Gita press: गीता प्रेस के लिए महात्मा गांधी और मुंशी प्रेमचंद ने लिखे थे आलेख
उत्तर प्रदेश का गोरखपुर शहर अध्यात्म और राजनीति का अद्भुत संगम है। गोरखनाथ धाम और गीता प्रेस के कारण गोरखपुर बहुत पहले से भारत का एक प्रसिद्ध स्थान रहा है। गीता प्रेस दुनिया की सबसे बड़ी प्रकाशन संस्था है। गीता प्रेस सनातन धर्म और उसके मानवीय आदर्शों की स्थापना के लिए पुस्तकों का प्रकाशन करता है।
पुस्तकों की बिक्री और प्रकाशन के नित नये कीर्तिमान बनाने वाली इस संस्था ने 100 साल पूरे कर लिये। शताब्दी वर्ष मना रहे गीता प्रेस को जब गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की गयी तो कुछ लोगों ने इस पर राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया।

इसे हिंदूवाद से जोड़कर देखा गया। लेकिन यह एकपक्षीय अवधारणा है। गीता प्रेस से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका 'कल्याण' में महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर और प्रेमचंद जैसी महान हस्तियों ने आलेख लिखा था।
महात्मा गांधी ने गीता प्रेस की 'कल्याण' पत्रिका में
गीता प्रेस की कल्याण पत्रिका का पहला प्रकाशन अगस्त 1926 में हुआ था। इस पहले अंक में महात्मा गांधी ने आलेख लिखा था। गीता प्रेस में आज भी महात्मा गांधी का वह आलेख संरक्षित है जो कि एक पत्र के रूप में था। उस समय कल्याण प्रत्रिका के संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार थे। उनकी महात्मा गांधी से बहुत निकटता थी। इस प्रत्रिका के प्रकाशन के पहले हनुमान प्रसाद पोद्दार ने महात्मा गांधी से सलाह मशविरा भी किया था। जब पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ तो उन्होंने महात्मा गांधी से सुझाव के साथ आलेख भी मांगा। तब महात्मा गांधी ने तीन पृष्ठों की एक चिट्ठी लिखी जिसमें उनके विचार थे।
गांधी जी का कल्याण में एक आलेख- भक्ति के नाम पर भोग
महात्मा गांधी ने कल्याण पत्रिका के दूसरे अंक में भी एक आलेख लिखा था जिसका शीर्षक था- नाम महात्मय। इस आलेख में गांधी जी ने राम नाम के महत्व को रेखांकित किया था। उन्होंने लिखा था, "जब जब मुझ पर संकट आये तब तब मैने राम का नाम लिया है और मैं बच गया हूं।" गांधी जी ने कल्याण पत्रिका में आगे भी लिखना जारी रखा। पत्रिका के ग्यारहवें अंक में गांधी ने 'भक्ति के नाम पर भोग' शीर्षक से एक आलेख लिखा था। इसके बाद पत्रिका के तीसरे, चौथे और पांचवें वार्षिकांक में अपने संदेश प्रकाशित होने के लिए भेजे थे। गांधी जी की सलाह पर ही गीता प्रेस ने विज्ञापन से अपनी दूरी बना ली थी। आज भी गीता प्रेस का संचालन बिना विज्ञापन के होता है। महात्मा गांधी ने अक्टूबर 1933 में गीता प्रवेशिका के लिए भूमिका लिखी थी। उस समय गांधी जी वर्धा आश्रम में रहते थे और वहीं से पत्र के माध्यम से उन्होंने यह भूमिका लिखी थी। यह पत्र भी गीता प्रेस में आज संरक्षित है।
प्रेमचंद ने भी लिखा था कल्याण पत्रिका में
कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने 1928 में कल्याण पत्रिका में एक आलेख लिखा था जिसका शीर्षक था- साम्यवाद पूंजीवाद से भयानक है। प्रेमचंद ने सामाजिक और धार्मिक रुढियों के खिलाफ बहुत लिखा था। उन्होंने अपने लेखन की शुरुआत उर्दू से की थी। वे उर्दू में नवाब राय के नाम से लिखते थे। इस तरह गीता प्रेस को साम्प्रदायिक नजरिये से देखना ठीक नहीं। गीता प्रेस ने श्रीमद्भगवत गीता का उर्दू में अनुवाद किया था। गीता का उर्दू संस्करण भी बहुत लोकप्रिय हुआ था।
इसकी आठ हजार प्रतियां बिक गयी थीं।
गोरखपुर- धर्म और राजनीति का संगम
धर्म और अध्यात्म की इस नगरी ने राजनीति का मार्ग भी प्रशस्त किया है। गोरक्ष पीठ (गोरखनाथ मंदिर) के पीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ 1967 में हिंदू महासभा के टिकट पर गोरखपुर से सांसद चुने गये थे। इसके बाद उनके शिष्य महंत अवैद्यनाथ गोरखपुर से सांसद बने। फिर योगी आदित्यनाथ ने लोकसभा में गोरखपुर का प्रतिनिधित्व किया। अब योगी आदित्यनाथ गोरखपुर सदर के विधायक हैं और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।
गीता प्रेस गांधी शांति पुरस्कार की हकदार- पीएम मोदी
भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी शुक्रवार को गीता प्रेस पहुंचे। उन्होंने इस संस्था को गांधी शांति पुरस्कार दिये जाने के पैसले का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अगर कोई संस्था एक सौ साल से भारत को जोड़ने और राष्ट्रीय चरित्र गढ़ने के लिए प्रतिबद्ध है तो उसे यह पुरस्कार मिलना ही चाहिए था। गीता प्रेस ने अंग्रेजी शासन में भी देश प्रेम की मशाल को जलाये रखा था। प्रधानमंत्री ने राष्ट्रनिर्माण में गीता प्रेस के योगदान पर चर्चा की। गीता प्रेस आज भी अपने आदर्शों पर कायम है। गांधी शांति पुरस्कार के तहत प्रशस्ति पत्र और एक करोड़ रुपये का पुरस्कार मिलता है। लेकिन प्रेस ने केवल प्रशस्ति पत्र लेना स्वीकार किया और एक करोड़ रुपये लेने से मना कर दिया। गीता प्रेस का कहना है कि इसके पहले भी संस्थान ने कभी कोई नकद पुरस्कार या धनराशि स्वीकर नहीं की है। यह परम्परा हमेशा कायम रहेगी।
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