DDU University: छात्र विविधता और भारत में समावेशी शिक्षा को लेकर गोरखपुर विश्वविद्यालय में हुआ मंथन
DDU University Gorakhpur Latest News Uttar Pradesh: मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय द्वारा शिक्षकों और शोधकर्ताओं के लिए आयोजित 8वें एनईपी अभिविन्यास एवं संवेदीकरण कार्यक्रम के प्रथम सत्र में विधि विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र, हरियाणा के प्रोफेसर अजीत सिंह चहल ने 'छात्र विविधता और भारत में समावेशी शिक्षा: मिथक या वास्तविकता' विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में समावेशी शिक्षा न केवल एक नैतिक आवश्यकता है, बल्कि यह हमारे संविधान और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की भी केंद्रीय भावना है।
संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि, "मानव जीवन का अंतिम उद्देश्य मस्तिष्क का विकास होना चाहिए", इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए NEP-2020 शिक्षा को सभी के लिए सुलभ, न्यायसंगत और समावेशी बनाने पर बल देती है। भारत में धर्म, भाषा, जाति, संस्कृति और क्षेत्रीय विविधता अत्यधिक व्याप्त है। ऐसे में शिक्षा केवल सूचनाओं का हस्तांतरण नहीं बल्कि विचारशीलता, सहिष्णुता और सहअस्तित्व की भावना का संवाहक होनी चाहिए। समावेशी शिक्षा दो-तरफ़ा प्रक्रिया है जो न केवल वंचित और हाशिए पर खड़े समूहों को मुख्यधारा में लाती है, बल्कि समावेश करने वाले समाज में भी संवेदनशीलता, सहानुभूति और सामाजिक चेतना का विकास करती है।

उन्होंने कहा कि NEP-2020 का स्पष्ट उद्देश्य है कि शिक्षा प्रणाली ऐसी हो जो लिंग, वर्ग, जाति, विकलांगता, या क्षेत्रीय आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करे और प्रत्येक विद्यार्थी की विविधतापूर्ण आवश्यकताओं को ध्यान में रखे। यह नीति समावेशी और बहुस्तरीय शैक्षणिक ढाँचों के माध्यम से ऐसे नागरिक तैयार करना चाहती है जो न केवल शिक्षित बल्कि सामाजिक रूप से उत्तरदायी, विविधता को स्वीकारने वाले और समावेशी विकास के संवाहक हों।
दितीय सत्र में वाणिज्य विभाग, डॉ. एच.एस. गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर के प्रोफेसर जे.के. जैन ने 'शैक्षणिक नेतृत्व' विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि शैक्षणिक नेतृत्व केवल प्रशासनिक दक्षता नहीं, बल्कि एक नैतिक, वैचारिक और प्रेरणादायक भूमिका है, जो समाज और राष्ट्र निर्माण में गहन योगदान देता है।
उन्होंने कहा कि भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मयोग की अवधारणा के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि निःस्वार्थ भाव से किया गया कर्म व्यक्ति को आत्मिक उत्थान और सामाजिक कल्याण दोनों की ओर ले जाता है। जो एक आदर्श शैक्षणिक नेता के आचरण का मूल भी है। इसी भाव को प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक, वक्ता और नेतृत्व विशेषज्ञ, जॉन सी. मैक्सवेल ने अपने शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा है कि, "एक प्रभावी नेता वही होता है जो न केवल मार्ग को जानता है, बल्कि उस पर स्वयं अग्रसर होता है और दूसरों को भी प्रेरित करता है।"
उन्होंने कहा कि NEP-2020 शैक्षणिक नेतृत्व को ऐसे दृष्टिकोण से देखती है जहां उद्देश्य केवल संस्थानों का संचालन नहीं, बल्कि एक समावेशी, नैतिक और नवाचारी शैक्षिक संस्कृति का निर्माण हो।जब ज्ञानी और दूरदर्शी नेतृत्व समाज से संवाद करता है, तो वह केवल शब्द नहीं कहता- वह चेतना और दिशा देता है, जो संस्थानों को ज्ञान के केंद्र और राष्ट्र को समृद्धि के पथ पर अग्रसर करता है।
कार्यक्रम के समन्वयक प्रो अनिल कुमार यादव ने कहा कि इस प्रकार के संवाद और विमर्श न केवल ज्ञान-विस्तार के सशक्त माध्यम होते हैं, बल्कि शिक्षा क्षेत्र में नवाचार, समावेशिता और वैचारिक समृद्धि को भी प्रेरित करते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी इसी प्रकार की सहभागिता को बढ़ावा देती है, जो शिक्षण को एक समग्र और सामाजिक रूप से उत्तरदायी प्रक्रिया बनाती है।
आज के कार्यक्रम का संचालन डॉ. अतुल कुमार मिश्रा, द्वारा बतौर मॉडरेटर किया गया। डॉ. रूपम जैन हाजरा ने वक्ताओं का आभार व्यक्त किया।कार्यक्रम में एमएमटीटीसी निदेशक प्रो. चंद्रशेखर, सह-निदेशक प्रो. राजू गुप्ता, सह-संयोजिका डॉ. पूर्णिमा मिश्रा एवं डॉ. सुशील कुमार सिंह, डॉ मोहम्मद इरफान की गरिमामयी उपस्थिति मैं यह कार्यक्रम संपन्न हुआ।












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