत्स विवरण अन्यत्र कहीं नहीं मिलता. क्रांति की यह अनुगूंज जो पहले से ही चली आ रही थी, 1947 तक अनवरत बढ़ती रही.
1870 में कूका आंदोलन जिसमें 68 कूकाओं को तोप से बांधकर उड़ा दिया गया और इसी घटनाक्रम में 13 वर्षीय बालक बिशन सिंह का शौर्य, जिसने यह आदेश देने वाले अंग्रेज कमिश्नर काॅवेन की दाढ़ी दोनों हाथों से नोंच डाली और अपने प्राणों की भी आहुति दे दी. महाराष्ट्र में वासुदेव बलवंत फड़के, चापेकर बंधु, मणिपुर में युवराज टिकेंद्रजीत सिंह, बिहार में भगवान बिरसा मुंडा, अरविंद घोष, वारीन्द्र घोष, भूपेंद्र दत्त आदि का शौर्य अनुकरणीय है. हमने अपने दृश्य प्रदर्शनी में 20 वर्ष से कम आयु के 160 बलिदानियों की सूची शामिल की है, जिसमें बाजी राउत, कालीबाई, खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चाकी, कनकलता बरुआ जैसे वीर हैं, जिनके वीरता को इतिहास लेखन में कभी गाया ही नहीं गया.

फांसी पर चढ़ने से पहले क्रांतिवीर मदनलाल ढींगरा जो भाषण देते हैं वह दुनिया के लिखित इतिहास में एक अद्भुत धरोहर है, जब वह कहते हैं कि गुलामी मेरे राष्ट्र का अपमान है, मेरे ईश्वर का अपमान है और यह भी कि राष्ट्र की पूजा राम की पूजा और राष्ट्र की सेवा कृष्ण की सेवा जैसा है. रामप्रसाद बिस्मिल जब गोरखपुर में फांसी पर झूलते हैं, उस समय वे वैदिक मंत्रों का पाठ कर रहे होते हैं और वंदे मातरम का उद्घोष. अशफाक उल्ला ऐसे पहले क्रांतिवीर थे जो कलमा पढ़ते हुए फांसी पर लटक जाते हैं. इसी प्रकार देश के कोने कोने में जो वीर क्रांतिकारी थे; अब समय है कि हमारी नई पीढ़ियों को उनका सच्चा और प्रामाणिक इतिहास पता चल सके. नेताजी के आजाद हिंद फौज में कुल 26000 वीरों ने अपनी आत्माहुति दी. ऐसी अनेक घटनाएं हैं, जिनके आधार पर इतिहास लेखन के असंतुलन और विमर्श को ठीक किए जाने की जरूरत है.

*संगोष्ठी में आयोजित विशिष्ट व्याख्यान के अंतर्गत प्रो.बसंत शिंदे* ने आर्य-द्रविड़ परंपरागत सिद्धांत को अपने विशद व्याख्यान के माध्यम से खारिज किया. उन्होंने अपने उद्बोधन में राखीगढ़ी के पुरातात्विक एवं जैविक निष्कर्ष से यह स्थापित किया कि हड़प्पा सभ्यता एवं वैदिक सभ्यता के निवासी एक दूसरे से भिन्न नहीं थे. राखीगढ़ी से प्राप्त कंकाल की डीएनए मैपिंग से यह स्पष्ट हुआ है कि दक्षिण एशियाई लोगों का डीएनए किसी बाहरी प्रभाव से ग्रसित नहीं है. इस तरह उन्होंने हड़प्पा सभ्यता पर किसी बाहरी प्रभाव को भी नकार दिया. इसके साथ ही उन्होंने बताया कि लगभग दस हजार वर्षों से दक्षिण एशियाई लोगों में सांस्कृतिक एकरूपता के लक्षण कमोबेस आज भी मौजूद हैं.प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी ने स्वागत वक्तव्य दिया. विभागाध्यक्ष प्रो. मनोज तिवारी ने उद्घाटन सत्र का संचालन किया. कुलसचिव प्रो.शांतनु रस्तोगी ने सभी के आभार ज्ञापित किया.

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