Satellite Launch Vehicles: क्या होते हैं सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल, जानें भारत की उपलब्धियां

10 फरवरी 2023 को स्वदेशी लघु प्रक्षेपण यान ने 3 उपग्रहों को सफलतापूर्वक अपनी कक्षा में प्रक्षेपित किया। यह दुनियाभर में अभी तक का सबसे सस्ता प्रक्षेपण यान है जो कम कीमत पर उपग्रहों को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर सकता है।

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उपग्रह या सेटेलाइट को अंतरिक्ष में उनकी कक्षाओं तक पहुंचाने के लिए लिए जिस साधन का उपयोग किया जाता है, उसे प्रक्षेपण यान (रॉकेट) कहते हैं। प्रक्षेपण यान भारी मात्रा में उर्जा उत्पन्न करते हैं जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के विपरीत संतुलन बनाने में सहायक होते हैं। भारत ने अब तक पांच प्रकार के प्रक्षेपण यान विकसित किए हैं, जिनका उपयोग इसरो द्वारा भारतीय व विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए किया गया है।

सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल - 3 (एसएलवी-3)
भारत का पहला प्रक्षेपण यान एसएलवी-3 था। इसका 18 जुलाई 1980 में सफल परीक्षण किया गया। यह चार चरणों वाला एक साधारण क्षमता वाला प्रक्षेपण यान था, जो 40 किलोग्राम भार वर्ग के उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित कर पाने में सक्षम था।

ठोस ईंधन से परिचालित होने वाले एसएलवी-3 प्रक्षेपण यान की लंबाई 22 मीटर और वजन 17 टन था। एसएलवी की सफलता के साथ ही भारत प्रक्षेपण यान वाले देशों अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान तथा चीन के साथ शामिल हो गया था।

ऑगमेंटेड सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (एएसएलवी)
एसएलवी-3 का विकसित रूप एएसएलवी को इसरो द्वारा बनाया गया था। यह पांच चरणों वाला प्रक्षेपण यान था, जो डेढ़ सौ किलोग्राम तक का वजन पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित करने में सक्षम था। इस यान की कुल लंबाई 23.8 मीटर तथा वजन 40 टन था। इसमें भी ठोस ईंधन का प्रयोग किया जाता था। इस यान के प्रथम और द्वितीय चरण के लिए ईधन के रूप में हाइड्रा क्लेसिक टर्मिनेटेड पॉली ब्यूटाडाइन तथा तृतीय चरण के लिए एचईएफ 20 का प्रयोग किया जाता था।

पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी)
भारत द्वारा पहली बार पीएसएलवी का सफल परीक्षण अक्टूबर 1984 में किया गया था। यह एक तीसरी पीढ़ी का यान है। पीएसएलवी ऐसा पहला प्रक्षेपण यान है जो लिक्विड रॉकेट इंजन से सुसज्जित है। पीएसएलवी से अधिकतर निगरानी वाले उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे जाते हैं। पीएसएलवी का उपयोग इसरो ने साल 2008 में चंद्रयान-1 और 2013 में मार्स ऑर्बिट स्पेसक्राफ्ट को प्रक्षेपित करने के लिए किया था।

इस यान की मदद से सूर्य तुल्यकालिक (Sun synchronous Orbit) ध्रुवीय कक्षा में सैटेलाइट भेजे जाते हैं। आमतौर पर सूर्य तुल्यकालिक ध्रुवीय कक्षा 600 से 900 किलोमीटर की ऊंचाई पर होती हैं। पीएसएलवी की मदद से इसरो 1750 किलोग्राम से 320 टन तक के उपग्रह सूर्य तुल्यकालिक ध्रुवीय कक्षा (एसएसपीओ) में भेज सकता है। यान की ऊंचाई 44 मीटर और व्यास 2.8 मीटर है। पीएसएलवी से एसएसपीओ के अलावा जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (जीटीओ) पर 1600 किलोग्राम वजन तक के उपग्रह भेजे जाते हैं।

अभी तक इसरो ने पीएसएलवी के तीन संस्करण बनाए हैं। जिसमें पीएसएलवी-जी, पीएसएलवी-सीए, पीएसएलवी- एक्सएल शामिल हैं। पीएसएलवी चार स्टेज वाले रॉकेट होते हैं। जिनमें पहले और तीसरे स्टेज में सॉलिड इंधन और दूसरे और चौथे स्टेज में लिक्विड ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है। अभी तक इसरो ने इसके माध्यम से 39 सफल प्रक्षेपण किए हैं।

जियोसिन्क्रोनस लॉन्च व्हीकल (जीएसएलवी)
जीएसएलवी भारत का सबसे बड़ा लॉन्च व्हीकल है। यह चौथी पीढ़ी का प्रक्षेपण यान है। इस यान में क्रायोजेनिक इंजन लगा हुआ है। इसरो द्वारा मुख्यतः कम्युनिकेशन सेटेलाइट को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।

जीएसएलवी का उपयोग 36000 किलोमीटर ऊपर स्थित जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (जीटीओ) में उपग्रह को प्रक्षेपित करने के लिए किया जाता है। यह यान 90 मीटर लंबा और 414 टन वजन का है।

जीएसएलवी के इसरो ने 3 संस्करण बनाए हैं, पहला संस्करण जीएसएलवी-एमके I, दूसरा संस्करण स्वदेशी क्रायोजेनिक अपर स्टेज (सीयूएस) जीएसएलवी-एमके II, और तीसरा जीएसएलवी-एमके III हैं।

जीएसएलवी के विभिन्न संस्करण जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में अधिकतम 2500 किलोग्राम तक व पृथ्वी की निचली कक्षा में 10,000 किलोग्राम वजन तक के उपग्रहों को प्रक्षेपित कर सकता है। जीएसएलवी ने अभी तक भारत के लिए 18 मिशनों को अंजाम तक पहुंचाया है।

स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (एसएसएलवी)
10 फरवरी 2023 को लघु प्रक्षेपण यान ने तीन उपग्रहों को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया। एसएसएलवी-डी2 यान ने अपनी पहली सफल उड़ान में ईओएस-07, जानुस-1 और आजादीसैट-2 उपग्रहों को 37 डिग्री के झुकाव के साथ उनकी लक्षित 450 किलोमीटर की गोलाकार कक्षा में स्थापित किया।

इसरो के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के पहले प्रक्षेपण स्थल से भारतीय समय अनुसार 9:18 बजे उड़ान भरी और 15 मिनट की उड़ान के बाद इसने तीनों उपग्रहों को अपनी अपनी कक्षा में स्थापित कर दिया। जिससे यह यान इसरो के एक महत्वपूर्ण प्रक्षेपित यानों में शामिल हो गया है।

बता दें कि लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान यह पृथ्वी की निचली कक्षा में 500 किलोग्राम तक के छोटे उपग्रह को लॉन्च करने के लिए इसरो द्वारा बनाया गया है। इस यान की मदद से कम लागत में अंतरिक्ष तक उपग्रहों को प्रक्षेपित किया जा सकता हैं। स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल 34 मीटर लंबा और 2 मीटर व्यास वाला यान है। यह यान पीएसएलवी के मुकाबले 10 प्रतिशत सस्ता है। लघु ग्रह प्रक्षेपण यान 13 चरण का प्रक्षेपण यान है जिसे तीन सॉलिड फ्यूल और तरल (लिक्विड) फ्यूल के साथ टर्मिनल चरण के रूप में जोड़ा गया हैं।

आपको जानकर हैरानी होगी कि पीएसएलवी में उपग्रह प्रक्षेपित करने की अवधि 60 दिनों की है जबकि लघु (स्माल) उपग्रह प्रक्षेपण यान के माध्यम से उपग्रहों को प्रक्षेपित केवल 72 घंटे में किया जा सकता है।

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