विश्व जनसंख्या दिवस- शहरी आबादी ने छीना ग्रामीणों का सुख
बेंगलुरु। विश्व जनसंख्या दिवस पर किस देश की जनसंख्या कितनी बढ़ रही है, इस पर चर्चा करने की जगह हम बात करने जा रहे हैं शहरी जनसंख्या की, जो लगातार बढ़ रही है। और यह बढ़ती जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे लोगों का सुख चैन छीन रही है। चलिये मुद्दे पर बात करने से पहले भारत से जुड़े कुछ आंकड़ों पर नज़र डालते हैं।

2016 में सेंसस द्वारा लगाये गये अनुमान के अनुसार भारत की जनसंख्या 1,324,171,354 यानी 132 करोड़ है। जिसमें से 15 फीसदी लोग शहरों में रहते हैं। यानी करीब 19.86 करोड़ लोग शहरों में रहते हैं, जोकि उस समय की भारत की जनसंख्या से भी अधिक है, जितनी ब्रिटिश काल में हुआ करती थी। दुनिया में कुल जमीनी हिस्से का 2.41 प्रतिशत भारत में है, जबकि जनसंख्या विश्व की कुल आबादी की 18 प्रतिशत है। सेंसस के अनुसार भारत की 72.2 फीसदी जनसंख्या गांवों में रहती है, जबकि 27.8 फीसदी लोग शहरों में। अब इन 27 फीसदी लोगों के लिये तेज़ी से शहरीकरण हो रहा है। और इसका खामियाजा उनके साथ-साथ बाकी के 73 फीसदी लोगों को भुगतना पड़ रहा है।
अगर संयुक्त राष्ट्र की के द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार पृथ्वी का महज 2 प्रतिशत हिस्सा शहरी क्षेत्र है, लेकिन यह 2 प्रतिशत पूरी पृथ्वी पर 71 से 76 प्रतिशत कार्बन डायॉक्साइड के लिये जिम्मेदार है। जी हां कार्बन डायऑक्साइड, जिसका ग्रीनहाउस एमिशन में काफी बड़ा योगदान है। चलिये बात करते हैं शहरी जनसंख्या सामने आने वाली चुनौतियों की, जो हम और आप नहीं, बल्कि प्रकृति उनके सामने खड़ी करेगी।
तेज़ी से बढ़ रहा शहरों का तापमान
आईआईटी भुवनेश्वर में हाल ही में एक रिसर्च में पता चला कि पिछले तीन वर्षों में भुवनेश्वर और कटक शहर का तापमान 0.5 डिग्री बढ़ गया। इसका सबसे बड़ा कारण शहरीकरण। जिसके लिये घने पेड़ों को काट दिया गया। रिसर्च में पाया गया कि पिछले पंद्रह वर्षों में भुवनेश्वर में घने पेड़ 89 प्रतिशत कम हो गये। वहीं कृषि योग्य भूमि में 83% कमी आयी, क्योंकि उन पर कॉन्क्रीट पड़ गया। इस रिसर्च का हिस्सा रहे आईआईटी के प्रोफेसर डा. वी विनोज ने वनइंडिया से बातचीत में बताया कि इस रिसर्च में ओडिशा के 22 अलग-अलग स्थानों से जुटाये गये आंकड़ों के आधार पर किया गया। ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों का तापमान दुगना पिछले तीस वर्षों में लगभग दुगना हो गया है। इसका मुख्य कारण तेजी से बन रहीं इमारतें हैं। रिसर्च में पाया गया कि 2000 से 2014 के बीच भुवनेश्वर के शहरी क्षेत्र में 80 फीसदी का इज़ाफा हुआ। जिसके लिये 89 प्रतिशत घने पेड़ों को काट दिया गया।

शहरी आबादी ने छीना ग्रामीणों का सुख
इसी रिसर्च के आगे के परिणाम साफ दर्शाते हैं कि शहरी आबादी ने गांव-देहात में रह कर खेती करने वाले लोगों का सुख छीन लिया। जी हां शहरों में एयरकंडीशंड का सुख देने के लिये बनायी गई इमारतों के लिये जिस तरह से पेड़ों को काटा गया, उसका सीधा प्रभाव फसलों पर पड़ा। रिसर्च के अनुसार 2000 से 2014 के बीच फसलों के लिये उपयुक्त जमीन 83 फीसदी तक घट गई। यह हाल केवल भुवनेश्वर का नहीं, बल्कि बेंगलुरु, कोलकाता, दिल्ली, नागपुर, पुणे, चंडीगढ़, चेन्नई जैसे कई बड़े शहरों का है। और इन सभी शहरों के तापमान में लगातार वृद्धि होने की वजह से मौसम अनियमित हो रहा है।
फसलों की बर्बादी
शहरी आबादी के जीवन का सुख किस तरह किसानों के जीवन को अंधकार में धकेल रहा है, उसका अंदाजा आपको इस रिसर्च से लग जायेगा, जो मॉनसून मिशन प्रोजेक्ट के अंतर्गत मिनिस्ट्री ऑफ अर्थ साइंस, भारत सरकार के सहयोग से करवाया गया। मई 2019 में पूरे हुए इस रिसर्च में पाया गया कि बेतरतीब ढंग से हो रहे शहरीकरण की वजह से स्थानीय मौसम में तेजी से परिवर्तन हो रहा है। शहरों में बढ़ते प्रदूषण और घटती हरियाली का असर न केवल शहर के अंदर पड़ता है, बल्कि आस-पास के ग्रामीण इलाकों पर भी इसका खासा असर होता है। जब मॉनसून के बादल हवा के साथ आगे बढ़ते हैं, तब जहां भी कम दबाव होता है। लेकिन शहरों के अंदर तापमान अधिक होने के कारण बादल बरसने के बजाये, आगे निकल जाते हैं। और जो पानी शहर में बरसना चाहिये था, वह शहर से 20 से 50 किलोमीटर दूर जाकर बरस जाता है। और खेतों में जरूरत से ज्यादा बारिश होने के कारण फसलें बर्बाद हो जाती हैं। जाहिर है फसल बर्बाद यानी किसान कर्ज में डूबा।
बढ़ रही शहरी जनसंख्या घट रहा पानी
अगर बेंगलुरु की बात करें तो यहां पर एक समय में 800 झीलें हुआ करती थीं, आज महज 200 बची हैं, वो भी निरीह अवस्था में हैं। लखनऊ की गोमती नदी के दोनों ओर बने बंधे नहीं होते, तो शायद हनुमान सेतु के दोनों ओर मकान ही मकान होते। नदियों में जिस तरह से शहरों का गंदा पानी छोड़ा जा रहा है, उससे हर कोई वाकिफ है। वहीं चेन्नई में पहले ही पानी के लिये ही हाहाकार मचा हुआ है। 21 शहरों में ग्राउंड वॉटर की वॉरनिंग पहले ही सोशल मीडिया में वायरल हो चुकी है। लेकिन इन सबके बीच अगर बारिश की बात करें, तो आप इस तस्वीर में देख सकते हैं कि जुलाई का महीना आधा होने को आ गया है, लेकिन अब भी भारत के अधिकांश हिस्से बारिश को तरस रहे हैं।

यह तस्वीर भारतीय मौसम विभाग द्वारा जारी की गई है, जिसमें आप देख सकते हैं कि 10 और 11 जुलाई को कहां-कहां बारिश हुई।
अगले दो दिन का हाल और बेहाल
अगले दो दिन की बात करें तो भारत का हाल और भी बेहाल होने वाला है। उत्तर भारत के कुछ हिस्सों और दक्षिण के एक-दो हिस्सों को छोड़ कर कहीं भी बारिश के कोई आसार नहीं नज़र आ रहे हैं।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ
लखनऊ के एडवांस इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च इन जियोलॉजी के भूवैज्ञानिक प्रोफेसर ध्रुवसेन सिंह ने वनइंडिया से बातचीत में कहा कि बढ़ती आबादी के बीच शहरीकरण विकास की डिमांड है, जिसे रोकना असंभव है। लेकिन अगर आने वाले समय में आपको शहरों के अंदर पानी की किल्लत से बचना है, तो हर शहर में ग्रीन बेल्ट बनाने की जरूरत है। ग्रीन बेल्ट ही एक मात्र रास्ता है, जो इस समस्या से छुटकारा दिला सकता है। रही बात भारत के कई क्षेत्रों में अब तक बारिश नहीं होने की, तो यह सब क्लाइमेट चेंज की देन है। केवल बारिश ही नहीं, बहुत अधिक तापमान और बहुत अधिक ठंड भी क्लाइमेट चेंज के ही प्रभाव हैं। क्लाइमेट चेंज का सबसे बड़ा कारण तेज़ी से बढ़ रहा प्रदूषण है और 70 फीसदी प्रदूषण के लिये शहरों में रहने वाले लोग ही जिम्मेदार हैं।
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