जब घोषणापत्र ही बन गया चुनावी मुद्दा, 1952 से अब तक किन वादों पर हुई तकरार
Ghoshna Patra: देश में 18वीं लोकसभा के लिए हो रहे आम चुनाव में दो चरण का मतदान पूरा हो चुका है। अभी पांच चरणों का मतदान बाकी है। सभी राजनीतिक दल चुनाव प्रचार अभियान को एक नई धार देने में लगे हैं। मतदान के दोनों चरणों के बाद इसकी दिशा में बड़ा बदलाव आया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विपक्षी गठबंधन इंडी एलायंस की अगुवा कांग्रेस पार्टी के चुनावी घोषणापत्र को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। 2024 के लोकसभा चुनावों में घोषणापत्र अब बहुत अहम हो गया है।

प्रचार के दौरान अचानक काँग्रेस का घोषणापत्र राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है। इससे पहले कुछ बहुत बड़ी घोषणा या वादों को छोड़कर घोषणापत्र ज्यादा सवालों के निशाने पर नहीं हुआ करता था। लेकिन अब सभी दलों के घोषणा पत्र को लोग चाव से पढ़ रहे हैं।
चुनाव के दौरान किसी राजनीतिक दल द्वारा अपने या अपने समूह के सिद्धांतों और इरादों (नीति एवं नीयत) को सार्वजनिक रूप से प्रकट करना घोषणापत्र या मेनिफेस्टो कहलाता है। मैनिफेस्टो इटली का शब्द है, जो लैटिन भाषा के मैनीफेस्टम शब्द से बना है। अंग्रेजी में 1620 में पहली बार मेनीफेस्टो शब्द का इस्तेमाल हुआ था। आमतौर पर इसका स्वरूप राजनीतिक होता है, लेकिन यह जीवन के दूसरे क्षेत्रों से भी जुड़ा हुआ हो सकता है।
संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था वाले कई देशों में राजनैतिक दल चुनाव के कुछ दिन पहले मतदाताओं के सामने अपना घोषणापत्र पेश करते हैं। इन घोषणापत्रों में आमतौर पर इन बातों का जिक्र होता है कि अगर उनकी पार्टी जीत गई तो वे सरकार के नियम-कानूनों और नीतियों में किस तरह का बदलाव करेंगे। दरअसल, चुनावी घोषणापत्र सियासी पार्टियों की रणनीतिक दिशा भी तय करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की गाइडलाइंस
राजनीतिक दल चुनावी घोषणा पत्र तैयार करने के लिए एक विशेष टीम का गठन करते हैं। पार्टियों की नीति और जनता की मौजूदा मांग के मुताबिक यह टीम मुद्दे चुनकर अपने पदाधिकारियों और आम लोगों से चर्चा करती है। इसके बाद आर्थिक और सामाजिक समेत तमाम मुद्दों पर घोषणापत्र पेश किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 5 जुलाई 2013 को एस. सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु सरकार और अन्य के मामले में फैसला सुनाते हुए चुनाव आयोग को सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के परामर्श से चुनावी घोषणापत्र के संबंध में गाइडलाइंस तैयार करने का निर्देश दिया था। घोषणापत्र बनाने के लिए चुनाव आयोग की इन गाइडलाइंस का पालन करना अनिवार्य है। कोई भी दल मतदाताओं को लुभाने के मकसद से घोषणापत्र में कोई भी गलत या भ्रामक वादा नहीं कर सकता है।
बदलावों से गुजरे सभी दलों के चुनावी घोषणापत्र
सभी राजनीतिक दल घोषणापत्र के मामले में कई बदलावों के साथ आगे बढ़े हैं। हालांकि, भव्य समारोहों में जारी होने वाले चुनावी घोषणापत्रों पर इससे पहले शायद ही कभी इतनी चर्चा हुई हो। इस बार सोशल मीडिया से लेकर नुक्कड़ों तक आम मतदाताओं में पहली बार मेनिफेस्टो पर चर्चा चल रही है।
2009 से 2024 तक कितना बदला भाजपा का घोषणापत्र
भाजपा के साल 2009 से 2024 तक के घोषणापत्रों पर नजर डालें तो कई बदलाव सामने आए हैं। 2009 के घोषणा पत्र में सुशासन, विकास और सुरक्षा की टैगलाइन के साथ कवर पर अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और राजनाथ सिंह की फोटो थी। 2014 के घोषणापत्र में एक भारत, श्रेष्ठ भारत के नारे के साथ भाजपा के 11 नेताओं की फोटो लगी थी। 2019 में पहली बार संकल्पपत्र नाम रखा गया और इसके कवर पर संकल्पित भारत, सशक्त भारत टैगलाइन के साथ सिर्फ पीएम मोदी की फोटो थी। 2024 के संकल्पपत्र में टैगलाइन मोदी की गारंटी रखा गया है। वहीं, कवर पर पीएम मोदी के साथ भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा की भी तस्वीर है।
2024 के संकल्प पत्र और न्याय पत्र में बहस के लायक मुद्दे
इस बार चुनाव से पहले 18 से 29 वर्ष की आयु के दो करोड़ से अधिक युवा मतदाताओं को वोटर लिस्ट में जोड़ा गया है। इसलिए देश के दोनों बडे सियासी दलों भाजपा के संकल्प पत्र और कांग्रेस के न्याय पत्र में युवाओं पर जोर है। दोनों ही पार्टियों ने अपने घोषणापत्र में युवाओं के अलावा महिलाओं, किसानों और गरीबों से जुड़े वादे किए हैं। भाजपा ने समान नागरिक संहिता लागू करने और कांग्रेस ने जातिगत जनगणना, आर्थिक-सामाजिक सर्वे और संसाधनों के पुनर्वितरण की बात कर नई बहस को तेज कर दी है।
1952 से 2019 तक कांग्रेस, भाजपा (जनसंघ) और लेफ्ट का घोषणापत्र
देश में राजनीतिक पार्टियों के मेनिफेस्टो या घोषणापत्र को लेकर साल 2022 में सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) ने पहले आम चुनाव 1952 से लेकर लोकसभा चुनाव 2019 तक कांग्रेस, भाजपा (1980 से पहले जनसंघ) और सीपीआई-एम (1971 से पहले सीपीआई) के घोषणापत्रों पर एक डेटा एनालिसिस किया। स्टडी रिपोर्ट में कोडिंग और वर्ड काउंट के जरिए सामने आया कि तीनों राजनीतिक दलों ने राष्ट्रीय सुरक्षा, राजनीतिक योग्यता, राजनीतिक तंत्र, सामाजिक तानाबाना, आर्थिक योजना, कल्याणकारी कार्यक्रम, विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सात प्रमुख मुद्दों पर ही अपना ज्यादातर फोकस किया है।
प्रोमिजेज दैट मैटर टु इंडियन डेमोक्रेसी: ए स्टडी ऑफ इलेक्शन मैनिफेस्टोज सिंस 1952 नाम की इस स्टडी के चौंकाने वाले डेटा और आइडियाज फिर से सामने आ रहे हैं। घोषणापत्र पर नई बहस के बीच यह जानना दिलचस्प है कि 1952 से अब तक कई बार कई राजनीतिक मुद्दों पर विरोधी दलों की राय लगभग एक जैसी रही है। ज्यादातर मुद्दों पर भाजपा को छोड़कर बाकी दोनों दलों का विचार बराबर है। खासकर, भाजपा ने शुरुआत से ही आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद का मुद्दा उठाया, जबकि कांग्रेस और लेफ्ट का इस मुद्दे पर कभी जोर नहीं रहा। वहीं, आर्थिक उदारीकरण ने सभी दलों की नीति पर भी बड़ा असर किया और इसका असर उनके घोषणापत्रों में दिखा।
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