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विश्व एड्स दिवस 2021: तमाम रिसर्च और फंडिंग के बाद भी एड्स बनी हुई है लाइलाज बीमारी, हर साल मरते हैं लोग

नई दिल्ली, दिसंबर 01। जानलेवा बीमारी एड्स के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए हर साल 1 दिसंबर को विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है। साथ ही इस दिन उन लोगों को भी याद किया जाता है, जिन्होंने इस बीमारी की वजह से अपनी जान गंवाई है। विश्व एड्स दिवस की शुरुआत साल 1988 में हुई थी और तब से लेकर अभी तक एड्स आज भी लोगों के लिए एक लाइलाज बीमारी बनी हुई है। आज भी एड्स का सिर्फ एक ही इलाज है- बचाव और जागरूकता। तमाम रिसर्च के बावजूद दुनिया के वैज्ञानिक और डॉक्टर एड्स की दवा बनाने में नाकाम साबित रहे हैं।

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    जानिए इस साल एड्स की थीम

    विश्व स्वास्थ्य संगठन हर साल एड्स दिवस के मौके पर एक थीम जारी करता है, जो उस साल की विषय होता है। डब्ल्यूएचओ ने इस साल विश्व एड्स दिवस का विषय रखा है- 'असमानता का अंत, एड्स का अंत'। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि एड्स को लेकर आज भी लोगों में असमानता की भावना देखने को मिलती है, ऐसे में बहुत जरूरी है कि लोगों के बीच से सबसे पहले एड्स के मरीज से असमानता की भावना को खत्म किया जाए।

    क्या है एड्स

    एड्स (एक्वायर्ड इम्युनो डेफिशिएंसी सिंड्रोम) एक तरह का वायरस है, जो पीड़ित व्यक्ति में व्हाइट ब्लड सेल्स को संक्रमित करता है। ये वायरस ह्यूमन इम्युनो डेफिशिएंसी के कारण होता है, जो संक्रमण से लड़ने की शरीर की क्षमता को डैमेज देता है। सही समय पर देखभाल और बचाव नहीं करने पर व्यक्ति की मौत भी हो सकती है। एड्स बीमारी के अलावा इसको लेकर जागरूकता की कमी और लोगों की इससे जुड़ी सामाजिक विचारधाराएं भी स्थिति को और खराब करती हैं। एड्स से बचाव की मूल बातें यही हैं कि इसके बारे में पूरी जानकारी होना और इसके बचाव के तरीकों को अपनाना।

    क्यों एड्स का नहीं है कोई इलाज?

    आपको बता दें कि कोरोना महामारी के एक साल के अंदर दुनियाभर के कई देशों ने इसकी वैक्सीन तैयार कर ली और टीकाकरण भी चल रहा है, लेकिन सालों से चल रहे तमाम शोध के बाद भी एड्स की कोई वैक्सीन नहीं बन पाई है। आखिर इसकी वजह क्या है? अगर जानकारों की मानें तो निवेश की कमी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण एड्स आज भी लाइलाज बीमारी है। फ्रांसीसी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एंड मेडिकल रिसर्च की रिसर्च के डायरेक्टर निकोलस मैनल ने कहा है कि फार्मास्युटिकल के लिए मार्केट में निवेश की कमी है। उनका कहना है कि मार्केट के कमजोर होने के कारण रिसर्च नहीं हो पा रहे, जिसकी वजह से ही टीके का निर्माण नहीं हो पा रहा।

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