Caste Survey Bihar: जातिवार जनगणना के बीच सुर्खियों में क्यों है बिहार राज्य सवर्ण आयोग की रिपोर्ट?
Caste Survey Bihar: देश में जातिवार जनगणना की मांग और उसके पक्ष-विपक्ष में चर्चा कई वर्षों से बदस्तूर जारी है। इसकी बहस सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची है। जानकारों की ओर से कई राज्यों की राजनीति में इसकी अहम भूमिका होने की संभावना जाहिर की जा रही है। उत्तर भारत के प्रमुख हिंदी भाषी राज्य बिहार में इसको लेकर ज्यादा सियासी गहमागहमी है।
बिहार में लगभग अंतिम चरण में पहुंच चुकी जातिवार जनगणना प्रक्रिया के मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई भी की जा रही है। इस बीच हाल ही में सामने आई बिहार सवर्ण आयोग की रिपोर्ट ने सबका ध्यान खींच लिया है। कहां तो चर्चा हो रही थी कि बिहार सरकार किसी भी दिन जातीय गणना के आंकड़े जारी करने की घोषणा कर सकती है और कहां दस साल बाद अचानक फिर से सवर्ण आयोग की रिपोर्ट सुर्खियां बटोरने लगीं।

सवर्ण आयोग को लेकर सरकार के दावे और हकीकत
बिहार सरकार का दावा है कि जातीय जनगणना से राज्य में जातियों और उप जातियों की सही जानकारी सामने आने पर सामाजिक और आर्थिक हालात को समझने और उसके आधार पर कल्याणकारी योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी। लगभग 12 साल पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई वाली राज्य सरकार ने इन्हीं दलीलों के आधार पर देश में पहली बार किसी राज्य में सवर्ण आयोग का गठन किया था कि इससे गरीबों सवर्णों को चिन्हित करके विकास कार्यक्रम तैयार किए जाएंगे।
27 जनवरी, 2011 को कैबिनेट की मंजूरी के बाद 31 जनवरी 2011 को गठित बिहार राज्य सवर्ण आयोग के एक सदस्य का दावा है कि ढाई साल की कड़ी मेहनत के बाद आयोग ने साल 2013 में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। सरकार ने पूरे जोश से रिपोर्ट तो जारी कर दी, मगर उसकी सिफारिशों पर अब तक कोई सुनवाई नहीं की जा सकी है। उन फाइलों के आधार पर कोई सरकारी योजना सामने नहीं दिख रही है। राज्य सरकार ने सवर्ण आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए तत्कालीन मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया था। हालांकि उनकी बैठकों, रिपोर्ट और कार्रवाइयों के बारे में अब तक कुछ सार्वजनिक नहीं हो पाया है।
ढाई साल तक 25 जिलों में स्टडी, सर्वे और रिसर्च के आधार पर चौंकाने वाली रिपोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस दिनेश कुमार त्रिवेदी की अध्यक्षता में गठित आयोग में श्रीकृष्ण प्रसाद सिंह उपाध्यक्ष और नरेंद्र प्रसाद सिंह, फरहत अब्बास और संजय मयूख प्रकाश बतौर सदस्य शामिल थे। बाद में भाजपा कोटे के संजय मयूख के आयोग से हट जाने के बाद रिपुदमन श्रीवास्तव को सदस्य बनाया गया था। बिहार के 25 जिलों में अपनी स्टडी, सर्वे और रिसर्च के आधार पर सवर्ण आयोग ने अपनी रिपोर्ट में राज्य सरकार को जो बताया था वह बेहद चौंकानेवाला है।
आयोग का दावा है कि स्टडी में शामिल किए गए 25 में से 20 ग्रामीण जिले और 5 शहरी जिले थे। आयोग की टीम इन 25 जिलों के लगभग 11 हजार परिवारों तक पहुंची थी। उनसे बातचीत से जुटाए आंकड़ों के आधार पर ही रिपोर्ट बनाई गई। उसके हिसाब से ही सरकार से आयोग ने कार्रवाइयों की सिफारिश भी की थी। इनमें सालाना डेढ़ लाख से कम कमानेवाले सवर्ण परिवार को गरीब मानने, गरीब सवर्णों को सभी कल्याणकारी योजनाओं के दायरे में रखने और सवर्ण जाति के डेढ़ लाख या उससे कम पारिवारिक आय वाले कक्षा एक से दस तक के छात्रों को भी छात्रवृत्ति दिए जाने की सिफारिशें प्रमुख थीं।
सवर्ण आयोग की रिपोर्ट में क्या है, क्यों मचने लगा शोर
बिहार राज्य सवर्ण आयोग की रिपोर्ट को देखकर कुछ लोग उसकी तुलना अल्पसंख्यकों को लेकर वर्षों पहले आई जस्टिस राजिंदर सच्चर कमेटी की रिपोर्ट से करने लगे थे। आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में हिंदू और मुस्लिम सवर्णों की सामाजिक-आर्थिक हालत चिंताजनक रूप से खराब है। रिपोर्ट में बताया गया है कि सवर्ण जाति के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले 49 प्रतिशत बच्चे केवल गरीबी के कारण पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हैं। ग्रामीण इलाके में महज 9.9 प्रतिशत सवर्ण युवा ही ग्रेजुएशन या उससे ऊपर की पढ़ाई कर पाते हैं। शहरी क्षेत्रों में ये आंकड़ा 31.7 प्रतिशत है।
कृषि को मुख्य पेशा मानने वाले सवर्ण अपनी जमीनों को बेचने के लिए मजबूर हैं। राज्य के 55 प्रतिशत से ज्यादा सवर्णों के पास महज एक एकड़ से कम जमीन बची हैं। हर पांच में से एक सवर्ण के पास पक्की छत नहीं है। और बिहार की 36.6 प्रतिशत सवर्ण जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर कर रही है।
रोजगार की हालत तो और ज्यादा पतली है। ग्रामीण क्षेत्रों में ब्राह्मण जाति के 8.5 प्रतिशत, भूमिहार जाति के 13.2 प्रतिशत, राजपूत जाति के 8.6 प्रतिशत और कायस्थ जाति के 9.1 प्रतिशत लोग बेरोजगार हैं। जबकि शहरी क्षेत्रों ये आंकड़ा क्रमश: 8.9, 10.4, 10.5 और 14.1 हैं। बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति 100 घर में से 43.5 घरों के सवर्ण जीविका के लिए पलायन को मजबूर हैं। वहीं 65.6 फीसदी युवा सिर्फ नौकरी के लिए अपना घर-परिवार छोड़ने के लिए विवश हैं।
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