Foreign Pressure: चुनाव के समय क्यों बढ़ रहा है विदेशी दबाव?
Foreign Pressure: भारत में जैसे जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आती जा रही है, इसकी तपिश बढ़ती जा रही है। ऊपर से कुछ बाहरी देशों द्वारा अनावश्यक टिप्पणी और किसी पार्टी या नेता को लेकर कुछ आशंकाएं जताए जाने के बाद भारत में तनाव बढ़ गया है।
पहले जर्मनी, फिर अमेरिका और उसके बाद अब संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव गुटेरेस के बयान ने नए बवाल खड़े कर दिए हैं। केजरीवाल की गिरफ़्तारी और आयकर विभाग द्वारा काँग्रेस के बैंक खाते को सील किए जाने के बाद कुछ देशों की अवांछित टिप्पणियाँ सामने आईं हैं।

भारत में लोकतंत्र मजबूत
भारत, दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है। 1975 में एक बार आपातकाल लगने के अलावा भारत का लोकतंत्र कभी पटरी से उतरा नहीं। यहाँ भारतीय जनता पार्टी पिछले 10 साल से सरकार में है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता विश्वव्यापी है।
पीएम मोदी के सार्थक यह दावा करते हैं कि उन्होनें भारत को एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति बना दिया है और जल्दी ही भारत को एक विकसित राष्ट्र भी बना देंगे। पर उनके आलोचकों का कहना है कि उन्होंने प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा दिया है। हिंदू राष्ट्रवादियों को बढ़ावा मिल रहा है और धार्मिक अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न हो रहा हैं। पर ये सभी आरोप राजनीतिक है।
चुनावों पर सवाल खड़े करना पश्चिमी देशों की आदत
ऐसा केवल भारत के साथ ही नहीं, बल्कि कई अन्य देशों में चुनाव के समय भी पश्चिम के देशों द्वारा अनावश्यक बयान सामने आता है। कुछ ऐसी भी प्रतिक्रिया सामने आती है, जिसे किसी देश के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप माना जा सकता है।
दरअसल यूरोप और अमेरिका हमेशा जताते रहते हैं कि वे ही लोकतंत्र के चैंपियन है और समूचे विश्व में जनतंत्र बचाने की जिम्मेदारी उन्हीं की है। मालूम हो कि 2024 में 50 से अधिक देशों में राष्ट्रीय चुनाव होने वाले हैं। वोट देने के अधिकार वाले अरबों लोग हैं। इस वर्ष दुनिया के सबसे मजबूत लोकतंत्रों में भी चुनाव हो रहे हैं। भारत के साथ साथ अमेरिका भी इसमें शामिल है। बांग्लादेश, पाकिस्तान, रूस और ताइवान में चुनाव कराए भी जा चुके हैं।
इन सभी देशों के चुनावों को लेकर भी बाहरी देशों ने काफी उत्सुकता दिखाई और इन देशों की सरकार पर दबाव भी डाला। बांग्लादेश के चुनाव में तो अमेरिका ने इस कदर अपनी टांग अड़ाई कि वहाँ की जनता और सरकार दोनों बिफर पड़े। अमेरिका ने तो बांग्लादेश की शेख हसीना को यहाँ तक धमकी दे दी थी कि यदि चुनाव साफ सुथरे नहीं हुए तो अमेरिका व्यापारिक प्रतिबंध भी लगा देगा। फिर भी प्रधान मंत्री शेख हसीना ने भारी बहुमत हासिल किया है।
ताइवान में जनवरी में चुनाव हुआ, अमेरिका ने इस चुनाव को लोकतंत्र की जीत के रूप में उल्लेखित किया लेकिन बीजिंग ने ना सिर्फ इस चुनाव को मानने से इनकार कर दिया, बल्कि इस द्वीप पर कब्जा करने के लिए सैन्य बल के उपयोग की धमकी भी फिर से दे डाली। विपक्षी नेशनलिस्ट पार्टी भी बीजिंग के प्रति अधिक उत्तरदायी दिखाई दी।
अमेरिका और यूरोप के चुनावों में भी भारी अंतर्विरोध
कुछ देशों के साथ यह बात लागू भी होती है कि वहाँ मतदान न तो स्वतंत्र होता है और न ही निष्पक्ष। खास कर पाकिस्तान और रूस के बारे में यही कहा गया। इन दोनों देशों में विपक्षी उम्मीदवारों पर अंकुश लगए गए, मतदान में हेरफेर की भी खबरें आईं और खूब दुष्प्रचार भी किया गया।
एक तरह से लोकतंत्र के भाग्य को किसी के अधीन बना दिया गया। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को उनके पांचवें कार्यकाल के लिए चुनाव जीतना कठिन बिल्कुल नहीं रहा। उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी या तो जेल में थे, या निर्वासन में या मर चुके थे। उनके चुनाव को यूरोपीय समुदाय ने एक दम फर्जी करार दिया।
लेकिन केवल इन देशों में ही इस तरह की शिकायतें नहीं आती, अमेरिका में भी चुनाव को लेकर बड़े बड़े आरोप लगते रहे हैं। राष्ट्रपति जो बिडेन और उनके पूर्ववर्ती डोनाल्ड ट्रम्प के बीच पिछला मुकाबला भी काफी विवादों से भरा था। ट्रम्प ने चीन की भूमिका और चुनाव में गड़बड़ी का आरोप लगाया था। दोबारा फिर उन्हीं के बीच मुकाबला होता दिखाई दे रहा है।
ट्रम्प को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए तमाम अदालती लड़ाई लड़ी गई। हालांकि पिछले नवंबर में ट्रम्प कानूनी लड़ाई जीत कर वाइल्डकार्ड से इंट्री कर चुके है। कहा जा रहा है कि चुनाव को लेकर अमेरिकी मतदाताओं के बीच भी असंतोष, अधीरता, बेचैनी की स्थिति है। लेकिन कोई अन्य देश अमेरिकी लोकतंत्र पर सवाल नहीं उठता।
यूरोप में भी जून में चुनाव होने वाले हैं। वहाँ अभी से ही लोकलुभावन नारे जोर पकड़ चुके हैं। 27 देशों वाले यूरोपीय संघ की संसद के लिए जून में होने वाले चुनाव इस बात का संकेत होंगे कि यूक्रेन के लिए सैन्य समर्थन को लेकर इन देशों में सहमति है या कोई संशय हैं।
इसी वर्ष ब्रिटेन के आम चुनाव में भी कई विवादित मुद्दे शामिल होने वाले हैं, जिनमें जलवायु परिवर्तन, यूक्रेन युद्ध से बाधित अनाज आपूर्ति, और चीन और रूस के प्रति ब्रिटेन का आक्रामक रुख भी मुद्दे होंगे। लेकिन इनके बारे में किसी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ने कोई सवाल खड़ा नहीं किया। शायद गोरे देशों के लिए अलग मापदंड होते हैं।












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